आपका स्वागत है...

मैं
135 देशों में लोकप्रिय
इस ब्लॉग के माध्यम से हिन्दू धर्म को जन-जन तक पहुचाना चाहता हूँ.. इसमें आपका साथ मिल जाये तो बहुत ख़ुशी होगी.. इस ब्लॉग में पुरे भारत और आस-पास के देशों में हिन्दू धर्म, हिन्दू पर्व त्यौहार, देवी-देवताओं से सम्बंधित धार्मिक पुण्य स्थल व् उनके माहत्म्य, चारोंधाम,
12-ज्योतिर्लिंग, 52-शक्तिपीठ, सप्त नदी, सप्त मुनि, नवरात्र, सावन माह, दुर्गापूजा, दीपावली, होली, एकादशी, रामायण-महाभारत से जुड़े पहलुओं को यहाँ देने का प्रयास कर रहा हूँ.. कुछ त्रुटी रह जाये तो मार्गदर्शन करें...
वर्ष भर (2017) का पर्व-त्यौहार नीचे है…
अपना परामर्श और जानकारी इस नंबर
9831057985 पर दे सकते हैं....

धर्ममार्ग के साथी...

लेबल

आप जो पढना चाहते हैं इस ब्लॉग में खोजें :: राजेश मिश्रा

08 अगस्त 2014

Rahasyamai Ekling Mota Mahadev, Nimtalla, Kolkata

रहस्यमयी एकलिंग मोटा महादेव, कोलकाता, प. बंगाल

फंडा आस्था और विश्वास का ...


लोगों में बाबा के प्रति भ्रांतियां...
* मोटा महादेव जंजीरों से बांधे जाते हैं क्योंकि वे प्रत्येक-वर्ष एक से दो इंच बढ़ते हैं, कहा जाता है कि जिस दिन ये अपने मंदिर की छत को छू लेंगे उस दिन दुनियॉं खत्म हो जायेगी।
* मोटा महादेव अपने मंदिर को बनाने नहीं देते, जिसने भी मंदिर को बनाने की कोशिश की वो या तो परलोक चला गया या फिर बरबाद हो गया।
* मोटा महादेव अपने शिवलिंग को किसी को छूने नहीं देते, उन्हें अकेले रहना पसंद है।


