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24 जून 2014

Hartalika Teej : Parvatiji Ka jab Sakhiyon ne Apharan kiya

पार्वती की सखी ने किया था उनका हरण, तब से मनाया जा रहा है हरतालिका तीज

भविष्योत्तर पुराण के अनुसार भाद्र शुक्ल तृतीया को 'हरतालिका' का व्रत किया जाता है। इस व्रत को सौभाग्‍यवती स्त्रियां ही करती हैं। लेकिन कहीं-कहीं कुमारी कन्या भी इस व्रत को करती है। ऐसी मान्यता है है कि इस व्रत को करने से सुहागिन स्त्रियां सौभाग्यवती बनती है और उनके पति की उम्र लंबी होती है। कुमारी कन्याओं की विवाह शीघ्र हो जाती है। इस दिन मां गौरी व भगवान शंकर का पूजन किया जाता है। इस व्रत को 'हरतालिका' इसलिए कहते हैं कि पार्वती की सखी उसे पिता प्रदेश से हर कर घनघोर जंगल में ले गई थी। हरत अर्थात हरण करना और आलिका अर्थात् सखी, सहेली। इसे बूढ़ी तीज भी कहते हैं। इस दिन सासें बहुओं को सुहागी का सिंधरा देती हैं। बहुएं पांव छूकर सास को रुपए देती है।

हरतालिका तीज व्रत की कथा

भगवान शिव ने पार्वती जी को उनके पूर्वजन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी। भगवान भोले शंकर बोले, हे गौरी, पर्वतराज हिमालय पर स्थित गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्षों तक अधेमुखी होकर घोर तप किया था। इतनी अवधि तुमने अन्न न खाकर पेड़ों के सूखे पत्ते चबाकर व्यतीत किए।

माघ की विकराल शीतलता में तुमने निरन्तर जल में प्रवेश करके तप किया। बैसाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मूसलाधर वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न जल ग्रहण किए समय व्यतीत किया। तुम्‍हारी इस कष्ट साध्य तपस्या को देखकर तुम्हारे पिता बड़े दु:खी होते थे, उन्हें बड़ा क्लेश होता था। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या तथा पिता के क्लेश को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे।
नारदजी ने कहा,गिरिराज, मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा कठोर तप किया है। इससे प्रसन्न होकर वे आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस सन्दर्भ में मैं आपकी राय जानना चाहता हूं।
महामुनि जी की बात सुनकर गिरिराज गदगद हो उठे। उनके तो जैसे सारे क्लेश की दूर हो गए। प्रसन्नचित होकर वे बोले यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं, तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात् ब्रह्मा हैं।
नारदजी तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर विष्णु जी के पास गए और उनसे तुम्हारे ब्याह के निश्चित होने का समाचार कह सुनाया। मगर इस विवाह संबंध की बात जब तुम्हारे कान में पड़ी तो तुम चिंतित हो उठी।
तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा। तब तुमने बताया, मैंने सच्चे हृदय से भगवान शिव शंकर का वरण किया है, किन्तु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णु से निश्चित कर दिया। मैं विचित्र धर्म संकट में हूं। अब क्या करूं प्राण छोड़ देने के अतिरिक्त अब कोई भी उपाय शेष नहीं बचा है।
तुम्हारी सखी बड़ी ही समझदार और सूझबूझ वाली थी। उसने कहा, सखी प्राण त्यागने का इसमें कारण ही क्या है । संकट के मौके पर धैर्य से काम लेना चाहिए। नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति रूप में हृदय से जिसे एक बार स्वीकार कर लिया, जीवनपर्यन्त उसी से निर्वाह करें। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो ईश्वर को भी समर्पण करना पड़ता है। मैं तुम्हे घनघोर जंगल में ले चलती हूं, जहां साधना में लीन हो जाना। मुझे विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे।
तुमने ऐसा ही किया।


तुम्हारे पिता तुम्हें घर पर न पाकर बड़े दु:खी तथा चिन्तत हुए। वे सोचने लगे कि जाने कहां चली गई। मैं विष्णु जी से उसका विवाह करने का प्रण कर चुका हूं । यदि भगवान बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर न हुई तो बड़ा अपमान होगा। मैं तो कहीं मुंह दिखाने के योग्य भी नहीं रहूंगा। यही सब सोचकर गिरिराज ने जोर-शोर से तुम्हारी खोज शुरू करवा दी।
इधर तुम्हारी खोज होती रही और उधर तुम अपनी सखी के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराध्ना में लीन थी। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निमार्ण करके व्रत किया। रातभर मेरी स्तुति के गीत गाए।
तुम्हारी इस कष्टसाध्य तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन डोलने लगा। मेरी समाधि टूट गई। मैं तुरन्त तुम्हारे समक्ष जा पहुंचा और तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर तुमसे वर मांगने के लिए कहा। तब अपनी समस्या के पफलस्वरूप मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा, मैं हृदय से आपको पति के रूप् में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर यहां पधरे हैं तो मुझे अपनी अर्धंगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए। तब मैं तथास्तु कहकर कैलाश पर्वत पर लौट आया।
प्रात: होते ही तुमने पूजा की समस्त साम्रगी को नदी में प्रवाहित करके अपनी सहेली सहित व्रत का समापन किया। उसी समय अपने मित्रों व दरबारियों सहित गिरिराज तुम्हें खोजते हुए वहां पहुंचे। तुम्हारी दशा को देख कर गिरिराज अत्‍यधिक दु:खी हुए थे। पीड़ा के कारण उनकी आंखों में आंसू उमड़ आये थे।
तुमने उनके आंसू पोंछते हुए विनम्र स्वर में कहा, पिताजी मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या का उद्देश्य केवल यही था कि मैं महादेव को पति रूप में पाना चाहती थी। आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूं। आप विष्णुजी से मेरा विवाह करने का निर्णय ले चुके थे। इसलिए मैं अपने आराध्य की खोज में घर छोड़कर चली आई। अब मैं आपके साथ इसी शर्त पर घर जाऊंगी कि आप मेरा विवाह विष्णुजी से न करके महादेव जी से करेंगे।
भगवान शिव ने कहा, गिरिराज मान गए और तुम्हें घर ले गए। कुछ समय के पश्चात दोनो को विवाह सूत्र में बांध दिया। हे पार्वती, भ्रादपद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराध्ना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्‍वरूप मेरा तुमसे विवाह हो सका। इसका महत्व यह है कि मैं इस व्रत को करने वाली कुमारियों को मनोवांछित फल देता हूं। इसीलिए सौभाग्य की इच्छा करने वाली प्रत्येक युवती को यह व्रत पूर्ण निष्ठा एवं आस्था से करना चाहिए।

शिव लिंग की उत्‍पत्ति और महिमा

Mount Kailash Mansarovar

शिवलिंग भगवान शंकर का प्रतीक है। शिव का अर्थ है - 'कल्याणकारी'। लिंग का अर्थ है - 'सृजन'। सर्जनहार के रूप में उत्पादक शक्ति के चिन्ह के रूप में लिंग की पूजा होती है। स्कंद पुराण में लिंग का अर्थ लय लगाया गया है। लय ( प्रलय) के समय अग्नि में सब भस्म हो कर शिवलिंग में समा जाता है और सृष्टि के आदि में लिंग से सब प्रकट होता है। लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और ऊपर प्रणवाख्य महादेव स्थित हैं।

