आपका स्वागत है...

मैं
135 देशों में लोकप्रिय
इस ब्लॉग के माध्यम से हिन्दू धर्म को जन-जन तक पहुचाना चाहता हूँ.. इसमें आपका साथ मिल जाये तो बहुत ख़ुशी होगी.. इस ब्लॉग में पुरे भारत और आस-पास के देशों में हिन्दू धर्म, हिन्दू पर्व त्यौहार, देवी-देवताओं से सम्बंधित धार्मिक पुण्य स्थल व् उनके माहत्म्य, चारोंधाम,
12-ज्योतिर्लिंग, 52-शक्तिपीठ, सप्त नदी, सप्त मुनि, नवरात्र, सावन माह, दुर्गापूजा, दीपावली, होली, एकादशी, रामायण-महाभारत से जुड़े पहलुओं को यहाँ देने का प्रयास कर रहा हूँ.. कुछ त्रुटी रह जाये तो मार्गदर्शन करें...
वर्ष भर (2017) का पर्व-त्यौहार (Year's 2016festival) नीचे है…
अपना परामर्श और जानकारी इस नंबर
9831057985 पर दे सकते हैं....

धर्ममार्ग के साथी...

लेबल

आप जो पढना चाहते हैं इस ब्लॉग में खोजें :: राजेश मिश्रा

07 अगस्त 2014

Radha or Gopiyon ke sang Krishna ki Maharaslila

राधा व गोपियों के संग महारासलीला
Rasleela : Maharasleela- Krishna_Radha_Gopiyan

एक दिन श्री वृषभानु भवन में श्रीराधा, मैया के पास उदास बैठी हैं, कारण एक ही है, श्री कृष्ण के प्रेम संबंधों की घर-घर में चर्चा, जिससे दुखी होकर मैया, राधा बेटी को समझाते हुए कहती हैं, तू वृषभानुजी की पुत्री है, राज राजेश्वरी है और कृष्ण ग्वाला ही तो है। मित्रता और नाते रिश्ते बराबर के कुल में ही उचित रहते हैं। इसलिए आज से उस कान्हा के साथ खेलना छोड़ अपनी सखियों के संग रहा करो। श्रीराधा ने मैया को अनेक तर्क देकर श्रीकृष्ण प्रेम संबंध के विषय में संतुष्ट कर दिया। फिर भी आज श्रीराधा रानी अपनी सखियों के संग जल विहार की इच्छा से यमुना पर जाती हैं। जल विहार प्रारंभ हुआ। सखियों के संग श्रीराधा ने जल में प्रवेश किया। ग्रीवा तक जल में खड़ी होकर एक-दूसरे पर जल उछाल-उछालकर क्रीड़ा करने लगीं।

इसी आनंद लीला में निमग्न सखियां यमुना के दूसरे तट पर पहुंच गर्इं। कृष्ण चर्चा में लीन इन सखियों को आभास ही नहीं हुआ कि सूर्यास्त कब हो गया। उनकी चिंता उस समय अपनी चरम सीमा पर पहुंची जब चंद्र देव अपनी पूर्ण आभा के साथ आकाश में उदित हो गए। अंधियारे को चीरकर चारों ओर शीतल चांदनी फैल गई। सबको अपने घर की याद आने लगी, मैया बाबा के गुस्से का सामना करना पड़ेगा, ऐसा विचार आते ही सब सखियां भय से थर-थर कांपने लगीं।’

ललिता, विसाखा, चंपकलता, चित्रा, रंगदेवी, सुदेवी, तुड्गविद्या, इंदुलेखा और श्रीराधारानी इस संकट से मुक्ति पाने का उपाय सोचने लगीं। उसी समय यमुना के दूसरे छोर से वंशी की ध्वनि सुनाई देने लगी, सखियां सतर्क हो गर्इं। उसी समय यमुना किनारे भगवान श्रीकृष्ण दिखाई पड़े। सिर पर मोर मुकुट, कानों में मकराकृत कुंडल और कटि में पीतांबर धारण किए अति शोभायमान लग रहे थे। इनके दर्शन से ब्रजबालाएं प्रेम मग्न हो गर्इं। इन सबने अपने नंदलाल से इस समय सहायता की याचना की। श्रीकृष्ण ने गोपियों को उस पार से लाने के लिए नाव की व्यवस्था की और उनकी ओर चल पड़े- ललिता सखी से कहने लगी, हे राधा रानी देखो कृष्ण नाव ले आए। श्रीराधा कृष्ण गोद में बैठ गर्इं। श्रीराधा को अपने प्रियतम की गोद में देख वंशी के स्वर मुखरित हो उठे। श्री राधा श्याम सुंदर से कहनी लगी, हे प्रियतम!
Radhe_Krishna

मेरी इक बात सुनो, श्रीकृष्ण मुस्कराकर पूछने लगे, हे प्रिये तुम क्या कहना चाहती हो, नि:संकोच होकर कहो, तुम ही मेरे प्राण और जीवन धन हो और देखो ऊपर आकाश में तुम्हारा भाई चंद्रमा भी तुम्हारे साथ है। हे राधे! लज्जा को त्यागकर अपने मन की बात कहो।

हे नाथ, आज मुझे महारासलीला का स्मरण हो आया। देखो, वही पूर्ण चंद्र, वही पूर्णमासी की रात्रि, वही यमुना का किनारा, वही सखियां, वही तुम और वही तुम्हारी राधा। हम सब आज पुन: उस सुख को भोगना चाहती हैं। श्रीराधा की ऐसी इच्छा जानकर श्रीकृष्ण हर्षित हो उठे! ललिता सखी अन्य सखियों को संबोधित करते हुए कहने लगी, हे सखियों, श्रीराधा और श्रीकृष्ण का प्रेम, सौंदर्य, गुण और स्वभाव सभी स्वाभाविक हैं। दोनों के शरीर भिन्न-भिन्न हैं, परंतु प्राण एक ही हैं। इसी बीच कान्हा की वंशी के स्वर मुखरित हो उठे। नाव, बीच धारा में हिचकोले लेने लगी, उसी समय देव वधुओं ने अपने-अपने वाद्य यंत्र सखियों को समर्पित कर दिए। मुरली के स्वर में स्वर मिलाकर सभी वाद्य यंत्र एक साथ बजने लगे। देवता अपनी पत्नियों सहित भगवान की इस दिव्य लीला के दर्शन हेतु आकाश में स्थिर हो गए।

