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25 मई 2014

भगवान शंकर महाशक्ति हैं !

जब माता पार्वती जी का भ्रम टूटा 



एक बार भगवान शंकर व माता पार्वती विचरण करते हुए एक पर्वत पर बैठे थे ! इधर-उधर की बातें होने लगीं! संसार के बारे में चर्चा हो रही थी ! तभी माता पार्वती के पैर पर पानी की एक बून्द गिरी ! माता ने आश्चर्य से उपर देखा ! आसमान साफ था ! उपर कोई पक्षी भी दिखाई नहीं दिया ! फिर यह पानी की बूंद कहां से आई ! माता ने बहुत सोचा परंतु पानी की बून्द का रहस्य समझ में न आया ! उन्होंने अपनी शंका भगवान शंकर से कही ! भगवन ने देखा तो उन्हें भी कुछ समझ में न आया ! माता ने जिद की तथा बूंद के रहस्य का पता लगाने के लिए कहा ! शंकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए !

जब शंकर जी ने अपने नेत्र खोले तो माता पार्वती ने फिर अपनी जिज्ञासा जाहिर की तथा पूछा कि यह पानी की बूंद कहां से आई !

शंकर भगवान ने कहा – “अभी थोडी देर पहले नीचे समुन्द्र में एक मगरमच्छ ने छलांग लगाई थी ! जिससे पानी उछल कर ऊपर की ओर आया और आपके पैर पर पानी की बूंद पड गई !”
“यह कैसे हो सकता है ?” मां पार्वती ने शंका जाहिर की ! “क्या मगरमच्छ इतना बलशाली है कि उसकी छलांग लगाने से पानी इतना उपर उछल कर आ गया ? समुद्र तो यहां से बहुत दूर है !”

“हां पार्वती, ऐसा ही हुआ है !” भगवान ने शांत भाव से उत्तर दिया !
“परंतु यह बात मेरे गले नहीं उतर रही ! मैं इस की जांच करना चाहती हूं ! मैं स्वंय जाकर देखना चाहती हूं !” पार्वती ने आज्ञा मांगने के आशय से कहा !
“हां पार्वती, मैं ठीक कह रहा हूं ! ऐसा ही है !’ भगवान ने पार्वती को फिर समझाया !
“परंतु मुझे विश्वास नहीं हो रहा ! मैं अपनी शंका का समाधान करना चाहती हूं !” पार्वती ने कहा “मैं स्वयं जाकर सच्चाई जानना चाहती हूं !”
भगवान शंकर “जैसी आपकी इच्छा !” कहकर फिर अंतर्ध्यान हो गए !
माता पार्वती नीचे समुद्र तट पर पहुंच गईं ! उन्होंने देखा कि एक मगरमच्छ किनारे पर ही तैर रहा है ! उन्होंने झट उस मगरमच्छ को बुला कर उससे पूछा -“क्या तुमने अभी कुछ देर पहले पानी में छलांग लगाई थी ?”

“हां माता श्री, क्या मुझसे कोई भूल हो गई है ? कृप्या मुझे क्षमा कर दें !” मगरमच्छ ने हाथ जोड दिये !

“नहीं वत्स, तुमसे कोई भूल नहीं हुई ! मैं अपनी एक शंका का निवारण करने आई थी !” पार्वती ने कहा !