वेदी महादेवी और लिंग महादेव हैं। अकेले लिंग की पूजा से सभी की पूजा हो जाती है। पहले के समय में अनेक देशों में शिवलिंग की उपासना प्रचलित थी। जल का अर्थ है प्राण। शिवलिंग पर जल चढ़ाने का अर्थ है परम तत्व में प्राण विसर्जन करना। स्फटिक लिंग सर्वकामप्रद है। पारा लिंग से धन, ज्ञान, ऐश्वर्य और सिद्धि प्राप्त करता है।

आदिकाल में ब्रह्मा ने सबसे पहले महादेव जी से संपूर्ण भूतों की सृष्टि करने के लिए कहा। स्वीकृति देकर शिव भूतगणों के नाना दोषों को देख जल में मग्न हो गये तथा चिरकाल तक तप करते रहे। ब्रह्मा ने बहुत प्रतीक्षा के उपरांत भी उन्हें जल में ही पाया तथा सृष्टि का विकास नहीं देखा तो मानसिक बल से दूसरे भूतस्त्रष्टा को उत्पन्न किया। उस विराट पुरुष ने कहा- 'यदि मुझसे ज्येष्ठ कोई नहीं हो तो मैं सृष्टि का निर्माण करूंगा।' 

Mahakaleshwar Shivling

ब्रह्मा ने यह बताकर कि उस 'विराट पुरुष' से ज्येष्ठ मात्र शिव हैं, वे जल में ही डूबे रहते हैं, अत: उससे सृष्टि उत्पन्न करने का आग्रह किया है। उसने चार प्रकार के प्राणियों का विस्तार किया। सृष्टि होते ही प्रजा भूख से पीड़ित हो प्रजापति को ही खाने की इच्छा से दौड़ी। तब आत्मरक्षा के निमित्त प्रजापति ने ब्रह्मा से प्रजा की आजीविका निर्माण का आग्रह किया। ब्रह्मा ने अन्न, औषधि, हिंसक पशु के लिए दुर्बल जंगल-प्राणियों आदि के आहार की व्यवस्था की। उत्तरोत्तर प्राणी समाज का विस्तार होता गया।

शिव तपस्या समाप्त कर जल से निकले तो विविध प्राणियों को निर्मित देख क्रुद्ध हो उठे तथा उन्होंने अपना लिंग काटकर फेंक दिया जो कि भूमि पर जैसा पड़ा था, वैसा ही प्रतिष्ठित हो गया। ब्रह्मा ने पूछा-'इतना समय जल में रहकर आपने क्या किया, और लिंग उत्पन्न कर इस प्रकार क्यों फेंक दिया?'

शिव ने कहा-'पितामह, मैंने जल में तपस्या से अन्न तथा औषधियां प्राप्त की हैं। इस लिंग की अब कोई आवश्यकता नहीं रही, जबकि प्रजा का निर्माण हो चुका है।' ब्रह्मा उनके क्रोध को शांत नहीं कर पाये। सत युग बीत जाने पर देवताओं ने भगवान का भजन करने के लिए यज्ञ की सृष्टि की। यज्ञ के लिए साधनों, हव्यों, द्रव्यों की कल्पना की। वे लोग रुद्र के वास्वविक रूप से परिचित नहीं थे, अत: उन्होंने शिव के भाग की कल्पना नहीं की। 

परिणामत: क्रुद्ध होकर शिव ने उनके दमन के लिए साधन जुटाने प्रारंभ कर दिये। उन्हें धनुष उठाए। यह देख पृथ्वी भयभीत होकर कांपने लगी। देवताओं के यज्ञ में, वायु की गति के रुकने, समिधा आदि के प्रज्वलित न होने, सूर्य, चंद्र आदि के श्रीहीन होने से व्‍यवधान उत्पन्न हो गया। देवता भयातुर हो उठे। रुद्र ने भयंकर बाण से यज्ञ का हृदय भेद दिया- वह मृग का रूप धारण कर वहां से भाग चला। रुद्र ने उसका पीछा किया- वह मृगशिरा नक्षत्र के रूप में आकाश में प्रकाशित होने लगा।

Lord Shiva and Shivling

रुद्र उसका पीछा रकते हुए आर्द्रा नक्षत्र के रूप में प्रतिभासित हुए। यज्ञ के समस्त अवयव वहां से पलायन करने लगे। रुद्र ने सविता की दोनों बांहें काट डालीं तथा भग की आंखें और पूषा के दांत तोड़ डाले। भागते हुए देवताओं का उपहास करते हुए शिव ने धनुष की कोटि का सहारा ले सबको वहीं रोक दिया। तदनंतर देवताओं की प्रेरणा से वाणी ने महादेव के धनुष की प्रत्यंचा काट डाली, अत: धनुष उछलकर पृथ्वी पर जा गिरा। 

तब सब देवता मृग-रूपी यज्ञ को लेकर शिव की शरण में पहुंचें शिव ने उन सब पर कृपा कर अपना कोप समुद्र में छोड़ दिया जो बड़वानल बनकर निरंतर उसका जल सोखता है। शिव ने पूषा को दांत, भग की आंखें तथा सविता को बांहें प्रदान कर दीं तथा जगत एक बार फिर से सुस्थिर हो गया।

सती वियोग में शिव

सती की मृत्यु के उपरांत उनके वियोग में शिव नग्न रूप में भटकने लगे। वन में घूमते शिव को देख मुनिपत्नियां आसक्त होकर उनसे चिपट गयीं। यह देखकर मुनिगण रुष्ट हो उठे। उनके शाप से शिव का लिंग पृथ्वी पर गिर पड़ा। लिंग पाताल पहुंच गया। शिव क्रोधवश तरह-तरह की लीला करने लगे। पृथ्वी पर प्रलय के चिह्न दिखायी दिए। देवताओं ने शिव से प्रार्थना की कि वे लिंग धारण करें। वे उसकी पूजा का आदेश देकर अंतर्धान हो गये। कालांतर में प्रसन्न होकर उन्होंने लिंग धारण कर लिया तथा वहां पर प्रतिमा बनाकर पूजा करने का आदेश दिया।
साभार: भारत डिस्‍कवरी

अज्ञान का नाश करता है शिव का तीसरा नेत्र

क्रोध के कारण शिव का तीसरा नेत्र खुला   

रामचरित मानस के अनुसार तारका नाम का एक असुर हुआ उसने सभी देवताओं को हराकर तीनों लोकों को जीत लिया। वह अमर था। इसीलिए देवता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे। आखिर में सभी देवता उसके आतंक से परेशान होकर ब्रह्माजी के पास पहुंचे। तब ब्रह्माजी ने देवताओं को बताया कि इस असुर का संहार सिर्फ शिव पुत्र के द्वारा ही हो सकता है। तब सभी देवता चिंतित हो गए क्योंकि सती के देह त्याग के बाद से शिव समाधि में बैठे थे। तब ब्रह्माजी बोले कि सती ने देह त्याग के बाद हिमाचल के यहां जन्म लिया है।