थर-थर कांपती हुई घर आर्इं। पुत्री को पाकर माता हर्षित हो गई, उसे सांत्वना देते हुए अपने हृदय से लगा लिया। दोनों की आंखों से अश्रुधारा बह निकली। माता की आंखों में प्रेमाश्रु थे और पुत्री के आंसू की लीला वह स्वयं ही जाने! माता अथवा पिता उसके बाहर रहने का कारण पूछें, राधा ने विचार किया, उनसे पहिले वह अपनी व्यथा कथा सुना दे।

चतुर शिरोमणि राधा मगरमच्छी आंसू बहाती हुई कहने लगीं, मैया कल प्रात:काल मैं अपनी सखियों के संग यमुना किनारे खेलने गई थी। मैया तुमने ही तो कहा था कि अपनी सखियों के संग रहा करो, इसलिए उनके साथ ही हास्य विनोद में व्यस्त हो गई। इसी व्यस्तता में रात्रि हो गई। अंधेरे के कारण हम अपने घर का मार्ग भूलकर सारी रात मधुवन में भटकते रहे। चारों ओर अनेक पगडंडियां थीं, हम एक से दूसरी पर चलते रहे, लेकिन अपने गांव का मार्ग नहीं मिला। मैया उस बन में हिंसक जीव दिखाई देने लगे, डरावनी आवाजें आनी प्रारंभ हो गई। हम डर के मारे एक वृक्ष पर चढ़कर बैठ गर्इं।

सूर्योदय की प्रथम किरण के साथ हमें श्रीकृष्ण की वंशी के स्वर सुनाई देने लगे। पेड़ से उतरकर हम उसी दिशा में चल पड़े। कुछ दूर चलने के बाद एक वृक्ष के नीचे श्रीकृष्ण वंशी बजा रहे थे। हमने उन्हें अपनी व्यथा से अवगत कराया। उन्हें हमारे ऊपर दया आ गई। अभी-अभी हमें गांव के बाहर छोड़कर कहीं चले गए। पुत्री की इस व्यथा को सुनकर माता ने हृदय से लगाया और महल में ले जाकर पलंग पर सुला दिया। श्रीराधा को रात्रि जागरण की थकान तो थी ही, वह गहरी नींद में सो गर्इं।

दोपहर का समय हुआ। राधा जाग उठी, मैया ने अपने हाथों भोजन कराया। राधा भोजन करके बैठी ही थीं कि रात वाली सखियां भी आ गर्इं। राधा ने मैया को कैसे संतुष्ट किया, यह सुनकर सखियां कहने लगीं- राधा, अपनी चतुराई से तुमने हमको भी बचा लिया। हे राधारानी! तुम सचमुच में धन्य हो, तुम्हारे माता-पिता, जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया है, वह भी धन्य हैं। वह दिन, वह रात्रि, वह पल भी धन्य है, जब तुमने जन्म लिया था।

प्रात: काल होते ही ब्रज के हर घर में चर्चा होने लगती है कि कान्हा बड़े ही चंचल हैं, गोपियों के घरों में घुसकर माखन चुराकर खाते हैं। कई दिनों से श्रीकृष्ण का नाम सुनते ही राधा रानी विचित्र प्रेम का अनुभव करने लगी थीं। जहां भी श्रीकृष्ण की चर्चा होती, वह वहीं चली जातीं, वह मन ही मन विचार करने लगतीं कि श्रीकृष्ण कितना सुंदर, कितना मधुर, कितना सुखदायक नाम है। यमुना तट की ओर से आती वंशी ध्वनि सुनकर युवती गोपिकाएं कहतीं, ‘देखो राधा, ये श्रीकृष्ण की वंशी के ही स्वर हैं।’ जैसे-जैसे उनका अनुराग बढ़ता गया।
एक दिन की बात है, श्रीराधा यमुना तट पर जल भरने आई थीं। गोरी-गोरी छोटी-सी बालिका नीले रंग की साड़ी पहने अति आकर्षक लग रही थी। संयोग से कान्हा भी वहां आ गए। एक-दूसरे को देखकर दोनों ही अपनी सुध-बुध खो बैठे। कुछ देर बाद श्री श्याम सुंदर ने उन्हें अकेली देख पूछ ही लिया, ‘लली तुम कहां रहती हो?’ ‘हम बरसाना रहते हैं जी’ श्री राधा ने मधुर वाणी में उत्तर दिया।

‘तुम्हें आज से पहले कभी नहीं देखा, तुम किसकी पुत्री हो, अपना पूरा परिचय दो सुमुखी।’ श्रीकृष्ण के मुख मंडल की ओर निहारती हुई श्रीराधा कहने लगीं, मैंने अपने गांव का नाम तो बता ही दिया है, पिता का नाम श्री वृषभानुजी और माता का नाम है श्रीमती कीर्ती कुमारी।

श्रीकृष्ण ने तुरंत ही कहा, ‘और तुम्हारा नाम राधा है।’ वंशीवारे के मुख से अपना नाम सुनकर राधा के हृदय की धड़कन बढ़ गई, उन्होंने कंपन युक्त स्वर में पूछा, तुम कौन हो जी और मेरा नाम कैसे जानते हो? मंद-मंद मुस्कान भरे मुख की खनखनाती वाणी में श्याम कहने लगे-
तुम्हारे रूप और ऐश्वर्य की ख्याति सारे ब्रजमंडल में फैली हुई,
ऐसा कोई अभागा ही होगा, जो तुम्हारे नाम से परिचित न हो।


मैं श्री नंदरायजी का पुत्र कृष्ण हूं। कृष्ण का नाम सुनकर राधा कह उठीं, मैंने भी सुना था कि ब्रज में श्यामसुंदर नाम के एक बड़े चोर हैं। क्या तुम वही हो, जिसके नाम की चर्चा घर-घर में हो रही है। श्यामसुंदर ने हंसकर कहा, तुम भी मुझे चोर कहती हो, मैंने तुम्हारा क्या चुराया है? चोर तो ये हैं ही, इन्होंने प्रथम दृष्टि में मेरा मन चुरा लिया, परंतु सत्य को कैसे कहें यमुना किनारे दो चोर मिले हैं और जब एक ही जाति के दो जब मिलते हैं प्रीत होनी स्वाभाविक है। राधा बोलीं, हे श्यामसुंदर। अब मैं जाती हूं, राधा के मुख से ये वचन सुनकर कन्हैया विचलित हो गए। उन्होंने बड़े प्यार से कहा, अभी क्यों जाती हो राधा! आओ थोड़ी देर यमुना किनारे मिलकर खेलें। राधा ने सोचा, इसकी वाणी में कितना आकर्षण है, कितनी मोहकता है।