“कैसी शंका माता श्री ?” मगरमच्छ ने प्रश्न किया !
“मैं उपर शंकर भगवान के साथ बैठी थी कि मेरे पैर पर पानी की एक बूंद आकर गिरी ! आसमान भी साफ था तथा ऊपर कोई पक्षी भी नही उड रहा था ! मैने जब शंकर जी से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने ही यह सब बताया !” पार्वती आश्चर्य से मगरमच्छ को देख रहीं थीं ! “लेकिन यदि तुम्हारे पानी में कूदने से जल इतना ऊपर आया है तो इसका मतलब यह हुआ कि तुम बहुत बलशाली हो !” माता ने फिर कहा !
“नहीं मां, मैं कहां बलशाली हूं ! मेरे जैसे और मेरे से भी अधिक बलशाली कई मगरमच्छ इस समुद्र में रहते हैं ! समुद्र हम सबको समेटे हुए है ! तो बलशाली तो समुद्र हुआ न !” मगरमच्छ दीनता से बोला !
“तुम ठीक कहते हो !” यह कहकर पार्वती मां समुद्र के पास जाकर बोलीं – “समुद्र-समुद्र, तुम बहुत बलशाली हो !”

समुद्र हाथ जोडकर खडा हो गया ! “क्या बात है माता, आप ऐसा क्यों कह रहीं हैं ?”

“मैं उपर शंकर भगवान के साथ बैठी थी कि मेरे पैर पर पानी की एक बूंद आकर गिरी ! आसमान भी साफ था तथा कोई पक्षी भी नही उड रहा था ! मैने जब शंकर जी से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि अभी थोडी देर पहले नीचे समुन्द्र में एक मगरमच्छ ने छलांग लगाई थी ! जिससे पानी उछल कर ऊपर की ओर आया यह उसी पानी की बूंद है !” माता पार्वती ने आगे कहा – “सोचो वह मगरमच्छ कितना बलशाली है ! और ऐसे कई मगरमच्छों को तुम समेटे हुए हो ! अतः तुम बहुत बलशाली हो !”

“माता आप ऐसा कहकर सिर्फ मेरा मान बढाना चाहती हैं ! यह आपका बडप्पन है ! मैं तो कुछ भी नही ! अब देखिए न, यह सामने पर्वत खडा है ! समुद्र में इतनी ऊंची-ऊंची लहरें ऊठती हैं पानी के थपेडे दिन-रात इसको टक्कर मारते रहते हैं ! फिर भी यह कई वर्षों से इसी प्रकार निश्चल खडा है ! इस पर मेरी लहरों और थपेडों का कोई असर नहीं होता ! मुझ से तो बलशाली यह पर्वत है !” समुद्र ने कहा !

‘ओह, मैंने तो यह सोचा ही नहीं था ! वाकई, पर्वत बहुत बलशाली है !” यह कहकर पार्वती जी पर्वत के पास जाकर बोली –“पर्वत बेटा, मैने सुना है कि तुम बहुत बलशाली हो !”
“यह आप कैसे कह सकती हैं माता जी !” पर्वत ने नम्रतापूर्वक प्रश्न किया
“मैं शंकर भगवान के साथ वहां ऊपर बैठी थी कि मेरे पैर पर पानी की एक बूंद आकर गिरी ! मैने जब शंकर जी से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि नीचे समुन्द्र में एक मगरमच्छ ने छलांग लगाई थी ! जिससे पानी उछल कर ऊपर की ओर आया ! वह मगरमच्छ कितना बलशाली है ! और ऐसे कई मगरमच्छ समुद्र में अठखेलियां करते हैं ! उसी समुद्र की लहरों के हजारो-लाखों थपेडों का भी तुम पर कोई असर नहीं होता ! तब तो तुम ही बलशाली हुए न !” पार्वती मां ने सारी कहानी सुनाते हुए पर्वत से पूछा !

“नही-नही माता जी ! सच्चाई तो यह है कि मेरे जैसे कई छोटे-बडे पर्वत इस पृथ्वी पर कई वर्षों से खडे हैं ! और पृथ्वी हम सब का भार अपने ऊपर लिए निश्चल खडी है ! तो पृथ्वी हमसे भी अधिक बलशाली हुई !” पर्वत ने अपना तर्क दिया !
जब माता पार्वती जी का भ्रम टूटा

पार्वती सोच मे पड गईं ! वो सोचने लग गई मैं भी कहां भूली हुई थी ! बलशाली तो पृथ्वी है चलो पृथ्वी के पास चलते हैं ! मां पृथ्वी के पास जाकर कहने लगीं – “अरे पृथ्वी रानी ! मैं तो भूली पडी थी ! मुझे पहले ख्याल ही नहीं आया ! तुम तो बहुत बलशाली हो !”
“वो कैसे मां !” पृथ्वी ने प्रश्न किया !