उन्होंने पार्वती के रूप में शिव को पाने के लिए बहुत तप किया लेकिन वे तो समाधि लगाकर बैठे हैं। इसलिए आप लोग जाकर कामदेव को शिवजी के पास भेजो ताकि उनके मन में काम का भाव उत्पन्न हो। इसके अलावा कोई उपाय नहीं है। देवताओं ने जब कामदेव को जाकर सारी बात बताई। तब कामदेव फूलों का धनुष लेकर निकल पड़े। उनके प्रभाव से सभी पशु-पक्षी काम के बस में हो गए। लेकिन जब कामदेव शिव के पास पहुंचे तो वे डर गए।

उन्होंने शिव को मनाने के लिए बसंत को भेजा लेकिन शिव की समाधि नहीं टूटी। जब कामदेव सारी कोशिश कर हार गए। तब उन्होंने शिव पर काम के पांच बाण चलाए। क्रोध के कारण शिव का तीसरा नेत्र खुलया और जैसे ही उन्होंने कामदेव को देखा तो वे जलकर भस्म हो गए। साधारण रूप में देखें तो शिव ईश्वर हैं और बुरे लोगों को अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से जलाकर भस्म कर देते है और यदि अलग तरह से देखने का प्रयत्न करें तो शिव का तीसरा नेत्र ज्ञान पुंज है जो अज्ञान का नाश करता है!

आस्था और विश्‍वास का केंद्र

तिरुपति बालाजी महाराज 
गोविन्द-गोविंदा- गोविंदा


तिरुपति बाला जी का रोम-रोम कर्ज में डूबा है! अपनी शादी के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। देवताओं के कहने पर कुबेर ने उनके लिए धन का इंतजाम किया और बालाजी श्रीनिवास वेंकटेश्‍वर ने उन्‍हें वचन दिया कि वह अपने भक्‍तों से प्राप्‍त दान से ही उनका कर्ज उतारेंगे। कहा जाता है, बालाजी को शादी के लिए कुबेर ने उस जमाने अर्थात चोल शासन काल के समय करीब 75 करोड़ रुपए की राशि दी थी! श्रीनिवास ने उनसे कहा, कलियुग का अंत होते ही वह उनका पूरा मूलधन वापस कर देंगे, लेकिन तब तक उन्‍हें ब्‍याज यानी सूद देते रहेंगे। बालाजी भक्‍तों से प्राप्‍त धन को अभी तक कुबेर को सूद के रूप में ही चुका रहे हैं। ब्रह्मा और शिव श्रीनिवास और कुबेर के बीच हुए इस लेने-देन के साक्षी बने। लेकिन सच पूछिए तो भगवान और भक्‍त के इस 'लेन-देने संबंध' में समाज को समृद्ध बनाने का दर्शन छिपा है!

चलिए बालाजी की शादी की रोचक कथा से इसकी शुरुआत करता हूं

पदमावती का जन्‍म: चोल राज आकाशराजा को कोई संतान नहीं था। उन्‍होंने श्रीशुक मुनि की आज्ञा से संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ किया। यज्ञ के अंत में यज्ञशाला में राजा द्वारा हल जोतने की परंपरा थी। हल जोतते समय हल का फल किसी कठोर वस्‍तु से टकराई। राजा ने जमीन खोदकर जब उसे निकाला तो वह एक छोटी पेटी यानी बक्‍सा था। पेटी को खोलने पर सहस्रदलवाले कमल में एक शिशु कन्‍या बिलखती हुई मिली। चोल राजा अति प्रसन्‍न हुए। चूंकि शिशु कन्‍या कमल के फूल में मिली थी इसलिए राजा ने उसका नाम पदमावती रखा।

श्रीनिवास और पदमावती की पहली मुलाकात: समय व्‍यतीत होता रहा और पदवावती कमल के फूल के समान खिलती हुई यौवन की दहलीज पर पहुंच गई। एक दिन पदमावती उद्यान में फूल चुन रही थी। उस वन में श्रीनिवास(बालाजी) आखेट के लिए गए थे। उन्‍होंने देखा कि एक हाथी एक युवती के पीछे पड़ा है और वह डर कर भाग रही है। श्रीनिवास जी ने वाण चलाकर हाथी के वेग को रोका और उस युवती यानी पदमावती की जान बचाई। श्रीनिवास और पदमावती ने एक-दूसरे को देखा और मन ही मन एक-दूसरे की सुंदरता पर रीझ गए। दोनों के मन में एक-दूसरे के लिए अनुराग यानी प्रेम उत्‍पन्‍न हो गया, लेकिन दोनों बिना कुछ कहे चुपचाप अपने-अपने घरों को लौट गए।
श्रीनिवास का विरह: 
श्रीनिवास अपने घर तो लौट आए, लेकिन उनका मन पदमावती में ही बस गया। वह रात-दिन उस युवती के बारे में ही सोचते रहते थे। अपनी बेचैनी को कम करने के लिए उन्‍होंने उस युवती का पता लगाने की तरकीब सोची और एक ज्‍योतिष का रूप धारण किया और लोगों का भविष्‍य बताने वाले के रूप में उस युवती को ढूंढने निकल पड़े। धीरे-धीरे एक अच्‍छे भविष्‍यवक्‍ता के रूप में श्रीनिवास की ख्‍याति चोल राज में फैल लगी।
पदमावती का विरह: दूसरी तरफ पदमावती को भी चैन नहीं था। उसकी आंखों के सामने भी उसी युवक का चेहरा घूमता रहता था। उसने खाना-पीना कम कर दिया था। वह सो नहीं पाती थी। धीरे-धीरे प्रेम विरह के कारण उसका शरीर कृशकाय होता चला गया। अपनी पुत्री की यह दशा राजा से देखी नहीं जा रही थी। ज्‍योतिष श्रीनिवास की प्रसिद्धि उनके कानों तक भी पहुंची। उन्‍होंने श्रीनिवास को अपने दरबार में बुलवा भेजा।
राजा ने कहा, 'मान्‍यवर मेरी पुत्री न कुछ खाती है न पीती है। वह किसी शोक के कारण व्‍यथित है। मुझसे उसका दुख देखा नहीं जाता, लेकिन क्‍या करूं वह किसी को कुछ बताती भी नहीं है।' श्रीनिवास ने कहा, ' हे राजन आप अपनी पुत्री को बुलाइए, जरा दूखूं तो आखिर उनके शोक का कारण क्‍या है।' मन ही मन श्रीनिवास को आभास हो गया कि कहीं यह उसकी मंजिल ही तो नहीं है।
राजा ने पदमावती को बुलवाया। श्रीनिवास की नजर ज्‍यों ही पदमावीत पर पड़ी वह मन ही मन बेहद खुश हुआ और सोचा कि चलो मेरी इस युवती की खोज के लिए की गई मेहनत सफल रही। उसने पदमावती का हाथ अपने हाथ में लिया, उसे कुछ देर पढने का उपक्रम करता रहा और बोला, '' हे राजन अपनी पुत्री प्रेम विरह में जल रही है।' पदमावती ने उसकी आवाज सुनी तो उसने नजरें ऊपर उठाई। श्रीनिवास को देखते ही उसने उसे पहचान लिया और प्रसन्‍न हो गई। अरसे बाद अपनी पुत्री की प्रसन्‍नता देख राजा को लगा कि ज्‍योतिष ने सही मर्ज पकड़ लिया है।
राजा ने कहा, ' आखिर मेरी पुत्री को किससे प्रेम है?'
'आपकी पुत्री एक दिन वन में फूल चुनने गई थी। तभी वहां एक हाथी पहुंचा और उन पर हमला कर दिया। आपके सैनिक और इनकी दासियां भाग खड़ी हुई। राजकुमारी घबरा गई थी, लेकिन तभी एक युवक धनुष वाण के साथ आया और उसने आपकी पुत्री को हाथी से बचा लिया''-श्रीनिवास ने कहा।
' हां ऐसी घटना मेरे सैनिकों ने बताई थी, लेकिन मेरी पुत्री के प्रेम से उस घटना का क्‍या तात्‍पर्य!'
' है राजन, उस घटना से ही इसका तात्‍पर्य है। आपकी पुत्री को अपनी जान बचाने वाले उसी युवक से प्रेम हुआ है।'
पदमावती शरमा कर अंदर चली गई।
राजा ने कहा, 'क्‍या आप उस युवक के बारे में कुछ बता सकते हैं?'
'हां, क्‍यों नहीं। वह कोई साधारण युवक नहीं, बल्कि शंख-चक्र धारी स्‍वयं भगवान विष्‍णु हैं तो इस समय बैकुंठ को छोड़कर मानव रूप में श्रीनिवास जी के नाम से पृथ्‍वी पर वास कर रहे हैं। आप निश्चिंत होकर अपनी पुत्री का विवाह उनसे करें। मैं इसकी व्‍यवस्‍था कर दूंगा।'
इस तरह श्रीनिवास और पदमावती की शादी तय हो गई।