राधा ने विनम्रतापूर्वक कहा, मुझे अब जाने दो मोहन, मेरी मां प्रतीक्षा कर रही होगी। मैं फिर कभी आऊंगी, इतना कहकर राधा जैसे ही घूमी, श्याम ने उसकी नीली चुनरी पकड़कर रोक लिया। राधा ने चुनरी छुड़ाने का कोई प्रयत्न नहीं किया, शंकित दृष्टि से इधर-उधर देखकर कहा, अब मुझे छोड़ दो, मैं कल फिर आऊंगी, परंतु एक बात है कोई बहाना बनाकर माताजी की आज्ञा लेनी होगी। यह तो बहुत सरल बात है। श्याम ने कहा सुनो राधा, तुम्हारा खिरक हमारे खिरक के पास में ही है, गौओं को दुहाने के बहाने आ जाना, राधा ने कहा मैं सब जानती हूं, आ जाऊंगी, अब मुझे जाने दो कान्हा। राधा ने अपना हाथ छुड़ाना चाहा तो कान्हा ने उसकी चुनरी खींच ली। राधा ने कहा, देखो नंदलाला तुम ऐसे छेड़छाड़ करोगे तो मैं फिर कभी नहीं आऊंगी। राधा की प्यार भरी धमकी से कृष्ण डर गए। उन्होंने भूल से चुनरी की जगह अपना पीताम्बर उन्हें उढ़ा दिया। आज दोनों ही एक-दूसरे से बातें करते हुए अपने तन-मन की सुधि भूल गए। राधा को पता ही न लगा कि उन्होंने अपनी चुनरी की जगह श्रीकृष्ण का पीताम्बर ओढ़ रखा है और कृष्ण भी नहीं जान पाए कि उन्होंने राधा की चुनरी ओढ़ रखी है। राधा रानी अपने घर की ओर भाग गर्इं और कन्हैया माता यशोदा के पास आ गए। मैया ने कान्हा को चुनरी ओढ़े देखा पूछा, तू किसकी ओढ़नी ओढ़ आया रे, मैं तो समझी कोई छोरी मेरे घर में आ गई। चोरी पकड़ी देख कन्हैया सिटपिटा गए और कहने लगे, मैया अपनी जो सांवली गैया है न, वह आज बिदक कर जैसे ही भागने लगी, एक गोरी-सी छोरी की चूनरी उसके सींगों में उलझ गई, उसे रोता देख मैंने अपना पीताम्बर उढ़ा दिया और गाय को रोककर चुनरी मैंने ले ली। मैया मैं उस छोरी को जानता हूं, कल दे आऊंगा। मैया ने कहा, बहुत अच्छा किया बेटा, अपने घर में पीताम्बर बहुत हैं, नया निकाल ले। कन्हैया ने नया पीताम्बर धारण कर लिया और चुनरी को छिपा कर रख दिया।

उधर जैसे ही राधा ने घर में प्रवेश किया, मैया ने डांटना फटकारना प्रारंभ कर दिया। और जब बेटी के सिर पर पीताम्बर देखा तो मैया के क्रोध की सीमा नहीं रही, बहुत देर तक ताने मारने के बाद मैया जब शांत हुई तो राधा ने कहा, ‘मैया अब जरा मेरी भी सुन लो।’ मैया ने कहा ठीक है तू अपनी भी सुना। राधा ने कहा, ‘मैया मैं ललिता के साथ जब खिरक की ओर गई तो देखा चारों ओर गैयान के नीचे गोबर फैला पड़ा है, मैंने वह गोबर उठाकर वहां सफाई कर दी और फिर अपने हाथ-पैर धोने यमुना किनारे चली गई। मैया मैं जैसे ही जल में घुसने लगी, मैंने देखा एक काला सर्प मेरी ओर देख रहा है, मैं डरकर भागने लगी तो मेरी चुनरी जमुना में जा पड़ी और बह गई। मैं बाल-बाल बच गई मैया, नहीं तो वह काला सर्प आज मुझे डस ही लेता।’ मैया ने राधा को अपनी ओर खींचकर अपनी छाती से चिपटा लिया, राधा मैया की छाती में लिपटी हुई पुन: कहने लगी, मैया और सुन, ‘जब मैं डरकर भागने लगी तो सामने से एक सांवला-सा छोरा आ गया, मुझे नंगे सिर देख कहने लगा, अरे तू तो नंदबाबा की छोरी है। ले मेरे पीताम्बर से अपना सिर ढक ले। मैंने परिचित जान उसका पीताम्बर लेकर ओढ़ लिया और सुन मैया, मुझे डरी हुई देखकर अपनी खिरक के पास तक छोड़ने भी आया था, कह रहा था कि उनकी खिरक भी पास में ही है।’

अपनी बेटी को सकुशल देख मैया बार-बार मुख चूमने लगीं। स्थिति अनुकूल जान राधा ने मैया से पूछा, मैया तुम जानती हो, वह कारो-सो छोरा कौन है, मुझसे बार-बार कह रहा था, हमारे घर खेलने आना, मैंने तो कोई जवाब नहीं दिया, चुपचाप अपने घर आ गई।

मैया ने कहा बेटी, वह नंदबाबा का बेटा है, उसकी मैया यशोदा रानी मेरी सहेली है और उसका नाम है कृष्ण। बड़ा ही नटखट है, सारा ब्रज जानता है उसे। उनके यहां जाने में कोई बात नहीं है, अपना ही घर है। कल वहां खेलने चली जाना और एक नया पीताम्बर उसे दे आना। माता के मुख से अनुकूल वाणी सुन राधा प्रसन्न हो गर्इं। 