“मैं शंकर भगवान जी के साथ ऊपर पर्वत पर बैठी थी कि मेरे पैर पर पानी की एक बूंद आकर गिरी ! मैने जब शंकर जी से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि नीचे समुन्द्र में एक मगरमच्छ ने छलांग लगाई थी ! जिससे पानी उछल कर ऊपर की ओर आया ! वह मगरमच्छ कितना बलशाली है ! और ऐसे कई मगरमच्छ समुद्र में विचरण करते हैं ! उसी समुद्र की लहरों के हजारो-लाखों थपेडों को यह पर्वत सहते हैं ! इन जैसे कई पर्वतों का और हम सब का भार तुमने अपने ऊपर लिया हुआ है ! इसलिए इसमें शक की कोई गुंजाईश ही नही है ! तुम ही सबसे बलशाली हो !” पार्वती मां ने पृथ्वी को समझाया !

पृथ्वी पार्वती की बात सुनकर नत-मस्तक होकर बोली –“ मैं कहां बलशाली हूं मां ? मैं तो स्वयं ही शेषनाग पर टिकी हुई हूं ! जब शेषनाग ज़रा सा भी अपना सिर हिलाते हैं तो मैं डोल जाती हूं ! बलशाली तो शेषनाग जी हैं !”
पार्वती जी का माथा ठनका ! व सोचने लगीं ! अरे वाकई, पृथ्वी सही कह रही है ! इतनी बडी पृथ्वी का सारा का सारा भार शेषनाग ने अपने शीश पर ऊठा रखा है ! तो बलशाली और महाशक्ति तो वही हुआ !

पार्वती जी झट से शेषनाग के पास पहुंचीं और उससे कहने लगी ! – “शेषनाग जी मुझे तो आज पता चला कि आप बहुत शक्तिशाली हो !”

“वह कैसे ?” शेषनाग ने जिज्ञासा प्रकट की !

“मैं शंकर भगवान जी के साथ ऊपर पर्वत पर बैठी थी कि मेरे पैर पर पानी की एक बूंद आकर गिरी ! मैने जब शंकर जी से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि नीचे समुन्द्र में एक मगरमच्छ ने छलांग लगाई थी ! जिससे पानी उछल कर ऊपर की ओर आया ! वह मगरमच्छ कितना बलशाली है ! और ऐसे कई मगरमच्छ समुद्र में रहते हैं ! उसी समुद्र की लहरों के हजारो-लाखों थपेडों को यह पर्वत सहते हैं ! ऐसे कई पर्वत पृथ्वी पर आसन जमाए बैठे हैं ! वही पृथ्वी केवल तुम्हारे शीश पर टिकी हुई है ! तुम ही सबसे बलशाली हो ! तुम महान हो ! तुम महाशक्ति हो” पार्वती ने सारी कहानी दोहरा दी !

शेषनाग हाथ जोड कर दंडवत प्रणाम करके पार्वती माता के चरणों मे लोट गया और बोला –
“हे मां, आप ऐसा कहकर मुझे पाप का भागी बना रही हैं ! मैं तो एक अदना सा प्राणी हूं ! मेरी ऐसी बिसात कहां ! असल महाशक्ति तो आपके पति शंकर भगवान हैं !”
“शंकर भगवान ? वो कैसे ?” मां ने प्रश्न किया !
“मेरे जैसे कई सर्प, कई नाग उनके गले में लिपटे रहते हैं, उनके शरीर पर रेंगते रहते हैं ! आप कहां भटक गईं माता ! महाशक्ति तो शंकर भगवान हैं !” शेषनाग का उत्तर सुनकर ऐसा लगा जैसे पार्वती के सोचने की शक्ति समाप्त हो गई थी ! वे वापिस आकर शंकर भगवान के चरणों में गिर पडीं ! * राजेश मिश्रा 