शादी में कुबेर से लिया कर्ज उतारने के लिए ही भक्‍तों से धन लेते हैं बालाजी

(तिरुपति बालाजी दोनों हाथों से देते हैं धन, बस थोड़ा उनके लिए भी रख दीजिए! )
देवताओं को निमंत्रण: श्रीनिवास ने अपनी शादी की बात सभी देवी-देवताओं को बताने के लिए शुक मुनि (परम ज्ञानी तोता) को स्‍वर्ग लोग में भेज दिया। स्‍वर्ग लोक में श्रीनिवास जी की शादी का पता चलते ही देवी-देवता अत्‍यंत प्रसन्‍न हुए। देवी-देवता श्रीनिवास जी से मिलने पृथ्‍वी पर पहुंचे और उन्‍हें बधाई दी। लेकिन श्रीनिवास जी खुशी की जगह चिंता में मग्‍न बैठे थे।
देवताओं ने पूछा, '' हे भगवन इस खुशी के मौके पर आप इतने चिंतातुर क्‍यों है।''
श्रीनिवास जी ने कहा, '' बंधुओं चिंता की तो बात ही है। पदमावती कहां राजा की पुत्री है और मैं कहां एक साधारण मानव के रूप में जीवन व्‍यतीत कर रहा हूं। राजा की पुत्री से शादी करने और घर बसाने के लिए धन, वैभव और ऐश्‍वर्य की जरूरत है, वह मैं कहां से लाऊं।''
' बस इतनी-सी बात'- देवताओं ने कहा। 
' हम कुबेर से कह कर आपके लिए धन की व्‍यवस्‍था कर देंगे। इससे आपकी शादी भी हो जाएगी और ऐश्‍वर्य व वैभव भी आपके दास रहेंगे।'
ब्रहमा और शिव सहित सभी देवताओं ने कुबरे की स्‍तुति की, जिसके बाद कुबेर प्रकट हुए।
कुबेर ने ऋण देना स्‍वीकार किया: देवताओं ने श्रीनिवास जी की शादी की बात कुबरे को बताई और धन से सहायता करने की मांग की। कुबेर ने कहा, 'यह तो मेरा परम सौभाग्‍य होगा कि मैं भगवान विष्‍णु के काम आ सका। भगवन आप जितना स्‍वर्ण और धन चाहें, ले लें। कुबेर का खजाना आप ही का है! ''
'नहीं, कुबेर जी। मैं जरूरत के हिसाब से ही स्‍वर्ण और धन लूंगा और मेरी एक शर्त भी होगी!' 
' शर्त कैसी भगवन!'
' भगवान ब्रहमा और शिव साक्षी हैं। आप मुझ पर अहसान नहीं करेंगे, बल्कि मुझे ऋण के रूप में धन देंगे, जिसका पाई-पाई मैं ब्‍याज सहित चुकाऊंगा।'
' भगवन आप कैसी बात कर रहे हैं!'
मानव की कठिनाई को मैं महसूस करना चाहता हूं: ' नहीं मानव रूप में मैं कठिनाईयों का सामना करूंगा, जो कठिनाई मानव के जीवन में आता है। उन कठिनाईयो में धन की कमी और कर्ज का बोझ सबसे बड़ा है।'
' बुरा न मानें प्रभु, लेकिन जब आप ऋण पर धन लेने की बात कर रहे हैं तो फिर आपको यह भी बताना होगा कि आप यह धन चुकाएंगे कैसे। ऋणदाता को इसकी गारंटी भी तो चाहिए।'
भक्‍त और भगवान के बीच विश्‍वास से अधिक पारस्‍परिकता का है रिश्‍ता: श्रीनिवास ने कहा, '' यह ऋण मैं नहीं, मेरे भक्‍त चुकाएंगे, लेकिन वह भी मुझ पर कोई अहसान नहीं करेंगे बल्कि मैं उन्‍हें धनवान बनाऊंगा। ''
'कैसे?'- कुबेर जी ने आश्‍चर्य से पूछा।
' कलयुग के आखिरी तक पृथ्‍वी पर मेरी पहचान एक ऐसे देवता के रूप में होगी, जो धन, ऐश्‍वर्य और वैभव से परिपूर्ण है। मेरे भक्‍त मुझसे धन, वैभव और ऐश्‍वर्य की मांग करने आएंगे और मैं उन्‍हें यह अवश्‍य दूंगा। बदले में मेरे भक्‍त जो चढ़ावा चढ़ाएंगे वह मैं आपको ऋण के रूप में चुकाता रहूंगा।'
' परंतु भगवन आप मानव जाति पर विश्‍वास कर रहे हैं। यदि आपके भक्‍त आपके आशीर्वाद से धनवान होने के बाद चढ़ावा चढ़ाने आए ही न तो आप मेरा ऋण फिर कैसे चुका पाएंगे।'
' कुबेर जी ऐसा नहीं होगा। मेरे भक्‍तों की मुझमें अटूट श्रद्धा होगी। वह मेरे आशीर्वाद से प्राप्‍त धन में मेरा हिस्‍सा रखेंगे। शरीर त्‍यागने के बाद तिरुपति के तिरुपला पर्वत पर बाला जी के नाम से लोग मेरी पूजा करेंगे। मेरी मूर्ति उन्‍हें इसका अहसास कराती रहेगी कि मैं एक हाथ से धन देता हूं तो दूसरे हाथ से उनसे धन देने को भी कहता भी हूं। यह एक भक्‍त और भगवान की एक-दूसरे पर विश्‍वास से अधिक साझेदारी का रिश्‍ता है। इस रिश्‍ते में न कोई दाता है और न कोई याचक, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और सही मायने में एक भगवान और भक्‍त का रिश्‍ता भी ऐसा ही होना चाहिए। ''
ईश्‍वर के रहते यदि गरीबी है तो लोगों को ईश्‍वर का अहसास कभी नही होगा: ''भक्‍त की भक्ति और अराधना उस पर भगवान के कृपा और प्रेम की वर्षा करता है। कम से कम कलियुग में भगवान बालाजी के रूप में एक ऐसे अराध्‍य होंगे जो कृपा और प्रेम के साथ वैभव का दाता भी होगा। वह धन को त्‍यागने की नहीं, बल्कि धन से ऐश्‍वर्य पाने के लिए प्रेरित करेगा ताकि पूरे समाज में वैभव आए, दरिद्रता मिटे और गरीबी दूर हो।''
' वाह भगवन!'
'' हां, कुबेर जी यदि ईश्‍वर के रहते गरीबी, दुख और दरिद्रता है तो लोगों को ईश्‍वर का अहसास कभी नहीं होगा। एक गरीब व्‍यक्ति पहले अपनी रोटी की चिंता करेगा या धर्म की। अध्‍यात्‍म की ओर मन भी तभी जाता है जब पेट भरा हो। इसलिए हे कुबेर, कलियुग के आखिरी तक भगवान बालाजी धन, ऐश्‍वर्य और वैभव के दाता के देवता बने रहेंगे। मैं अपने भक्‍तों को धन से परिपूर्ण बनाऊंगा और मेरे भक्‍त दान देकर न केवल मेरे प्रति अपना ऋण उतारेंगे बल्कि मेरा ऋण उतारने में भी मदद करेंगे। यह एक भक्‍त और भगवान के परस्‍पर आश्रितता और विश्‍वास का रिश्‍ता है। कलियुग की समाप्ति के बाद मैं आपका मूलधन लौटा दूंगा।''
'' भगवन आप धन्‍य हैं। भक्‍त और भगवान के बीच एक ऐसे रिश्‍ते की कल्‍पना कभी न देखा और न सुना। यह तो एक ऐसा रिश्‍ता है, जोऊपर से तो केवल एक भक्‍त और भगवान के बीच भक्ति और विश्‍वास का रिश्‍ता दिखता है, लेकिन वास्‍तव में यह एक परस्‍पर साझेदारी से विकसित होने वाले समृद्ध समाज की रचना की सीख देता है। ''
'यही मेरा उद्देश्‍य भी है कुबेर जी! इस बार मानव रूप में पृथ्‍वी पर आने के पीछे का कारण भी यही है कि मैं कभी वैभव से परिपूर्ण रहे इस समाज को फिर से समृद्धि और ऐश्‍वर्य का दर्शन करा सकूं '- भगवान श्रीनिवास ने कहा।
भगवान श्रीनिवास और कुबरे के बीच हुई वार्ता के साथी स्‍वयं ब्रहृमा और शिव हैं। आज भी पुष्‍करिणी के किनारे ब्रह्मा और शिव बरगद के पेड़ के रूप में खड़े हैं। ऐसा कहा जाता है कि विकास के दौरान इन दोनों पेड़ों को जब काटा जाने लगा तो उनमें से खून की धारा फूट पड़ी। लोगों ने पेड़ काटना बंद किया। बाद में उसे देवता की तरह पूजा जाने लगा। आज भी बालाजी का दर्शन करने के लिए जाने वाले लोग इन दो बरगद के पेड़ों का दर्शन करते हैं।
बाद में बड़ी धूमधाम से श्रीनिवास और पदमावती की शादी हुइ्र, जिसमें ब्रहमा और शिव के अलावा सभी देवगण और मुनिगण शामिल हुए।