यही वह शुभ समय है, शुभ घड़ी है, जब श्रीराधा और श्रीकृष्ण की प्रेमलीला प्रारंभ हुई। माता के अनुकूल संकेत पर राधा जब भी इच्छा हो, जब भी अवसर मिलता, श्रीकृष्ण से मिलने जाने लगीं, उधर श्रीकृष्ण भी अनेक रूप धारण उनके अंत:पुर में चले जाते। इस प्रकार दोनों में स्नेह बढ़ने लगा, प्रेम में परस्पर कभी खेलने लगते, कभी-कभी झगड़ा भी कर बैठते थे। मान मनुहार होता और फिर यह मनुहार प्रणय रूप में परिणित हो गया। दोनों भिन्न होते हुए भी एक रूप हो गए। इनका प्रेम देखकर मैया बाबा ही नहीं, सारा ब्रजमंडल हर्षित हो गया।
ब्रज में जब से श्रीराधा और श्रीश्याम सुंदर का मिलन हुआ है, श्रीराधारानी अपने तन मन की सुधि ही भूल बैठी हैं। भूख और प्यास भी प्रेम की अनंत जल राशि में जैसे विलीन ही हो गई है। रात-दिन श्याम का स्मरण उनके हृदय को तड़पाता रहता है। जिन नैनन में श्याम बसे हों, उन नैनन में नींद कहां? श्री राधा की रात्रि श्रीकृष्ण विरह में तारे गिनते-गिनते व्यतीत हो जाती है। एक दिन की बात है, प्रात:काल की मधुर बेला में राधारानी अपनी गगरिया ले अकेली ही यमुना पर जल भरने चल पड़ीं। मार्ग में देखा, एक कदम्ब वृक्ष के नीचे बैठे श्रीकृष्ण वंशी बजा रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे वंशी के स्वरों में मुझे ही पुकार रहे हों।

मुझे अपने समीप देख उनकी वंशी के स्वर और मुखरित हो उठे, मानो मेरा स्वागत कर रहे हों। राधारानी ने आगे बढ़कर मोहन का हाथ पकड़ लिया और कहने लगीं -
प्रियतम मीठी नित याद तुम्हारी आती,
मैं पल पर तुमको कभी बिसान न पाती।
जगने में सपने में तुम मेरे प्यारे,
होते कभी न मुझसे पल भर न्यारे।।
दे दर्शन मुझको सदा परम सुख देते,
कर मीठी रस की बातें, दुख हर लेते।
देते रहते दिन-रात, स्पर्श सुख भारी,
निज हृदय खोल, कह देते मन की सारी।।
यों मिलने पर भी मिलने की अभिलाषा,
बढ़ती रहती ही है, नित्य मिलन की आशा।
नित मिलन पर भी स्मृति दूर न होती,
वह सदा तुम्हीं में प्यारे, जगती भी है और सोती।।
-‘पद रत्नाकर’

श्री राधा के मुख से ऐसे प्रेममय वचन सुनकर श्रीकृष्ण अधीर हो उठे। वे अपने स्थान से उठे और श्रीराधा को अपने हृदय से लगाकर अपनी भावना से अवगत कराते हुए कहने लगे प्राणाधिके!... प्रियतमे...

तेरे प्रेम-सुधा निधि में नित डूबा रहता मन मेरा।
मधुमय वाणी सुनने को नित चित्त लुभाता है मेरा।।
प्रेम छलकती आंखें तेरी नित मेरे सम्मुख रहती।
सदा समीप खड़ी तू मन भर, मन की सब बातें करती।।

हे राधे कभी तुम- आलिंगन करती, सुख देती, गलबइयां देकर मिलती। इधर श्रीराधा और माधव अपने-अपने मन की बातें करने में लीन थे, उधर भोर की लालिमा नभ में फैलते ही ललिता, बिसाखा, तुंगविद्या और चम्पकलता आदि सब सखियां यमुना से जल भरने के लिए श्रीराधा को उनके भवन से बुलाने गर्इं। ये सखियां जैसे ही भवन के मुख्य द्वार पर पहुंची, वहां खड़ी मैया कीर्तिजी को देख प्रणामकर राधा को बुलाने की विनती की। मैया तो इनको देखकर सहम गई और उन्हें संकेत कर कहने लगी, ललिता, राधा तो आज तारों की छांव में ही जल लेने चली गई। क्या आज वह तुम्हें छोड़ अकेली ही गई है, सखियों से तुरंत यमुना तट जाकर राधा को ढूंढ़ कर ले आओ, ऐसा न हो कि वह मार्ग में ही कहीं भटक जाए। ललिता ने मैया से कहा, हम शीघ्र ही उन्हें ढूंढ़कर ले आती हैं। मार्ग में चलते-चलते ये सखियां चर्चा करते हुए कहने लगीं, मैया को क्या मालूम कि उनकी लाडली बिटिया तो कब की भटक चुकी, आज भी यमुना पर नहीं, वंशीवट पर मिलेगी। कुछ ही पलों में ये सखियां जैसे ही वंशीवट पहुंची, वह राधा को श्री कृष्ण के कांधे पर अपना सिर रखे प्रेम में लीन देख आश्चर्यचकित हो गर्इं। श्रीकृष्ण ने जैसे ही सखियों को देखा, वह तुरंत ही अपने गैया बछड़ों को लेकर वन में प्रवेश कर गए। श्रीराधा लाज के मारे अपनी आंखे नीची कर वहीं बैठ गर्इं, सखियों ने कहा राधे, हमसे कैसा संकोच और कैसी लाज? तुम्हारे श्रीकृष्ण प्रेम मार्ग में हम बाधक नहीं, सहायक हैं। 

हे राधे, तुम इतनी भाग्यशाली होते हुए भी श्रीकृष्ण से इस समय मिलने का क्या औचित्य है। श्रीराधा ने कहा, हे सखियों मेरे मन की पीड़ा को समझने का प्रयास करो। घर पर मेरा मन नहीं लग रहा था। रात काटनी दूभर हो गई थी। प्रिय की याद में मन व्याकुल हो रहा था। जैसे सुबह होने को हुई, मैंने उसी समय गगरी उठाई और चल पड़ी वंशीवट की ओर। यहां आकर देखा कान्हा सचमुच ही विकल हो मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। मैं जैसे ही उनके समीप आई, वह,
वह करने लगे दुलार सहज मनुहार अपरिमित।
नहलाने बस लगे, प्रेम धारा में अविरत।।