जब शंकर भगवान ने शुक्राचार्य को निगल लिया था


दानव गुरु शुक्राचार्य के संबंध में काशी खंड महाभारत जैसे ग्रंथों में कई कथाएं वर्णित हैं। शुक्राचार्य भृगु महर्षि के पुत्र थे। देवताओं के गुरु बृहस्पति अंगीरस के पुत्र थे। इन दोनों बालकों ने बाल्यकाल में कुछ समय तक अंगीरस के यहां विद्या प्राप्त की। आचार्य अंगीरस ने विद्या सिखाने में शुक्र के प्रति विशेष रुचि नहीं दिखाई। असंतुष्ट होकर शुक्र ने अंगीरस का आश्रम छोड़ दिया और गौतम ऋषि के यहां जाकर विद्यादान करने की प्रार्थना की।

गौतम मुनि ने शुक्र को समझाया कि बेटे इस समस्त जगत के गुरु केवल ईश्वर ही हैं। इसलिए तुम उनकी आराधना करो। तुम्हें समस्त प्रकार की विद्याएं और गुण खुद ही प्राप्त होंगे। गौतम मुनि की सलाह पर शुक्र ने गौतमी तट पर पहुंचकर शिव जी का ध्यान किया। शिव जी ने प्रत्यक्ष होकर शुक्र को मृत संजीवनी विद्या का उपदेश दिया। शुक्र ने मृत संजीवनी विद्या के बल पर समस्त मृत राक्षसों को जीवित करना आरंभ किया।

परिणाम स्वरूप दानव अहंकार के वशीभूत हो देवताओं को यातनाएं देने लगे क्योंकि देवता और दानवों में सहज ही जाति-वैर था। इसके बाद देवता और दानवों में निरंतर युद्ध होने लगे। मृत संजीवनी विद्या के कारण दानवों की संख्या बढ़ती ही गई। देवता असहाय हो गए। वे युद्ध में दानवों को पराजित नहीं कर पाए। देवता हताश हो गए। कोई उपाय ने पाकर वे शिव जी की शरण में गए क्योंकि शिव जी ने शुक्राचार्य को मृत संजीवनी विद्या प्रदान की थी।

देवताओं ने शिव जी से शिकायत कि महादेव आपकी विद्या का दानव लोग दुरुपयोग कर रहे हैं। आप तो समदर्शी हैं। शुक्राचार्य संजीवनी विद्या से मृत दानवों को जिलाकर हम पर भड़का रहे हैं। यही हालत रही तो हम कहीं के नहीं रह जाएंगे। कृपया आप हमारा उद्धार कीजिए। शुक्राचार्य द्वारा मृत संजीवनी विद्या का इस प्रकार अनुचित कार्य में उपयोग करना शिव जी को अच्छा न लगा।

शिव जी क्रोध में आ गए और शुक्राचार्य को पकड़कर निगल डाला। इसके बाद शुक्राचार्य शिव जी की देह से शुक्ल कांति के रूप में बाहर आए और अपने निज रूप को प्राप्त किया। शुक्राचार्य के संबंध में एक और कथा इस प्रकार है। शुक्राचार्य ने किसी प्रकार छल-कपट से एक बार कुबेर की सारी संपत्ति का अपहरण किया। कुबेर को जब इस बात का पता चला तब उन्होंने शिव जी से शुक्राचार्य की करनी की शिकायत की।