कलयुग में बालाजी एकमात्र भगवान हैं जो खुलकर कहते हैं कि '' हे भक्‍त तुम मुझसे घुमा-फिरा कर नहीं, बल्कि सीधे-सीधे घन, वैभव और ऐश्‍वर्य मांगो। मैं तुम्‍हें वह सब दूंगा, बस शर्त है कि तुम उसमें से मेरा एक भाग रख दो।'' बालाजी की मूर्ति आप देखेंगे तो उनका एक हाथ धन दे रहा है और दूसरा हाथ धन मांग रहा है।
वास्‍तव में भगवान बालाजी सही अर्थो में समाजवाद को चरितार्थ कर रहे हैं। स्‍पष्‍ट है यदि समाज में धन होगा ही नहीं जो उसका बंटवारा कैसे होगा? एक दरिद्र समाज दरिद्रता ही बांट सकता है! यही कारण है कि साम्‍यवाद और उसका परिष्‍कृत रूप समाजवाद सैद्धांतिक रूप से सभी को लुभाता जरूर है, लेकिन व्‍यावहारिक धरातल पर वह दुनिया में दम तोड़ता नजर आता है।
बाला जी की दूसरी शिक्षा भी बड़ी महत्‍वपूर्ण है। इस कलियुग में आप किसी पर न अहसान कीजिए और न अहसान लीजिए, बल्कि लोगों के बीच पारस्‍परिकता का संबंध विकसित कीजिए। पारस्‍परिकता के आधार पर विकसित संबंध कभी आपको चोट नहीं पहुंचाएगा, लेकिन जिस संबंध में अहसान होगा, सिद्धांत होगा और आदर्शवाद का धरातल होगा वह संबंध कभी भी एक फूल की भांति विकसित नहीं हो सकेगा।

आकर्षण का केन्द्र श्री वेंकटेश्वर मन्दिर

दर्शन तिरुपति बालाजी का 


तिरुपति वेंकटेश्ववर की गिनती विश्व के प्रसिद्ध मंदिर मे होती है। यह मन्दिर आन्ध्र प्रदेश के चित्तूर ज़िले के तिरुपति में स्थित है। तिरुमला के सात पर्वतों में से एक वेंकटाद्रि पर बना श्री वेंकटेश्वर मन्दिर यहाँ का सबसे बड़ा आकर्षण का केन्द्र है। इसलिए इसे सात पर्वतों का मन्दिर के नाम से भी जाना जाता है ।