फोटो लेने के लिए कैमरे को ऑन किया गया तो फ्लैश चमकते ही हैंग कर गया। यानि फिर से बन्द करके स्टार्ट किया गया तो चल पड़ा। अधूरी जानकारी को पूरा करने के लिए हमारी टीम जब दूसरी बार रवाना हुई तो मन्दिर से ठीक 200 गज की दूरी पर हमारा ऑटो रिक्शा भयंकर एक्सीडेंट होते-होते बचा। अगर एक्सीडेंट हो जाता या ऑटो पलट जाता तो मैं यह आलेख नहीं लिख पाता क्योंकि मैं ड्राइवर के बाईं तरफ बैठा था और एक्सीडेंट यानि वेन में टक्कर मारने से पहले ऑटो के दाई तरफ का चक्का हवा में उठ गया। हम सभी के मुंह से चीख निकल गई। यानि "द वेक' टीम का मोटा महादेव का पहला दर्शन से आलेख छपने तक कई दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। मैग्जीन की संपादक महोदया की जिसमें फोटो डाउनलोड किया गया था, आलेख का कुछ प्वाइंट कंपोज किया गया था उस कंप्यूटर के मॉनिटर में काला स्पॉट आ गया, स्पॉट के खत्म होते-होते आकाशवाणी बज्राघात में पूरा कंप्यूटर ही बैठ गया। इस बज्राघात में सिर्फ कंप्यूटर ही नहीं शकुनजी के टीवी और सीलिंग फैन दोनों जल गये। दो दिन बाद मैं हरिद्वार से लौटा तो जल्दी-जल्दी कार्यालय पहुंचा कि मैग्जीन को पूरा करके छोड़ें तो यह सब कहानी सुनकर मैं भी दंग रह गया। अब तो जो भी सुनता वही कहने लगा इस आलेख को मैग्जीन में ना ही दें तो अच्छा है। जहां छपता है मशीन वाले भी ना-ना करने लगे। वे सवाल दागने लगे कहीं मेरा मशीन ही बैठ गया तो मैं क्या करूंगा। प्लीज इस आलेख को मैग्जीन में ना डालें। अब तो हमलोगों के लिए एक चैलेंज हो गया। मैं और शकुनजी इतना सब कुछ होने के बावजूद फिर मोटा महादेव के दर्शन को निकल पड़े। रिमझिम फुहारों के बीच सुहावना लग रहे वातावरण में बाबा के दरबार में जब हमलोग पहुंचे तो बहुत ही शांति का आभास हुआ वहां पहुंचकर मैंने बाबा को मई-जून की पत्रिका समर्पित की और भूल-चूक के लिए माफी मांगी और साथ ही उनसे याचना की कि हे मोटा महादेव अब इस आलेख को पूरा होने और छपकर लोगों तक पहुंचने में कोई विघ्न और बाधा ना पहुंचे ऐसा आशीर्वाद दीजिए। 
दरअसल रहस्यमयी मोटा महादेव के बारे में पश्चिम बंगाल ही नहीं वरन दूसरे राज्यों में भी यही अफवाहें फैली है कि यहां का शिवलिंग प्रत्येक वर्ष बढ़ता ही जा रहा है, इसी वजह से बाबा के शिवलिंग को जंजीरो से बांध कर रखा गया है ताकि वे मंदिर को तोड़ कर ऊपर ना निकल जायें। जितनी मुंह उतनी बातें सुनने को मिलती थीं। हमारी "द वेक' की टीम निकल पड़ी हकीकत से रूबरू होने। उस दिन मंदिर प्रांगण में कई लोग मिले जिनसे काफी कुछ सुनने और देखने को मिला। मंदिर के चौखट के बाहर ही हमलोग फोटो लेने का काम कर रहे थे तभी वहां धनराज शर्मा नामक एक सज्जन मिले जिन्होंने अपने को भाग्यशाली बताते हुए कहा कि मैं 65 वर्ष से लगातार यहां दर्शन के लिए आ रहा हूँ। इन 65 वर्षों में कोई परिवर्तन नहीं देखा। रोज एक ही कहानी, मंदिर वैसा का वैसा ही है। न रंग-रोगन होता है और ना ही कभी ताम-झाम हुआ। हां दर्शनार्थियों की कोई कमी नहीं है। उन्होंने बताया कि इनके भक्तों का पता लगाना बहुत मुश्किल है। इनके भक्त 4 बजे भोर से लेकर अर्द्ध रात्रि तक आते हैं। पर कोई ताम-झाम या चढ़ावा का ढोंग नहीं करते। 
बात सही भी है मंदिर को देखकर तो मैं भी ठिठक गया था। जैसा सुना उससे कही अधिक । जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मंदिर है। मंदिर के दीवार से ईंटें निकल रहीं हैं, ऊपर छत पर वट-पीपल और पाकड़ के पेड़ों ने अच्छी-खासी झुरमुट बना ली है। सिर्फ यही नहीं वट वृक्ष ने अपनी जड़ों को मंदिर के दीवारो को विंधते हुए मंदिर के इर्द-गिर्द झालर की तरह झुला रखी है। अंदर जाने पर लोगों द्वारा जलाये गये कपूर, अगरबत्ती और दीये के धुओं से मंदिर की दीवार पूरी काली पड़ गयी है। दरवाजों की दुर्दशा, दीवार से गिर रहे सीमेंट और ईंटों के बुरादे से महसूस हो रहा था। तीसरी बार जब मैं और शकुन जी सिर्फ गये तो वहां शांति दिखी अंदर बाबा के एक ही पत्थर से बने शिवलिंग के सामने बैठ गये। अंदर बैठकर जब आप ऊपर गुंबद की ओर नजर दौड़ा रहे थे तो ऐसा लग रहा था मंदिर कभी भी धाराशायी हो सकता है। शकुनजी के बातों - "क्या देख रहे हो जलो'ध्यान भंग हुआ। और हमलोग फिर वापस घर आ गये। पर एक बात है इतना सबकुछ सुनने-देखने के बावजूद जब दुर्गेश्वर महादेव के बारे में लोगों से एक-एक कहानियां सुनी तो आँखें खुली की खुली रह गयीं। 
