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22 अप्रैल 2015

गणेश जी के आठ अति प्राचीन मंदिर

अष्टविनायक मंदिर, जहां स्वयं रहते है स्वयंभू गणेश 

स्वस्ति श्री गणनायाकम गजमुखं मोरेश्वारम सिद्धीदम |
बल्लाळं मुरुडं विनायक मढं चिंतामणी थेवरम ||
लेण्यान्द्री गिरीजात्माजम सुवरदम विघ्नेश्वारम ओझरम |
ग्रामो रांजण संस्थितम गणपती कुर्यात सदा मंगलम ||

श्री गणेश को मंगलमूर्ति के रुप में सर्वप्रथम पूजा जाता है. एक कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने भविष्यवाणी की थी कि हर युग में भगवान श्री गणेश अलग-अलग रुप में अवतरित होंगे. कृतयुग में विनायक, त्रेतायुग में मयूरेश्वर, द्वापरयुग में गजानन और धूम्रकेतु के नाम से कलयुग में अवतार लेंगे. इसी पौराणिक महत्व से जुड़ी है महाराष्ट्र में अष्टविनायक यात्रा. विनायक भगवान गणेश का ही एक नाम है. महाराष्ट्र में पुणे के समीप अष्टविनायक के 8 पवित्र मंदिर 20 से 110 किलोमीटर के क्षेत्र में स्थित हैं. एक सबसे चौकाने वाली बात यह है कि इनमें विराजित गणेश की प्रतिमाएं स्वयंभू मानी जाती हैं यानी यह स्वयं प्रकट हुई हैं. यह मानव निर्मित न होकर प्राकृतिक हैं. हर प्रतिमा का स्वरुप एक-दूसरे से अलग है. अष्टविनायक यात्रा में आठ गणेश मंदिरों की तीर्थयात्रा को महाराष्ट्र में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है । तीर्थ गणेश के ये आठ पवित्र मंदिर स्वयं उत्पन्न और जागृत हैं ।
अष्टविनायक से अभिप्राय है- आठ गणपति। यह आठ अति प्राचीन मंदिर भगवान गणेश के आठ शक्तिपीठ भी कहलाते है जो की महाराष्ट्र में स्थित हैं। महाराष्ट्र में पुणे के समीप अष्टविनायक के आठ पवित्र मंदिर 20 से 110 किलोमीटर के क्षेत्र में स्थित हैं। इन मंदिरों का पौराणिक महत्व और इतिहास है। इनमें विराजित गणेश की प्रतिमाएं स्वयंभू मानी जाती हैं, यानि यह स्वयं प्रगट हुई हैं। यह मानव निर्मित न होकर प्राकृतिक हैं। अष्टविनायक के ये सभी आठ मंदिर अत्यंत पुराने और प्राचीन हैं। इन सभी का विशेष उल्लेख गणेश और मुद्गल पुराण, जो हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रंथों का समूह हैं, में किया गया है। इन आठ गणपति धामों की यात्रा अष्टविनायक तीर्थ यात्रा के नाम से जानी जाती है। इन पवित्र प्रतिमाओं के प्राप्त होने के क्रम के अनुसार ही अष्टविनायक की यात्रा भी की जाती है। अष्टविनायक दर्शन की शास्त्रोक्त क्रमबद्धता इस प्रकार है-

मयूरेश्वर या मोरेश्वर - मोरगांव, पुणे

सिद्धिविनायक - करजत तहसील, अहमदनगर

बल्लालेश्वर - पाली गांव, रायगढ़

वरदविनायक - कोल्हापुर, रायगढ़

चिंतामणी - थेऊर गांव, पुणे

गिरिजात्मज अष्टविनायक - लेण्याद्री गांव, पुणे

विघ्नेश्वर अष्टविनायक - ओझर

महागणपति - राजणगांव

1- श्री मयूरेश्वर मंदिर- यह मंदिर पुणे से 80 किलोमीटर दूर स्थित है। मोरेगांव गणेशजी की पूजा का महत्वपूर्ण केंद्र है। मयूरेश्वर मंदिर के चारों कोनों में मीनारें हैं और लंबे पत्थरों की दीवारें हैं। यहां चार द्वार हैं। ये चारों दरवाजे चारों युग, सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग के प्रतीक हैं।