मंदिर से जुड़े फैक्‍ट एक नजर में 

समुद्र तल से 3200 फीट ऊंचाई पर स्थित है । इस मन्दिर में स्थापित भगवान वेंकटेश्वर की मूर्ति में ही भगवान बसते हैं और वे यहाँ समूचे कलियुग में विराजमान रहेंगे।
श्री वेंकटेश्वर का यह पवित्र व प्राचीन मंदिर पर्वत की वेंकटाद्रि नामक सातवीं चोटी पर स्थित है, जो श्री स्वामी पुष्करणी नामक तालाब के किनारे स्थित है। 
इन तीर्थयात्रियों की देखरेख पूर्णतः टीटीडी के संरक्षण में है। 
वेंकट पहाड़ी का स्वामी होने के कारण ही इन्हें वैंकटेश्व र कहा जाने लगा। इन्हेंग सात पहाड़ों का भगवान भी कहा जाता है।
मंदिर परिसर में खूबसूरती से बनाए गए अनेक द्वार, मंडपम और छोटे मंदिर हैं। मंदिर परिसर में मुख्श् दर्शनीय स्थल हैं:पडी कवली महाद्वार संपंग प्रदक्षिणम, कृष्ण देवर्या मंडपम, रंग मंडपम तिरुमला राय मंडपम, आईना महल, ध्वजस्तंभ मंडपम, नदिमी पडी कविली, विमान प्रदक्षिणम, श्री वरदराजस्वामी श्राइन पोटु आदि। 
मन्दिर से सटे पुष्करणी पवित्र जलकुण्ड के पानी का प्रयोग केवल मन्दिर के कार्यों, जैसे भगवान की प्रतिमा को साफ़ करने, मन्दिर परिसर का साफ़ करने आदि के कार्यों में ही किया जाता है। इस कुण्ड का जल पूरी तरह से स्वच्छ और कीटाणुरहित है।
यहाँ पर बिना किसी भेदभाव व रोकटोक के किसी भी जाति व धर्म के लोग आ-जा सकते हैं, क्योंकि इस मन्दिर का पट सभी धर्मानुयायियों के लिए खुला है। 
मन्दिर के दर्शन के लिए तिरुमला पर्वतमाला पर पैदल यात्रियों के चढ़ने के लिए तिरुमला तिरुपती देवस्थानम नामक विशेष मार्ग बनाया गया है। 
तिरुपति बालाजी मंदिर की वार्षिक आय 650 करोड़ रुपए है। तिरुपति बालाजी का मंदिर भारत में दूसरा सबसे अमीर मंदिर है। मंदिर का 3000 किलो सोना अलग-अलग बैंकों में जमा है। साथ ही, 1000 करोड़ रु का फिक्स्ड डिपॉजिट है। हर साल मंदिर का ट्रस्ट चढ़ावे के रूप में लगभग 300 करोड़ रु, 350 किलोग्राम सोना और 500 किलोग्राम चांदी अर्जित करता है।

कैसे-कैसे पैकेज हैं तैयार

यहां के लिए चैन्नई से बहुत सारे पैकेज टूर उपलब्ध हैं। जिसमें वोल्वो एसीबस, एसीबस, साधारण बस और आईआरसीटीसी व टैक्सी के विकल्प मिले सबसे अच्छा पैकेज टूर आंध्र प्रदेश टूरिज्म का है, जिसमें वे शाम 6.30 बजे चैन्नई से चलते हैं और तकरीबन रात 11 बजे तिरुपति पहुँज जाते हैं, फ़िर एक शेयरिंग रुम दे देते हैं, जिसमें 2-3 लोग रुक सकते हैं! समूह के लिए अलग से व्युवस्था, हो जाती है। 

तिरुमाला जाने के लिए बसों का समय

सुबह सुबह 4 बजे बस से तिरुमाला की ओर रवाना होना होता है, तकरीबन सुबह 5.30 तक आप तक आप तिरुमाला पहुँच जायेंगे और फ़िर अगर आपको बाल देना है तो बाल देकर आप नहाकर तैयार हो जायें, और फ़िर स्पेमशल दर्शन जिसके लिए 300 रुपए की पर्ची लेनी होती है। यह पैकेज में ही शामिल होता है। इस टिकट से आप 1-2 घंटे में दर्शन कर वापस आ जाते हैं। 

अन्य- दर्शनीय स्थान

बालाजी के दर्शन के पश्चात इस टूर में तिरुपति में पद्मावती मंदिर और शिवजी के प्रसिद्ध मंदिर श्रीकालाहस्ती भी दर्शन करवाते हैं। और शाम 6 बजे तक तो वापस चैन्नमई भी छोड़ देते हैं। पैकेज की कीमत 1300 से 2000 के बीच रहती है। इसमें रात का खाना, सुबह का नाश्ता, शीघ्रदर्शनम टिकट और रात को ठहरने की व्यवस्था शामिल है। ध्या न रहे कि यहां के लिए करीब 3 पहले बुकिंग करवा लें वरना बाद में मुश्किल हो सकती है। 

कहां करें बुकिंग

चैन्नई में इनका ऑफ़िस है, जो कि टी.नगर में कैनरा बैंक के पास हैं। इनका फ़ोन नंबर है - o44-65439987। अभी यह पैकेज ऑनलाइन आरक्षण में उपलब्ध नहीं है। आपको यहाँ जाकर ही आरक्षण करवाना होगा।

अन्य पैकेज टूर

आंध्र प्रदेश्‍ का एक अन्य टूर पैकेज भी है। इसमें वे लोग आपको सुबह 5 बजे लेकर चलते हैं। इसमें 50 रुपए वाला दर्शन टिकट होता है। लौटते समय पद्मावती मंदिर के दर्शन करवाते हुए रात 11 बजे तक चैन्नई वापस आते हैं। इस टूर की कीमत 1050 रुपये है। इसमें सुबह का नाश्ता, दोपहर का खाना और 50 रुपये का विशेष दर्शन टिकट शामिल है। 

निजी ट्रेवल कंपनियाँ

इनके अलावा यहां बहुत सारे निजी ट्रेवल कंपनियाँ पैकेज टूर उपलब्ध करवाती हैं, जिसमें अधिकतर का पैकेज 1200 से शुरु हो जाता है। ये लोग टेम्पो ट्रेवलर में लेकर जाते हैं और सुबह 5 बजे निकलते हैं और वही रात 11 बजे तक वापस आते हैं। अधिकतर के पैकेज में भी सुबह का नाश्ता, दोपहर का खाना और 300 रुपये का शीघ्र दर्शन टिकट शामिल होता है। पर ध्यारन रहे ये सिर्फ दो ही जगह आपको लेकर जाएंग यानी तिरुपति बालाजी और पद्मावती मंदिर ले जाते हैं।

हमारी सलाह

आंध्रप्रदेश टूरिज्म का पैकेज सबसे अच्छा है और सुविधाएँ भी। अगर आप इतनी दूर आ रहे हैं तो श्रीकालाहस्ती मंदिर जरुर जाएं। आपने ऐसा मंदिर शायद ही कभी देखा होगा, विशाल, भव्य और प्राचीन। यहां जाने के लिए साधारण बस से भी जा सकते हैं जिससे 4-5 घंटे लगते हैं और अपने आप यह सब व्यवस्था कर सकते हैं, जिसमें अच्छी खासी बचत की संभावना है, क्योंकि बस का टिकट भी ज्यादा नहीं है और सब कुछ बहुत ही कम दामों पर उपलब्ध है।

ट्रेन का भी विकल्प है

आप यहां के लिए आईआरसीटीसी का पैकेज भी बुक करवा सकते हैं। इनका भी पैकेज 1 ही दिन का होता है। ये सप्तगिरी एक्सप्रेस से सुबह ले जाते हैं और तिरुपति बालाजी और पद्मावती मंदिर के दर्शन करवाकर रात 9 बजे तक चैन्नई पहुँच जाते हैं। यह पैकेज रेल टूरिज्म की साईट पर उपलब्ध है, पर अगर सप्ताहांत पर जाने का कार्यक्रम है तो पहले से ही आरक्षण करवाना होगा, क्योंकि बहुत ही जल्दी इसका आरक्षण खत्म हो जाता है। इसमें इसमें सुबह का नाश्ता, दोपहर का खाना और 50 रुपये का विशेष दर्शन टिकट शामिल है। और इसकी कीमत है 9०० रुपये से शुरू है।