एक और भक्त भजन जो लगभग 35 वर्ष से रोज बाबा का दो बार दर्शन करते आ रहे हैं ने बाबा से सम्बन्धितअपनी एक आपबीति बताईऔर अपने किये गये कार्यें को दिखाया। बाबा के दरबार में आने वाले भक्तगण शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं वो जल जमीन पर गिरता था उसी जल पर बाहर से आने वाले दूसरे भक्त खड़े होते थे ये देखकर जिस राजा ने मंदिर बनवाया था उनके परिवार के एक सदस्य ने कहा कि तुम यहां पर एक टंकी बनवा दो जिससे जल जमीन पर न गिरकर टंकी में ही जाये। उनकी बात सुनकर मैंने कहा कि ठीक है हमें 15 दिन का समय दीजिये ये 1984 की बात है। उसी दिन भजन दा ने यहां शिवलिंग के सामने प्रार्थना करके कहा कि प्रभु यहां टंकी बनायी जाये या नहीं इसका संकेत तुम हमें सपने में दे देना अन्यथा हम समझेंगे कि तुम्हारी मर्जी है। शिव का कोई संकेत ना पाकर 15वें दिन भजन दा ने राजमिस्त्री को बुलाया और टंकी बनवा दी। उसी रात को भजन बाबू के बड़े काठगोदाम में भयंकर आग लग गयी सबकुछ जलकर नष्ट हो गया। भजन दा इन घटनाक्रमों से काफी क्रोधित हुए पर क्या कर सकते हैं जो होना था वह तो हो चुका था। पर उन्हें भी बाबा मोटा महादेव पर अटल विश्वास हो गया। आज भजन दा के पास सबकुछ है जो जल गया था साथ ही उसमें निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही है और वे रोजाना दो बार मंदिर में माथा टेकने जरूर आते हैं। भजन दा ने एक और कहानी सुनाई- 1966 में मंदिर के पास ही स्थित एक काठ गोदाम में भयंकर आग लगी। आग का विकराल रूप इतना भयावह था कि लोग क्षेत्र को छोड़कर भागने लगे। मंदिर से सटे पश्चिम दिशा में आग लगी थी और धीरे-धीरे बढ़ती हुयी मंदिर की तरफ चली और दक्षिण पूर्व दिशा में आग ने विकराल रूप ले रखा था। मन ही मन यह सोचते हुए की इस बार मंदिर नहीं बचेगा.... सभी हताशप्रत अवस्था में खड़े आग बुझने का इंतजार कर रहे थे। पर आग बुझने के बाद सभी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। मंदिर को रत्तीभर नुकसान नहीं पहुंचा। आग मंदिर के आस-पास से गुजर गई पर मंदिर को कोई क्षति नहीं हुआ। अब लोग कहने लगे ईंट से बना मंदिर को आग क्या नुकसान पहुंचायेगी। भजन दा ने अपनी स्मृति बताई मंदिर तो ईंट से बना था पर चौखट और किवाड़ तो लकड़ी का था उसको क्युं नहीं नुकसान पहुंचा। तब सभी हां में हां मिलाते ही बाबा की कृपा की बात कहने लगे। इसके बाद बाबा के प्रति लोगों में और ज्यादा आस्था मजबूत हो गयी ।
लगभग 300 से पूर्व 1716 में श्री रसिकलाल दत्ता एवं श्री गद्दाधर दास भाष्कर के हाथों एक ही पत्थर से बनाये गये इस एकालिंग के चमत्कार भी कम नहीं हैं। जिसे सुनने के लिये हमारी टीम वही जमीन पर जिस तरह से भोज खाते हैं उसी तरह से बैठ गई और इनके चमत्कार का रस्सास्वादन करती रही। इस दौरान जितने भी बाबा के भक्त आये वे भी तन्मयता से वहां बैठकर हमलोगों का वार्तालाप सुनने लगे।
Mota Mahadev Mandir ke Darwaje
par baithe lekhak : Rajesh Mishra
सबसे बड़ा आश्चर्य यह देखकर होता है कि इतने जर्जर हो चुके बाबा श्री श्री मोटा महादेव के मंदिर के ऊपर लगे तीन पेड़ पाकड़, पीपल और बरगद दिनोंदिन विशालकाय रूप लेते जा रहे हैं। इसमें बरगद का पेड़ से तो आप भी परिचित होंगे जहां यह पेड़ होता है इसके तने से निकलने वाले जटायें मोटे से मोटे दिवाल को भी भेद कर धाराशायी कर देते हैं। यह गुंबद पर विराजमान है और साथ ही इसकी जटायें और जड़ें मंदिर के चारों तरफ लटक रहे हैं। इससे मंदिर को कोई नुकसान नहीं हुआ पर वहां से गुजरने वाली सड़कें बरगद के जटा से फट जाता है जिसे बार-बार मरम्मत करवाना पड़ता है।