शुक्राचार्य को जब मालूम हुआ कि उनके विरुद्ध शिव जी तक शिकायत पहुंच गई तो वे डर गए और शिव जी के क्रोध से बचने के लिए झाड़ियों में जा छिपे। आखिर वे इस तरह शिव जी की आंख बचाकर कितने दिन छिप सकते थे। एक बार शिव जी के सामने पड़ गए। शिव स्वभाव से ही रौद्र हैं। शुक्राचार्य को देखते ही शिव जी ने उनको पकड़कर निगल डाला। शिव जी की देह में शुक्राचार्य का दम घुटने लगा। उन्होंने महादेव से प्रार्थना की कि उनको शिव जी की देह से बाहर कर दें।

शिव जी का क्रोध शांत नहीं हुआ। उन्होंने गुस्से में आकर अपने शरीर के सभी द्वार बंद किए। अंत में शुक्राचार्य मूत्रद्वार से बाहर निकल आए। इस कारण शुक्राचार्य पार्वती-परमेश्वर के पुत्र समान हो गए। शुक्राचार्य को बाहर निकले देख शिव जी का क्रोध फिर से भड़क उठा। वे शुक्राचार्य की कुछ हानि करें इस बीच पार्वती ने परमेश्वर से निवेदन किया कि यह तो हमारे पुत्र समान हो गया है। इसलिए इस पर आप क्रोध मत कीजिए। यह तो दया का पात्र है।

पार्वती की अभ्यर्थना पर शिव जी ने शुक्राचार्य को अधिक तेजस्वी बनाया। अब शुक्राचार्य भय से निरापद हो गए थे। उन्होंने प्रियव्रत की पुत्री ऊर्जस्वती के साथ विवाह किया। उनके चार पुत्र हुए-चंड, अमर्क, त्वाष्ट्र और धरात्र। एक कथा शुक्राचार्य के संबंध में इस प्रकार है। एक बार वामन ने राजा बलि के पास जाकर तीन कदम रखने की पृथ्वी मांगी।

जब यह समाचार शुक्राचार्य को मिला। उन्होंने राजा बलि को समझाया कि राजन सुनो आपसे तीन कदम जमीन मांगने वाले व्यक्ति नहीं हैं। वे नर भी नहीं। भूल से भी सही उनको एक कदम रखने की जमीन तक मत देना। नीति शास्त्र बताता है कि वारिजाक्ष, विवाह, प्राण, मान तथा वित्त के संदर्भ में झूठ बोला जा सकता है इसलिए मेरी सलाह मानकर याचक को जमीन का दान देने से अस्वीकार करो।

शुक्राचार्य ने राजा बलि को इस तरह अनेक प्रकार से समझाया परंतु राजा बलि अपने वचन के पक्के थे और साथ ही ज्ञानी भी। इसलिए उन्होंने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया कि यदि याचक नर न होकर नारायण ही हों तो और अधिक उत्तम। यदि उनके हाथों में मेरा कुछ अहित भी होता है तो वह मेरा भाग्य ही माना जाएगा। इसलिए ऐसे सुअवसर से मैं वंचित होना नहीं चाहता। मैं अपने वचन का पालन हर हालत में करना चाहूंगा। यह कहकर राजा बलि ने प्रसन्नतापूर्वक वामन को तीन कदम रखने की भूमि दान कर दी।

इससे दानवार्च शुक्र चिंता में पड़ गए। उन्होंने संकल्प किया कि किसी प्रकार से राजा बलि का उपकार करना चाहिए। चह विचार करके वे मक्खी का रूप धरकर कमंडल की टोंटी से जलधारा के गिरने से अटक गए। टोंटी से जल के न गिरते देख राजा बलि ने तीली लकेर कमंडल की टोंटी में घुसेड़ दिया। तीली मक्खी की आंख में चुभ गई और आंख छितर गई। परिणामस्वरूप दानवाचार्य शुक्र काना बन गए। तब से दानवाचार्य काना शुक्राचार्य कहलाए।

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