रेलगाड़ी से अन्य स्थारनों से ऐसे पहुंचे

बालाजी दर्शन तिरुमाला पर होते हैं, जो कि तिरुपति से सात पहाड़ दूर है, तिरुपति रेलवे से बहुत अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। और अगर कहीं और से आ रहे हैं, तो रेनुगुंटा स्टेशन आपको पड़ेगा जहाँ से तिरुपति मात्र 15 कि.मी. है। तिरुपती चैन्नई से लगभग 140 कि.मी. है और बैगलोर से लगभग 260 कि.मी.। बैंगलोर से भी पैकेज टूर उपलब्ध हैं जैसे कि चैन्नई से, वहाँ से आन्ध्राप्रदेश टूरिज्म, कर्नाटक टूरिज्म और निजी ट्रेवल्स की सुविधाएँ ले सकते हैं, और अगर बड़ा ग्रुप है तो अपनी टैक्सी ज्यादा अच्छा विकल्प है। 

ठहरने की व्‍यवस्‍था

आमतौर पर लोग चैन्न ई से एक दिन का अपडाउन करते हैं, अगर तिरुपति में रुकना है तो आप ऑनलान कमरे का आरक्षण करवा सकते हैं, वैसे वहाँ नि:शुल्क कमरे भी उपलब्ध हैं और डोरमेट्री भी नि:शुल्क उपलब्ध है। 

तिरुपति से तिरुमाला तक का सफर 

तिरुपति से तिरुमाला तकरीबन 17 कि.मी. है। यहां के लिए वोल्वो बसे नहीं चलती। तिरुपति से बस स्टैंड से तिरुमाला की बस पकड़ सकते हैं, टिकट है 27 रुपये जो कि हर दो मिनट में उपलब्ध है। मंदिर देवस्थानम ट्रस्ट की ओर से भी एक बस चलती है जो कि फ़्री सर्विस है, वह हर आधे घंटे में उपलब्ध है। अगर आप अपनी टैक्सी या टैम्पो ट्रेवलर से जा रहे हैं तो तिरुमाला उसी से जा सकते हैं।

सुंदरसन दर्शन के लिए टिकट 

अगर सुंदरसन दर्शन करना है तो उसके लिये आपको 50 रुपये का टिकट तिरुपति रेलवे स्टेशन के पास काऊँटर से मिलेगा, और अगर बैंगलोर या चैन्नई से आ रहे हैं, तो तिरुपति देवस्थानम के कार्यालयों से जाकर ले सकते हैं। 50 रुपये का टिकट तिरुमाला में नहीं मिलता है। वहाँ केवल 50 रुपये का शीघ्रदर्शन टिकट ही मिलता है, जो कि केवल तिरुमाला में ही मिलता है, यह टिकट और किसी भी शहर में उपलब्ध नहीं है और न ही इस टिकट की ऑनलाइन बुकिंग होती है।

ठगों से ऐसे बचें 

तिरुमाला में किसी भी ठग का शिकार न बनें वहाँ पर तमिल, तेलेगु, हिन्दी और अंग्रेजी में सभी तरह के संदेश लिखे हुए हैं, किसी से कुछ भी पूछने की जरुरत नहीं पड़ती है। तिरुपति विश्व का दूसरा सबसे बड़ा धनी देवस्थान है, वहाँ पर भक्तों के लिये सभी सुविधाएँ मुफ़्त उपलब्ध हैं या फ़िर बहुत ही कम दामों पर। लूट तो हर जगह होती है, बस जरुरत है तो आपको ऐसे लोगों से बचने की।
यहां ठग टाइप के कुछ तत्वा की भी कोई कमी नहीं है, जैसा की आमतौर पर ऐसे स्थाोनों पर डेरा जमाए रहते हैं। आपसे वे कितना भी कहें कि वे जल्दीा दर्शन करवा देगा, केश देने में मदद करेगा, स्नाान पूजा अर्चना में मदद करेगा ठहरने में आदि उनकी बातों को अनसुना कर दें उनके जाल में बिलकुल न फंसे क्यों्कि एक बार आप उनके चंगुल में फंस गए पैसे की बर्बादी होगी और मूड खराब वह अलग। 

लोकल ट्रांस्‍पोर्ट 

तिरुमाला में बसें लगातार चलती रहती हैं, जिससे आप एक स्थान से दूसरे स्थान जा सकते हैं, वह भी मुफ़्त हैं, और बसें भी विशेष प्रकार की हैं, जैसे भगवान का खुद का रथ हो। तिरुपति से तिरुमाला पैदल भी जा सकते हैं, यह तकरीबन 15 कि.मी. है, अगर आप के पास सामान है तो तिरुपति में जहाँ से पैदल यात्रा शुरु करते हैं, वहाँ देवस्थानम के लगेज काऊँटर पर आप अपना सामान जमा करवा सकते हैं, और जब आप तिरुमाला पहुँचेंगे तो वहाँ लगेज काऊँटर से अपना समान वापस ले सकते हैं। यह दूरी तय करने में 4-5 घंटे लगते हैं।
पैदलयात्रियों के लिये सभी तरह की सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जगह जगह पीने का पानी उपलब्ध है, शौचालय हैं, आराम करने के लिये शेड उपलब्ध हैं, सुरक्षा के लिये जगह जगह कर्मी तैनात हैं। जरुरी उदघोषणाएँ समय समय पर होती रहती हैं। पूरे रास्ते चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध हैं। नाश्ते के लिये केंटीन भी पूरे रास्ते में उपलब्ध हैं।

सप्ताहांत में वहां पहुंचने से बचें

अगर संभव हो तो किसी भी त्योचहार या वीकेंड पर यहां जाने से बचें। क्योंहकि इन दिनों यहां जबरदस्ते भीड़ होती हैं। लोग दूर दूर से आते हैं, सप्ताहांत पर तो बहुत ही ज्यादा भीड़ रहती है। भक्तों का का सैलाब रहता है। 

तिरुपति में सुविधा केंद्र 

तिरुपति से निकलते हुए तिरुपति देवस्थानम की बहुत ही बड़ी इमारत है जिसमें वहाँ से आप बायोमेट्रिक वाले टिकट ले सकते हैं, और वहाँ रुक भी सकते हैं, यह देवस्थानम की तरफ़ से भक्तों के लिये तिरुपति में सुविधा है। 

तिरुपति से मंदिर तक मनोरम दृश्य

तिरुपति से बाहर निकलते ही आपको तिरुमाला की ओर बढ़ने पर मनोहारी दृश्य आते जांएगे। और इतना साफ़ शहर देख कर आपको आश्चर्य भी होगा। बहुत ही अच्छा रखरखाव है प्रशासन कार्य देखकर अच्छा लगता है। पैदल चलने वालों के लिये अलग से फ़ुटपाथ बना हुआ है, जिस पर पैदल यात्री जाते हुए दिखे थे। दायीं तरफ़ आपको मनमोहक पहाड़ियाँ दिखाई देंगी वहीं दूर से आपको मंदिर का भव्य द्वार नजर आ जाएगा। 