बाबा भूतनाथ, नीमतल्ला 


मोेटा महादेव से सटे हुए यानि बीच में सर्कुलर रेल लाईन पार करना पड़ता है, पार करने के बाद आपको मिलेंगे सभी कामनाओं को पूरा करने वाले बाबा भूतनाथ।
हुगली नदी के तट पर बना बाबा भूतनाथ का मंदिर कभी श्मशान के बीच में हुआ करता था। यहां कभी चिता की आग ठंडी नहीं पड़ती थी। गंगा के किनारे आज भी मंदिर के दोनों तरफ यानि एक तरफ इलेक्ट्रिक से और दूसरी तरफ लकड़ियों पर शव का दाह संस्कार किया जाता है।
नाम ही काफी है नाथों के नाथ बाबा भूतनाथ। इस आलेख को पूरा करने के लिए "द वेक' की टीम एक ही सप्ताह में दो बार बाबा का दर्शन करने गयी। नीमतल्ला स्थित इस मंदिर में हजारों भक्त पहुंचते हैं। सावन महीने में तो यहां मेले जैसा माहौल बना रहता है. सोमवार, शनिवार और रविवार को बाबा के दर्शन के लिए भक्तों की काफी लंबी लाइन लगती है. हजारों लोग यहां के घाट से तारकेश्वर के लिए जल भरकर कांवड़ उठाते हैं। दर्शनार्थियों के लिए बाबा का स्वरूप बदलता रहता है। यानि हमेशा अलग-अलग तरह के श़ृंगार किये जाते हैं इस दौरान शिवलिंग पूर्ण रूप से ढंक जाता है।

बाबा भूतनाथ, नीमतल्ला, कोलकाता
Baba Bhootnath , Nimtlla , Kolkata , West  Bengal 

 यह शिवलिंग करीब 200 साल पुराना है। पहले यह श्मशानेर नाम से जाना जाता था। यहां चारों तरफ श्मशान और बीच में बाबा भूतनाथ का मंदिर था। यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। चूंकि यहां बाबा कामनाओं को पूरा करते हैं, इसलिए इन्हें कामना लिंग भी कहा जाता है। आज यहां बाबा का भव्य मंदिर है, जहां भूतनाथ के शिवलिंग के साथ गणेश, पार्वती, हनुमान, महाकाल भैरव और नंदी की भी पूजा होती है।
पूरी तत्परता से लेखक राजेश मिश्रा
बाबा भूतनाथ के बारे में जानकारी लेते हुए. 

श्रावण माह में पड़ने वाले सोमवार को यहां की नजारा देखते ही बनती है। भक्तों की लंबी लाईन से बाबा के जयकारे की गूंज पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देती है। आश्चर्य की बात यह है कि यहां आने वाले कोई भी भक्त बिना जल चढ़ाये वापस नहीं जाते। साथ ही मंदिर से निकलने वाले भक्तों के चेहरे पर मुस्कान देखकर ही समझा जा सकता है कि बाबा के साथ-साथ उनके भक्त भी कितने निराले होते हैं। 
बाबा भूतनाथ के नाम से जब हमने खोज शुरू की तो पता चला कि यहां कोलकाता के अलावा भी बाबा भूतनाथ के नाम से मंडी (हिमाचल प्रदेश) में बाबा विराजमान हैं। कहा जाता है कि मंडी वाले बाबा भूतनाथ का इतिहास 500 साल पुराना है। अभी हाल ही में वहां जिर्णोद्धार का काम किया गया है। जिला प्रशासन व इंटेक संस्था की पहल से मंदिर की दीवारों पर पोते गए रासायनिक रंगों को हटाया गया। इससे मंदिर अपने पुराने रंग में दिखा है। भूतनाथ मंदिर के संरक्षण के साथ ही उम्मीद जगी है कि बाकी धरोहरों के भी दिन फिरेंगे।