उस समय मैं अपनी अंखियां मूंदे उनके प्रेम रस में डूबी अपरिमित सुख का अनुभव कर रही थी। श्रीकृष्ण को जैसे ही तुम्हारे आगमन का अनुमान हुआ, वह अपनी गैया बछड़े लेकर वन में प्रवेश कर गए और मैं यहां अकेली बैठी रह गई। सखियों ने श्रीराधा की कथा आदरभाव से सुनी और उनके भाग्य की सराहना करते हुए कहने लगीं, राधा तुम अतिशय सुख का भोग कर रही हो, उधर मैया चिंता के महासागर में डूबी भवन के बाहर बैठी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हैं। आओ, अपनी-अपनी गगरिया में जल भर के भवन की ओर चलें। जलयुक्त गगरियां कोई अपने सिर पर और कोई अपनी-अपनी बगल में दबाए, ये सखियां श्रीराधा के संग अपने गांव की ओर चली जा रही हैं, मार्ग में राधारानी ने मैया की संतुष्टि के लिए उचित बहाने का ताना-बाना बुनकर सखियों को अवगत करा सहयोग का आश्वासन ले लिया। कुछ समय के पश्चात भवन के समीप पहुंच श्रीराधा ने देखा, मैया चिंतित अवस्था में बैठी है, वह दौड़कर उनके समीप गई, गगरी नीचे उतारी और दौड़कर मैया लिपटकर रोने लगी। राधा की आंखों में मैया आंसू कैसे देखती, उन्होंने पुत्री को अपने वक्षस्थल से लिपटाकर प्यार किया, दुलार किया और उसके बालों को सहलाते हुए पूछने लगीं, क्या बात है बेटी, तू क्यों रो रही है? श्रीराधा ने सुबकी भरते हुए कहा, मैया मैं जानती हूं आपको बिना बताए यमुना पर जाकर मैंने गलती की है, लेकिन यह आवश्यक भी था। मैया कल संध्या समय मैं यमुना किनारे खेलने गई थी, खेल-खेल में मेरे गले का मोतियों का हार कहीं गिर गया। मुझे पता उस समय लगा जब रात्रि में मैं सोने लगी। भय के मारे मैया मैं सारी रात सो न सकी। प्रात: होते ही सखियां जल लेने यमुना पर आने लगती हैं। मैंने सोचा, कहीं यह हार उनमें से किसी को दिखाई दे गया तो वह उठाकर ले जाएंगी। मैं आज अंधेरे में ही यमुना तट पहुंच गई और जिस स्थान पर यह हार गिरा था, वहां ढूंढ़ने लगी। जब ये सखियां वहां पहुंची, तब इनकी सहायता से वह हार मिल गया, देख मैया वह हार अब मेरे गले में पड़ा है। सखियों ने श्रीराधा की बातों का समर्थन किया। मैया संतुष्ट हुई, अपनी लाडली को महल में ले जाकर खिलाया-पिलाया और एक सुंदर बिछौना बिछाकर कहने लगीं, रात्रि भर सोई नहीं और हार ढूंढ़ने में थक गई होगी। अब आराम से सो जा, इतना कहकर मैया अपने काम में लग गई। उधर ‘जिन नैनन में श्याम बसे हों, उन नैनन में नींद कहां’ राधारानी ने मैया को दिखाने के लिए अपना मुंह ढक लिया और नयनों में बसे श्याम सुंदर के संग प्रेम लीला में लीन हो गई।

आज अपनी प्रियतमा को रिझाने के लिए, कान्हा ने विचित्र रास की रचना की। सूरदासजी इस दिव्य लीला का वर्णन करते हुए लिखते हैं, जिस समय श्रीकृष्ण की वंशी के स्वर त्रैलोक्य में सुनाई पड़े, देवता विमोहित हो गए, जड़ पदार्थ कंपायमान हो उठे, जो गतिमान थे, वे स्थिर हो गए, ऋषि मुनियों का ध्यान विचलित हो गया, चंचल वायु स्थिर हो गई, यमुना का जल विपरीत दिशा में बहने लगा, चंद्र देव आकाश के मध्य में ठहर गए। सारी रात वंशी की ध्वनि में अपना नाम सुनकर राधा अपने कन्हैया की गोदी में अपूर्व सुख का अनुभव कर रही थीं, सखियां रस विलास में निमग्न थीं! प्रात:काल का समय हुआ। सूर्य की स्वर्णिम किरणें भू मंडल पर फैलने लगीं। प्रकृति अपने मूल रूप में जीवंत हो उठी। कन्हैया ने नाव किनारे लगाई। कान्हा चले नंद भवन की ओर और सखियां चलीं अपने गांव। उधर, श्रीराधा की मैया चिंतातुर हो सोच ही हैं, पता नहीं मेरी नन्ही-सी बच्ची कहां गई है। प्रात: होते ही गई थी, पूरा दिन बीत गया और अब तो रात्रि भी बीत गई, न जाने उस पर क्या बीत रही होगी। यह समाचार जब गांव में फैला तो वृषभानु भवन के बाहर ब्रजवासी एकत्रित हो गए। राधा का कल से कोई अता-पता नहीं, सबकी चर्चा का यही विषय था। कुछ ही देर के बाद राधा डर-डराती घर आई। 

यहाँ कण-कण में विराजते हैं कृष्णा

एक बार कृष्ण जी ने उनके वस्त्र हरण कर लिये एवं कदम्ब के वृक्ष पर चढ़ गये। तब सभी गोपियों ने भगवान श्री कृष्ण से उनके वस्त्र लौटाने को कहा। तब भगवान श्री कृष्ण जी ने उनको यह शिक्षा दी कि नदी में वरुण देवता का निवास होता है अतः नदी में निर्वस्त्र होकर स्नान नहीं करना चाहिये इससे वरुण देवता का अपमान होता है।
वस्त्रहरण लीला 

बहुलावन : बहुलावन ब्रज के बारह वनों में एक है। श्री हरि की बहुला नाम की पत्‍नि हमेशा यहाँ विराजमान रहती हैं। बहुलावनकुण्ड में स्थित पद्मवन में स्नान पान करने वाले व्यक्ति को बहुत पुण्य प्राप्त होता है क्योंकि भगवान विष्णु लक्ष्मी जी सहित यहाँ निवास करते हैं। एक बार इस स्थान पर बहुला नामक एक गाय को शेर ने घेर लिया था। वह उसे मारना चाहता था लेकिन गाय ने शेर को आश्वादन दिया कि वह अपने बछड़े को दूध पिलाकर लौट आयेगी। इस पर विश्वास कर सिंह वहाँ खड़ा रहा। कुछ समय पश्चात जब गाय अपने बछड़े को दूध पिलाकर लौट आई तो शेर गाय के सत्यव्रत से बहुत प्रभावित हुआ, उसने गाय को छोड़ दिया। यहाँ बलराम कुण्ड एवं मानसरोवर कुण्ड दर्शनीय हैं।

तोषग्राम : यह श्री कृष्ण के प्रिय सखा तोष का गाँव है। तोष नामक गोप नृत्यकला में बहुत निपुण थे। श्री कृष्ण जी ने नृत्य की शिक्षा इन्हीं से प्राप्त की थी। यहाँ तोष कुण्ड है जिसके जल को पीकर ग्वालबाल, गौएँ, श्री कृष्ण-बलराम को बड़ा ही संतोष होता था। यहाँ गोपालजी तथा राधारमण जी की स्थलियाँ दर्शनीय हैं।