मंदिर से पहले टोला नाका

मंदिर से कुछ पहले यहाँ एक टोल नाका है, जहाँ पर चैकिंग होती है कि आपके पास नशेयुक्त पदार्थ तो नहीं है जैसे कि बीड़ी, सिगरेट, शराब, गुटका इत्यादि। सघन तलाशी होती है। फिर चाहे आप टैक्सी मैं हो बस में। पूरे रास्ते ऐसे लगभग आठ टोल बने हुए हैं, जिनमें न्यूानतम है। सबसे अच्छी बात यह है कि तिरुपति से तिरुमाला जाने का मार्ग अलग और आने का मार्ग अलग है, क्योंकि बहुत ही घुमावदार सड़कें हैं और बहुत सारे घाट पार करना होते हैं।
यकीन माने आपको यहां आकर लगेगा जैसे आप देवलोक में आ गये हैं। थोड़ा सा और ऊपर जाने पर दबाब महसूस होता है जैसा कि हवाई यात्रा के दौरान महसूस होता है। सड़क पर हमेशा एक तरफ़ पहाड़ की दीवार और दूसरी तरफ़ खाई मिली, सुरक्षा की दृष्टि से खाई की तरफ़ बड़े पत्थरों की दीवार और लोहे की गर्डर लगायीं हुई हैं।
अगर अपने वाहन या टैक्सी से जा रहे हैं आप कहीं भी अपनी टैक्सी न रोकें, क्योंकि सड़कें बहुत घुमावदार हैं, और दुर्घटना होने का बहुत डर रहता है। और एक बात जब तिरुपति टोल से निकलते हैं तो आपको अपना सामान कन्वेयर बेल्ट वाली एक्सरे मशीन से निकालना पड़ता है और अगर वहाँ के सुरक्षाकर्मियों को शक होगा तो वो समान की खोलकर तलाशी लेंगे।

अब आप पहुंच चुके हैं भगवान वेंकटेश के दर पर 

यहाँ पार्किंग फ़्री है उसका कोई पैसा नहीं देना पड़ता है। यहां पहुंच कर सबसे पहले शीघ्र दर्शनम का टिक्टर ले लें, अगर आपने पैकेज नहीं लिया हुआ है तो। इसके अलावा अग आप अपने केश यानी बाल देना चाहते हैं तो उसके लिए भी टोकन लेना होगा। स्ना।न आदि के बाद ही आप भगवान के दर्शन करें। 

केश कहां दें

यहाँ देवस्थानम है, जहां मुफ़्त में बाल दिये जाने की व्यवस्था है, जो कि तिरुपति देवस्थानम की ओर से दी जाती है, वहाँ अपने जूते उतारकर जाना पड़ता है। आप यहां कतार में खड़े हो जाएं। आप सीधे चलते जाएं हॉल से पहले आपको एक टोकन दिया जाएगा। और आधी ब्लेड, अंदर हाल में पहुँचे तो आप देखेगे कि बहुत से नाई केश उतार रहे होंगे।
टोकन पर जिस नाई का नंबर लिखा होता है आपको उसी के पास जाना है। वह भी आपसे कुछ ठगने की पूरी कोशिश करेगा मगर आपको उसे कुछ नहीं देना है। आपका मन हो 10-15 रुपए दे सकते हैं। केश देते समय आप अपनी दाड़ी भी बनवा लें उसका भी आपको अलग से कुछ नहीं देना होगा। हॉल से निकल वहीं से नीचे जाने का रास्ता था, जहाँ नहाने की व्यवस्था है। महिलाओं और पुरुषों के लिये अलग-अलग बाथरूम बने हुए हैं और गरम पानी भी उपलब्ध हैं। 

मंदिर में इन्हें ले जाना मना है

यहां कोई भी सामान आप क्‍लॉक रूम में जमा करवा सकते हैं। पर्स, बेल्ट इत्यादि चीजें न ले जायें तो बेहतर होगा, यहाँ किसी भी मंदिर में इलेक्ट्रानिक उपकरण और मोबाईल ले जाना निषेध है। इसलिये पहले ही इन सब चीजों को हटा दें। जिससे अगर गलती से भी चली जायें तो खोने का या लॉकर में रखने की दिक्कतों से बच सकते हैं।

खानेपीने की व्यवस्था 

पार्किंग के पास ही शापिंग कॉम्पलेक्स में इडली, बड़ा और सांभर चटनी आदि मिल जाते हैं।, रास्ते में छोटी छोटी दुकानें लगी हुई थीं। वहीं पर तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट की मुफ़्त भोजनशाला भी है और वहीं एक और बोर्ड लगा हुआ था, कि लोकल, एसटीडी काल करने के लिये इधर जायें, व्यवस्था देवस्थानम की ओर से है, एवं इसका कोई शुल्क नहीं है।

शॉपिंग 

तिलक लगाने वाले बहुत सारे लोग घूम रहे थे जो कि बालाजी की स्टाईल में तिलक लगा रहे थे। वहीं पास ही टोपियों की दुकान भी थी, जो नये नये टकले हुए थे, जिनके लिये टकलाना नया अनुभव था, उन्हें ठंड लग रही थी। हालांकि हम भी टकलाने के मामले में पुराने तो नहीं थे परंतु नये भी नहीं थे। इसलिये टकलाना बहुत ही अच्छा लग रहा था।

दर्शन रेट

आपको अंदर परिसर में ही 300 रुपए का बोर्ड दिखाई दे जाएगा। सुरक्षाकर्मी आपको पूरा सहयोग भी करते हैं। देखने में भले ही 300 रुपए वाली लाइन आपको लम्बी ही लगे मगर बाद में दूसरों से जल्दीर आपको दर्शन हो जाते हैं। लाइन में लगे लोग कोई “हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे” का जाप कर रहा होगा तो कोई “ऊँ वेंकटेश्वराय नम:” का जाप वहीं आपको कुछ समूह ऐसे भी मिलेंगे जो “गोविंदा गोविंदा” कहकर ध्यान आकर्षित कर रहे होंगे। 50 रुपये के सुन्दरसन टिकट की लाइन से दर्शन के लिये 5-6 घंटे लग जाते हैं। 

कब जाएँ अक्टूबर से मार्च 

सड़क मार्ग

तिरुपति वेन्कटेशवर मन्दिर चेन्नई से 150 किलोमीटर, हैदराबाद से 500 किलोमीटर और बेंगलोर से 250 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

हवाई अड्डा

निकट का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा चैन्नई है और घरेलू हवाई अड्डा तिरुपति है।

रेलवे स्टेशन
तिरुपति
प्रमुख बस्‍ा स्‍टेशन 

श्री वेंकटेश्वर बस स्टेशन, बालाजी लिंक बस स्टेशन, सप्तगिरि लिंक बस स्टेशन, श्री पद्मावती बस स्टेशन

मेरी ब्लॉग सूची

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