एक कड़वा सच


रोज सुबह चार बजे बाबा की मंगला आरती होती है, उसी समय से मंदिर का दरवाजा खुल जाता है। बाबा भूतनाथ की आरती चिता की आग से की जाती है। यह परंपरा 200 साल पुरानी है, जो आज भी कायम है। सुबह-शाम आरती के लिए आग नीमतल्ला श्मशान घाट से लाई जाती है।

मान्यता के भूखे भक्त

मंदिर का दौरा करते वक्त कुछ भक्तों से हमने बातचीत की, साथ ही बाबा के कई अंध भक्त यानि बाबा भूतनाथ पर अटल आस्था रखने वाले, बाबा के सभी भक्त अपना-अपना दिन निर्धारित कर रखे हैं। जो पास में यानि 2 किलोमीटर के अंदर रहता है वह रोजाना सुबह और कार्यालय से आते समय बाबा का दर्शन जरूरत करता है। कोई-कोई ऐसा भक्त है जो रोजाना प्रात: 4 बजे गंगा स्नान के साथ बाबा का अभिषेक करता है। कई ऐसे भी भक्त हैं जो बाबा का दर्शन करने के बाद ही अपने कार्यालय जाते हैं। इसके अलावा बाबा के भक्तों में वे लोग शामिल हैं जो सप्ताह का कोई भी एक दिन निर्धारित कर रखे है उस दिन कोई भी जरूरी कार्य हो उसे निपटाने के बाद या उससे पहले बाबा के दर्शन करने के बाद ही अपने घर जाते है। वैसे सोमवार भगवान शंकर का दिन माना जाता है लेकिन श्मशान में वास करने वाले बाबा भूतनाथ को मानने वाले मंगलवार, शनिवार और रविवार को विशेष तरजीह देते हैं। कोलकाता-हावड़ा के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों में कोई काला टीका लगाये व्यक्ति दिख जाता है तो सामने वाले के मुंह से अनयास ही निकल पड़ता है बाबा भूतनाथ के दर्शन करके आ रहे क्या?
बाबा द्‌वारा किये गये एक-एक चमत्कार सुनने को मिलते हैं। जिसमें सबसे बड़ा चमत्कार पुत्र रत्न की प्राप्ति, दूसरा सबसे बड़ा चमत्कार डॉक्टर द्वारा जवाब देने के बाद भी रोगी का स्वस्थ हो जाना, तीसरा सबसे बड़ा चमत्कार मांगलिक होने के बावजूद शादी होना और सफल वैवाहिक जीवन, चौथा चमत्कार व्यवसाय में बढ़ोत्तरी, पांचवां चमत्कार संकल्प पर आधारित अन्न-धन का भंडार लगना और सुखी परिवार होना। और जिनको कुछ नहीं मिला वे भी बाबा से दुखी नहीं होते हैं उनका कहना है "बाबा के घर देर है अंधेर नहीं'। बाबा ने बहुतों को फर्श से अर्श पर पहुंचाया है। कुछ लोग तो ऐसे भी मिले जिन्होंने बाबा के नाम पर कई बार लाटरी जीती है। 

गंगा तट पर होने के नाते यहां लोगों का आना-जाना हमेशा लगा रहता है पर विशेष रूप से जो पहुंचते हैं वे ही बाबा के अंध भक्त कहलाते हैं। क्योंकि बाबा भूतनाथ का मंदिर ऐसी जगह है जहॉं दर्शन करने के लिये ही जाया जायेगा रास्ते चलते दर्शन हो जाये यह संभव नही है। यह मंदिर कोलकाता के पश्चिम छोर यानि गंगातट पर शमशान के पास स्थित है।

Krishna and Radharani are eternally integral..