दतिहा : यहाँ श्री कृष्ण जी ने दन्तवक्र नामक असुर का वध किया था। यहाँ महादेव जी का एक चतुर्भुज विग्रह है।

गरुड़ गोविन्द : छटीकरा के पास ही गरुड़ गोविन्द जी का मन्दिर है। एक दिन श्री कृष्ण गोचारण करते हुए सखाओं के साथ यहाँ विभिन्न प्रकार की क्रीड़ाएं कर रह थे। उन्होंने श्रीदाम सखा को गरुड़ बनाया और उसकी पीठ पर स्वयं इस प्रकार बैठ गये जैसे मानो स्वयं लक्ष्मीपति नारायण गरुड़ की पीठ पर सवार हों। यहाँ पर गरुड़ बने हुए श्रीदाम तथा गोविन्द जी का दर्शन होता है।

जसुमती (जसौंदी) : यह श्रीराधाकुण्ड-वृन्दावन मार्ग पर स्थित है। श्री कृष्ण की सखी जसुमती ने यहाँ सूर्य भगवान की उपासना की थी। यहाँ सूर्य कुण्ड दर्शनीय है।

बसोंति(बसति) : यह श्री कृष्ण की सखी बसुमति का स्थान है। उसने बसंत पंचमी को भगवान की अराधना की थी। यहाँ बसन्त कुण्ड एवं कदम्ब खण्डी है।

ऐंचादाउजी : एक बार बलराम जी श्री कृष्ण जी के कहने पर द्वारिका से ब्रज में अपने मैया और बाबा से मिलने आये। इसके पश्‍चात उनके मन में महारास की इच्छा प्रकट हूई तो उन्होंने सभी सखियों को इस स्थल पर बुलाया। लेकिन यमुना जी नहीं आयीं क्योंकि बलराम जी उनके जेठ लगते थे। तो बलराम जी यमुना जी को अपने हल से खींचकर यहाँ लाये। तभी से इस स्थान पर यमुना उल्टी बह रहीं हैं। यमुना जी को हल से खींच कर लाने के कारण ही इसका नाम ऐंचा दाऊजी पड़ गया।

अक्षय वट : जब ब्रज में महारास हो रहा था तो सभी देवताओं ने इसे देखने की इच्छा प्रकट की। भगवान श्री कृष्ण जी ने उन्हें इस वृक्ष पर विराजमान होकर रास देखने को कहा। अतः सभी देवता अपने लोकों से रास देखने के लिये इसी वृक्ष पर विराजमान होते हैं। यह अक्षय वट कृष्णकालीन है एवं सदैव हरा भरा रहता है। इसे भाण्डीरवट भी कहते हैं। यहाँ पर बल्देव जी ने प्रलम्बासुर का वध किया था।

चीरघाट : सभी गोपियाँ मार्गशीर्ष माह में भगवान श्री कृष्ण को वर रूप में पाने के लिये कात्यायनी देवी जी का व्रत रखती थीं एवं यमुना में स्नान करती थी। एक बार कृष्ण जी ने उनके वस्त्र हरण कर लिये एवं कदम्ब के वृक्ष पर चढ़ गये। तब सभी गोपियों ने भगवान श्री कृष्ण से उनके वस्त्र लौटाने को कहा। तब भगवान श्री कृष्ण जी ने उनको यह शिक्षा दी कि नदी में वरुण देवता का निवास होता है अतः नदी में निर्वस्त्र होकर स्नान नहीं करना चाहिये इससे वरुण देवता का अपमान होता है।

भाण्डीरवन : गर्ग संहिता के अनुसार एक बार नन्दबाबा कन्हैया को लेकर शाम के समय भ्रमण पर जा रहे थे, रास्ते में अंधेरा होने पर कन्हैया रोने लगे। बाबा ने उनको चुप कराने की बहुत कोशिश की, तब तक अंधेरा और घना हो चुका था, फ़िर बाबा श्रीराधाजी का स्मरण करने लगे तो श्री जी अपने पूर्ण रूप से प्रकट हुई, बाबा ने लाला को श्री जी की गोदी में दे दिया और श्री जी की स्तुति के बाद वहां से चले आये। उनके जाने के बाद भगवान अपने किशोर रूप में आ गये, ब्रह्मा जी ने दोनों का विवाह् सम्पन्न कराया।

मांट गाँव : मांट शब्द का अर्थ दधि मंथन आदि के लिए मिट्टी से निर्मित बड़े-बड़े पात्रों से है। यह स्थल मांटों (मटका) के निर्माण का केन्द्र था। यमुना किनारे स्थित मांटवन ब्रज का प्रमुख सघन वन था।

मानसरोवर : एक बार श्री राधा रानी भगवान श्री कृष्ण जी से रूठ कर यहाँ विराजी थीं। यहाँ उनके नेत्रों के ही दर्शन होते हैं। यहाँ पर दो कुण्ड हैं मान कुण्ड और कृष्ण कुण्ड। मान कुण्ड श्री राधा रानी जी के नयनों से प्रवाहित अश्रुओं से बना है। यह स्थान श्री हित हरिवंश जी को अत्यन्त प्रिय था और वे यहाँ प्रतिदिन आते थे।

कुश स्थली (कोसी) : यह नन्दराय जी की कोष स्थली है। इसी स्थल को ब्रज की द्वारिका पुरी कहते हैं। यहाँ पर रत्‍नाकर सागर, माया कुण्ड तथा गोमती कुण्ड है।

बेलवन : श्रीलक्ष्मी जी ने वृन्दावन में महारास देखने की अभिलाषा प्रकट की। लेकिन उन्हें महारास में प्रवेश नहीं दिया गया। वह आज भी इस स्थल पर वृन्दावन में महारास देखने के लिये तपस्या कर रही हैं। यहाँ पर पौष मास के प्रत्येक गुरुवार को मेला लगता है।

फ़ालेन: यह भक्त प्रह्‍लाद की जन्मस्थली है।

कमई : यह अष्ट सखियों में प्रमुख विशखा सखी जी का जन्मस्थान है।

खेलनवन : यहाँ गोचारण के समय श्री कृष्ण-बलराम सखाओं के साथ विभिन्न प्रकार के खेल खेलते थे। श्री राधा जी भी यहाँ अपनी सखियों के साथ खेलने आतीं थीं, इन्हीं सब कारणों से इस स्थान का नाम खेलनवन पड़ा।

बिहारवन : यहाँ पर श्री बिहारी जी के दर्शन और बिहार कुण्ड है। यहाँ पर रासबिहारी श्री कृष्ण ने राधिका जी सहित गोपियों के साथ रासविहार किया एवं अनेक लीला-विलास किए थे। श्री यमुना जी के पास यह एक सघन रमणीय वन है। यहाँ के गौशाला में आज भी कृष्णकालीन गौवंश के दर्शन होते हैं।

कोकिलावन : एक बार श्री कृष्ण ने कोयल के स्वर में कूह-कूह की ध्वनि से सारे वन को गुंजायमान कर दिया। कूह-कूह की धुन को श्री राधा जी ने पहचान लिया कि ये श्री कॄष्ण जी आवाज निकाल रहे हैं। ध्वनि को सुनकर श्री राधा जी विशाखा सखी के साथ यहाँ आईं, इधर अन्य सखियाँ भी प्राण-प्रियतम को खोजते हुए पहुँच गयीं। यह श्रीराधा-कृष्ण के मिलन की भूमि कृष्ण जी द्वारा कोयल की आवाज निकालने के कारण कोकिला वन कहलाई। यहाँ शनि देव जी का मन्दिर है।

खादिरवन (खायरा) : यह ब्रज के १२ वनों में से एक है। यहाँ श्री कृष्ण-बलराम सखाओं के साथ तर-तरह की लीलाएं करते थे। यहाँ पर खजूर के बहुत वृक्ष थे। यहाँ पर श्री कृष्ण गोचारण के समय सभी सखाओं के साथ पके हुए खजूर खाते थे। श्री कृष्ण जी ने यहाँ वकासुर नामक असुर का वध किया था।

Ram_Laxman or Rukmini_Krishn

राम-लक्ष्मण और कृष्ण-रुक्मिणी
मृत्यु के कारण एक ही व्यक्ति!

एक समाचार पत्र लिखता है कि- "दुर्वासा अपने गुस्से के लिए जाने जाते हैं और जब वो द्वारका आते हैं तो श्री कृष्ण पूरी कोशिश करते हैं कि महर्षि दुर्वासा को थोड़ा सा भी गुस्सा नहीं आए। इसी कोशिश में श्री कृष्ण अपनी पत्नी रुक्मिणी के साथ पूरे नग्न तक हो जाते हैं।"

यह किस्सा तर्क से परे है लगता है की यह दुर्वासा नाम का चरित्र महाभारत में जबरजस्ती घुसाया गया है , क्यों की दुर्वासा की उपस्थिति रामायण में है । कहा जाता है की रामायण और महाभारत में हजारो सालो का अंतर है। क्या यह संभव है की कोई इन्सान पांच हजार सालो से अधिक तक जीवित रहे? हरगिज नहीं... यह तर्क और सच्चाई के विपरीत है ।
रामजी-लक्ष्मणजी 
मुझे तो लगता है की यह दुर्वासा का चरित्र कृष्ण की महत्वता को कम करने के लिए गढ़ा गया है महाभारत में क्यूँ की आप देखेंगे की रामायण में भी राम जी और लक्ष्मण जी की मृत्यु का कारण भी दुर्वासा ऋषि ही था । कहानी इस प्रकार है की काल और राम जी कमरे में बात कर रहे होते हैं और लक्ष्मण कमरे की पहरेदारी का आदेश मिला हुआ था ।

लक्ष्मण को आज्ञा थी की वह किसी को अन्दर नहीं आने दें, यदि कोई अन्दर आ गया तो उसे मृत्यु दंड दिया जायेगा, यह राम जी का वचन था। तभी दुर्वासा ऋषि उपस्थित होता है और राम जी से मिलने की इच्छा जाहिर करता है। बात यह थी की उसका एक व्रत पूरा हुआ था और वह इसके लिए राम जी से भोजन चाहता था। 

लक्ष्मण के मना करने के बाद भी दुर्वासा लक्ष्मण को परिवार सहित भस्म हो जाने और राज्य के अनिष्ठ होने का श्राप देने की धमकी देता है। जिससे घबरा के लक्ष्मण राम जी के कमरे में चले जाते हैं जंहा काल और राम जी मंत्रणा कर रहे होते हैं। वचन के अनुसार राम जी लक्ष्मण को मारने की आज्ञा दे देते हैं पर बाद में दया दिखाते हुए सिर्फ राज्य निकाला दे देते हैं। पर इससे अपमानित होके लक्ष्मण जी सरयू में जल समाधी ले लेते हैं और बाद में राम जी भी लक्ष्मण के वियोग में जल समाधी ले लेते हैं।
जय श्री कृष्णा_ जय श्री रुक्मिणी
कहने का मतलब यह की दुर्वासा ऋषि राम जी के मृत्यु का कारण था परन्तु पांच हजार साल बाद कृष्ण जी और उनकी पत्नी के अपमान और मृत्यु का कारण भी वही दुर्वासा ऋषि हो यह सत्य नहीं जान पड़ता। यदि फिर भी ऐसा है की दुर्वासा रामायण से लेके महाभारत तक के काल में उपस्थित हो तो इसका कारण सिर्फ एक हो सकता है। और वह संभावित कारण है की दुर्वासा ऋषि जोकि एक पुजारी वर्ग से थे, उन्होंने अपनी जातीय श्रेष्टता का प्रभुत्व दिखाने के लिए कृष्ण, जो की उनसे नीची जात के थे, अपमानित किया और अंत में उनकी मृत्यु का कारण बने।

Braj ke Kan-Kan me Radha hi Radha

ब्रज रस में श्री राधा जी की विशेष महिमा का आधार क्या है?

राधा श्री राधा रटूं, निसि-निसि आठों याम।
जा उर श्री राधा बसै, सोइ हमारो धाम


जब-जब इस धराधाम पर प्रभु अवतरित हुए हैं उनके साथ साथ उनकी आह्लादिनी शक्ति भी उनके साथ ही रही हैं। स्वयं श्री भगवान ने श्री राधा जी से कहा है - "हे राधे! जिस प्रकार तुम ब्रज में श्री राधिका रूप से रहती हो, उसी प्रकार क्षीरसागर में श्री महालक्ष्मी, ब्रह्मलोक में सरस्वती और कैलाश पर्वत पर श्री पार्वती के रूप में विराजमान हो।" 

भगवान के दिव्य लीला विग्रहों का प्राकट्य ही वास्तव में अपनी आराध्या श्री राधा जी के निमित्त ही हुआ है। श्री राधा जी प्रेममयी हैं और भगवान श्री कृष्ण आनन्दमय हैं। जहां आनन्द है वहीं प्रेम है और जहां प्रेम है वहीं आनन्द है। आनन्द-रस-सार का धनीभूत विग्रह स्वयं श्री कृष्ण हैं और प्रेम-रस-सार की धनीभूत श्री राधारानी हैं अत: श्री राधा रानी और श्री कृष्ण एक ही हैं। 