कृष्ण और राधारानी सदा अभिन्न हैं


श्री कृष्ण कहते हैं - "जो तुम हो वही मैं हूँ हम दोनों में किंचित भी भेद नहीं हैं। जैसे दूध में श्‍वेतता, अग्नि में दाहशक्ति और पृथ्वी में गंध रहती हैं उसी प्रकार मैं सदा तुम्हारे स्वरूप में विराजमान रहता हूँ।" श्री कृष्ण और श्री राधारानी सदा अभिन्न हैं- राजेश मिश्रा 


श्री राधा श्री राधा रटूं, निसि-निसि आठों याम। 
जा उर श्री राधा बसै, सोइ हमारो धाम।।
जब-जब इस धराधाम पर प्रभु अवतरित हुए हैं उनके साथ साथ उनकी आह्लादिनी शक्ति भी उनके साथ ही रही हैं। स्वयं श्री भगवान ने श्री राधा जी से कहा है - "हे राधे! जिस प्रकार तुम ब्रज में श्री राधिका रूप से रहती हो, उसी प्रकार क्षीरसागर में श्री महालक्ष्मी, ब्रह्मलोक में सरस्वती और कैलाश पर्वत पर श्री पार्वती के रूप में विराजमान हो।" भगवान के दिव्य लीला विग्रहों का प्राकट्य ही वास्तव में अपनी आराध्या श्री राधा जू के निमित्त ही हुआ है। श्री राधा जू प्रेममयी हैं और भगवान श्री कृष्ण आनन्दमय हैं। जहाँ आनन्द है वहीं प्रेम है और जहाँ प्रेम है वहीं आनन्द है। आनन्द-रस-सार का धनीभूत विग्रह स्वयं श्री कृष्ण हैं और प्रेम-रस-सार की धनीभूत श्री राधारानी हैं अत: श्री राधा रानी और श्री कृष्ण एक ही हैं। श्रीमद्भागवत् में श्री राधा का नाम प्रकट रूप में नहीं आया है, यह सत्य है। किन्तु वह उसमें उसी प्रकार विद्यमान है जैसे शरीर में आत्मा। प्रेम-रस-सार चिन्तामणि श्री राधा जी का अस्तित्व आनन्द-रस-सार श्री कृष्ण की दिव्य प्रेम लीला को प्रकट करता है। श्री राधा रानी महाभावरूपा हैं और वह नित्य निरंतर आनन्द-रस-सार, रस-राज, अनन्त सौन्दर्य, अनन्त ऐश्‍वर्य, माधुर्य, लावण्यनिधि, सच्चिदानन्द स्वरूप श्री कृष्ण को आनन्द प्रदान करती हैं। 
श्री कृष्ण और श्री राधारानी सदा अभिन्न हैं। श्री कृष्ण कहते हैं - "जो तुम हो वही मैं हूँ हम दोनों में किंचित भी भेद नहीं हैं। जैसे दूध में श्‍वेतता, अग्नि में दाहशक्ति और पृथ्वी में गंध रहती हैं उसी प्रकार मैं सदा तुम्हारे स्वरूप में विराजमान रहता हूँ।"

श्रीराधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर घनश्याम। 

करहुँ निरंतर बास मैं, श्री वृन्दावन धाम॥ 


वृन्दावन लीला लौकिक लीला नहीं है। लौकिक लीला की दृष्टी से तो ग्यारह वर्ष की अवस्था में श्री कृष्ण ब्रज का परित्याग करके मथुरा चले गये थे। इतनी लघु अवस्था में गोपियों के साथ प्रणय की कल्पना भी नहीं हो सकती परन्तु अलौकिक जगत में दोनों सर्वदा एक ही हैं फ़िर भी श्री कृष्ण ने श्री ब्रह्मा जी को श्री राधा जी के दिव्य चिन्मय प्रेम-रस-सार विग्रह का दर्शन कराने का वरदान दिया था, उसकी पूर्ति के लिये एकान्त अरण्य में ब्रह्मा जी को श्री राधा जी के दर्शन कराये और वहीं ब्रह्मा जी के द्वारा रस-राज-शेखर श्री कृष्ण और महाभाव स्वरूपा श्री राधा जी की विवाह लीला भी सम्पन्न हुई। गोरे मुख पै तिल बन्यौ, ताहिं करूं प्रणाम। मानों चन्द्र बिछाय कै पौढ़े शालिग्राम॥ रस राज श्री कृष्ण आनन्दरूपी चन्द्रमा हैं और श्री प्रिया जू उनका प्रकाश है। श्री कृष्ण जी लक्ष्मी को मोहित करते हैं परन्तु श्री राधा जू अपनी सौन्दर्य सुषमा से उन श्री कृष्ण को भी मोहित करती हैं।