श्रीमद्भागवत् में श्री राधा का नाम प्रकट रूप में नहीं आया है, यह सत्य है। किन्तु वह उसमें उसी प्रकार विद्यमान है जैसे शरीर में आत्मा। प्रेम-रस-सार चिन्तामणि श्री राधा जी का अस्तित्व आनन्द-रस-सार श्री कृष्ण की दिव्य प्रेम लीला को प्रकट करता है। श्री राधा रानी महाभावरूपा हैं और वह नित्य निरंतर आनन्द-रस-सार, रस-राज, अनन्त सौन्दर्य, अनन्त ऐश्‍वर्य, माधुर्य, लावण्यनिधि, सच्चिदानन्द स्वरूप श्री कृष्ण को आनन्द प्रदान करती हैं। श्री कृष्ण और श्री राधा रानी सदा अभिन्न हैं। 

श्री कृष्ण कहते हैं - "जो तुम हो वही मैं हूं हम दोनों में किंचित भी भेद नहीं हैं। जैसे दूध में श्‍वेतता, अग्नि में दाहशक्ति और पृथ्वी में गंध रहती हैं उसी प्रकार मैं सदा तुम्हारे स्वरूप में विराजमान रहता हूं।"

श्रीराधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर घनश्याम। करहुँ निरंतर बास मैं, श्री वृन्दावन धाम॥

वृन्दावन लीला लौकिक लीला नहीं है। लौकिक लीला की दृष्टी से तो ग्यारह वर्ष की अवस्था में श्री कृष्ण ब्रज का परित्याग करके मथुरा चले गये थे। इतनी लघु अवस्था में गोपियों के साथ प्रणय की कल्पना भी नहीं हो सकती परन्तु अलौकिक जगत में दोनों सर्वदा एक ही हैं फिऱ भी श्री कृष्ण ने श्री ब्रह्मा जी को श्री राधा जी के दिव्य चिन्मय प्रेम-रस-सार विग्रह का दर्शन कराने का वरदान दिया था, उसकी पूर्ति के लिये एकान्त अरण्य में ब्रह्मा जी को श्री राधा जी के दर्शन कराये और वहीं ब्रह्मा जी के द्वारा रस-राज-शेखर श्री कृष्ण और महाभाव स्वरूपा श्री राधा जी की विवाह लीला भी सम्पन्न हुई।

गोरे मुख पै तिल बन्यौ, ताहिं करूं प्रणाम। मानों चन्द्र बिछाय कै पौढ़े शालिग्राम॥

रस राज श्री कृष्ण आनन्दरूपी चन्द्रमा हैं और श्री प्रिया जू उनका प्रकाश है। श्री कृष्ण जी लक्ष्मी को मोहित करते हैं परन्तु श्री राधा जी अपनी सौन्दर्य सुषमा से उन श्री कृष्ण को भी मोहित करती हैं। परम प्रिय श्री राधा नाम की महिमा का स्वयं श्री कृष्ण ने इस प्रकार गान किया है- "जिस समय मैं किसी के मुख से रा अक्षर सुन लेता हूं, उसी समय उसे अपना उत्तम भक्ति-प्रेम प्रदान कर देता हूं और धा शब्द का उच्चारण करने पर तो मैं प्रियतमा श्री राधा का नाम सुनने के लोभ से उसके पीछे-पीछे चल देता हूं" ब्रज के रसिक संत श्री किशोरी अली जी ने इस भाव को प्रकट किया है।

आधौ नाम तारिहै राधा।
र के कहत रोग सब मिटिहैं, ध के कहत मिटै सब बाधा॥
राधा राधा नाम की महिमा, गावत वेद पुराण अगाधा।
अलि किशोरी रटौ निरंतर, वेगहि लग जाय भाव समाधा॥

ब्रज रज के प्राण श्री ब्रजराज कुमार की आत्मा श्री राधिका हैं। एक रूप में जहां श्री राधा श्री कृष्ण की आराधिका, उपासिका हैं वहीं दूसरे रूप में उनकी आराध्या एवं उपास्या भी हैं।

"आराध्यते असौ इति राधा।" 

शक्ति और शक्तिमान में वस्तुत: कोई भेद न होने पर भी भगवान के विशेष रूपों में शक्ति की प्रधानता हैं। शक्तिमान की सत्ता ही शक्ति के आधार पर है। शक्ति नहीं तो शक्तिमान कैसे? इसी प्रकार श्री राधा जी श्री कृष्ण की शक्ति स्वरूपा हैं। रस की सत्ता ही आस्वाद के लिए है। अपने आपको अपना आस्वादन कराने के लिए ही स्वयं रसरूप श्यामसुन्दर श्री राधा बन जाते हैं। 

श्री कृष्ण प्रेम के पुजारी हैं इसीलिए वे अपनी पुजारिन श्री राधा जी की पूजा करते हैं, उन्हें अपने हाथों से सजाते-सवांरते हैं, उनके रूठने पर उन्हें मनाते हैं। श्रीकृष्ण जी की प्रत्येक लीला श्री राधे जी की कृपा से ही होती है, यहां तक कि रासलीला की अधिष्ठात्री श्री राधा जी ही हैं। इसीलिए ब्रज रस में श्री राधा जी की विशेष महिमा है।

ब्रज मण्डल के कण कण में है बसी तेरी ठकुराई।
कालिन्दी की लहर लहर ने तेरी महिमा गाई॥
पुलकित होयें तेरो जस गावें श्री गोवर्धन गिरिराई।
लै लै नाम तेरौ मुरली पै नाचे कुंवर कन्हाई॥

मेरी ब्लॉग सूची

  • World wide radio-Radio Garden - *प्रिये मित्रों ,* *आज मैं आप लोगो के लिए ऐसी वेबसाईट के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसमे आप ऑनलाइन पुरे विश्व के रेडियों को सुन सकते हैं। नीचे दिए गए ल...
    4 माह पहले
  • जीवन का सच - एक बार किसी गांव में एक महात्मा पधारे। उनसे मिलने पूरा गांव उमड़ पड़ा। गांव के हरेक व्यक्ति ने अपनी-अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखी। एक व्यक्ति ने महात्मा से...
    6 वर्ष पहले

LATEST:


Windows Live Messenger + Facebook