परम प्रिय श्री राधा नाम की महिमा का स्वयं श्री कृष्ण ने इस प्रकार गान किया है-"जिस समय मैं किसी के मुख से ’रा’ अक्षर सुन लेता हूँ, उसी समय उसे अपना उत्तम भक्ति-प्रेम प्रदान कर देता हूँ और ’धा’ शब्द का उच्चारण करने पर तो मैं प्रियतमा श्री राधा का नाम सुनने के लोभ से उसके पीछे-पीछे चल देता हूँ" ब्रज के रसिक संत श्री किशोरी अली जी ने इस भाव को प्रकट किया है। 

आधौ नाम तारिहै राधा। 
र के कहत रोग सब मिटिहैं, ध के कहत मिटै सब बाधा॥
राधा राधा नाम की महिमा, गावत वेद पुराण अगाधा। 
अलि किशोरी रटौ निरंतर, वेगहि लग जाय भाव समाधा॥

ब्रज रज के प्राण श्री ब्रजराज कुमार की आत्मा श्री राधिका हैं। एक रूप में जहाँ श्री राधा श्री कृष्ण की आराधिका, उपासिका हैं वहीं दूसरे रूप में उनकी आराध्या एवं उपास्या भी हैं। 

"आराध्यते असौ इति राधा।" 

शक्ति और शक्तिमान में वस्तुतः कोई भेद न होने पर भी भगवान के विशेष रूपों में शक्ति की प्रधानता हैं। शक्तिमान की सत्ता ही शक्ति के आधार पर है। शक्ति नहीं तो शक्तिमान कैसे? इसी प्रकार श्री राधा जी श्री कृष्ण की शक्ति स्वरूपा हैं। रस की सत्ता ही आस्वाद के लिए है। अपने आपको अपना आस्वादन कराने के लिए ही स्वयं रसरूप श्यामसुन्दर श्रीराधा बन जाते हैं। श्री कृष्ण प्रेम के पुजारी हैं इसीलिए वे अपनी पुजारिन श्री राधाजी की पूजा करते हैं, उन्हें अपने हाथों से सजाते-सवाँरते हैं, उनके रूठने पर उन्हें मनाते हैं। श्रीकृष्ण जी की प्रत्येक लीला श्री राधे जू की कृपा से ही होती है, यहाँ तक कि रासलीला की अधिष्ठात्री श्री राधा जी ही हैं। इसीलिए ब्रजरस में श्रीराधाजी की विशेष महिमा है। 

ब्रज मण्डल के कण कण में है बसी तेरी ठकुराई। 
कालिन्दी की लहर लहर ने तेरी महिमा गाई॥ 
पुलकित होयें तेरो जस गावें श्री गोवर्धन गिरिराई। 
लै लै नाम तेरौ मुरली पै नाचे कुँवर कन्हाई॥

- जय जय श्री  राधे-कृष्णा -
* राजेश मिश्रा *

मेरी ब्लॉग सूची

  • World wide radio-Radio Garden - *प्रिये मित्रों ,* *आज मैं आप लोगो के लिए ऐसी वेबसाईट के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसमे आप ऑनलाइन पुरे विश्व के रेडियों को सुन सकते हैं। नीचे दिए गए ल...
    6 माह पहले
  • जीवन का सच - एक बार किसी गांव में एक महात्मा पधारे। उनसे मिलने पूरा गांव उमड़ पड़ा। गांव के हरेक व्यक्ति ने अपनी-अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखी। एक व्यक्ति ने महात्मा से...
    6 वर्ष पहले

LATEST:


Windows Live Messenger + Facebook