इस मंदिर के द्वार पर शिवजी के वाहन नंदी बैल की मूर्ति स्थापित है, इसका मुंह भगवान गणेश की मूर्ति की ओर है। नंदी की मूर्ति के संबंध में यहां प्रचलित मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में शिवजी और नंदी इस मंदिर क्षेत्र में विश्राम के लिए रुके थे, लेकिन बाद में नंदी ने यहां से जाने के लिए मना कर दिया। तभी से नंदी यहीं स्थित है। नंदी और मूषक, दोनों ही मंदिर के रक्षक के रूप में तैनात हैं। मंदिर में गणेशजी बैठी मुद्रा में विराजमान है तथा उनकी सूंड बाएं हाथ की ओर है तथा उनकी चार भुजाएं एवं तीन नेत्र हैं।

मान्यताओं के अनुसार मयूरेश्वर के मंदिर में भगवान गणेश द्वारा सिंधुरासुर नामक एक राक्षस का वध किया गया था। गणेशजी ने मोर पर सवार होकर सिंधुरासुर से युद्ध किया था। इसी कारण यहां स्थित गणेशजी को मयूरेश्वर कहा जाता है।

2- सिद्धिविनायक मंदिर- अष्ट विनायक में दूसरे गणेश हैं सिद्धिविनायक। यह मंदिर पुणे से करीब 200 किमी दूरी पर स्थित है। समीप ही भीम नदी है। यह क्षेत्र सिद्धटेक गावं के अंतर्गत आता है। यह पुणे के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। मंदिर करीब 200 साल पुराना है। सिद्धटेक में सिद्धिविनायक मंदिर बहुत ही सिद्ध स्थान है। ऐसा माना जाता है यहां भगवान विष्णु ने सिद्धियां हासिल की थी। सिद्धिविनायक मंदिर एक पहाड़ की चोटी पर बना हुआ है। जिसका मुख्य द्वार उत्तर दिशा की ओर है। मंदिर की परिक्रमा के लिए पहाड़ी की यात्रा करनी होती है। यहां गणेशजी की मूर्ति 3 फीट ऊंची और ढाई फीट चौड़ी है। मूर्ति का मुख उत्तर दिशा की ओर है। भगवान गणेश की सूंड सीधे हाथ की ओर है।

3- श्री बल्लालेश्वर मंदिर- अष्टविनायक में अगला मंदिर है श्री बल्लालेश्वर मंदिर। यह मंदिर मुंबई-पुणे हाइवे पर पाली से टोयन में और गोवा राजमार्ग पर नागोथाने से पहले 11 किलोमीटर दूर स्थित है। इस मंदिर का नाम गणेशजी के भक्त बल्लाल के नाम पर पड़ा है। प्राचीन काल में बल्लाल नाम का एक लड़का था, वह गणेशजी का परमभक्त था। एक दिन उसने पाली गांव में विशेष पूजा का आयोजन किया। पूजन कई दिनों तक चल रहा था, पूजा में शामिल कई बच्चे घर लौटकर नहीं गए और वहीं बैठे रहे। इस कारण उन बच्चों के माता-पिता ने बल्लाल को पीटा और गणेशजी की प्रतिमा के साथ उसे भी जंगल में फेंक दिया। गंभीर हालत में बल्लाल गणेशजी के मंत्रों का जप कर रहा था। इस भक्ति से प्रसन्न होकर गणेशजी ने उसे दर्शन दिए। तब बल्लाल ने गणेशजी से आग्रह किया अब वे इसी स्थान पर निवास करें। गणपति ने आग्रह मान लिया।

4- श्री वरदविनायक- अष्ट विनायक में चौथे गणेश हैं श्री वरदविनायक। यह मंदिर महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के कोल्हापुर क्षेत्र में स्थित है। यहां एक सुन्दर पर्वतीय गांव है महाड़। इसी गांव में श्री वरदविनायक मंदिर। यहां प्रचलित मान्यता के अनुसार वरदविनायक भक्तों की सभी कामनों को पूरा होने का वरदान प्रदान करते हैं।

इस मंदिर में नंददीप नाम का एक दीपक है जो कई वर्षों में प्रज्जवलित है। वरदविनायक का नाम लेने मात्र से ही सारी कामनाओं को पूरा होने का वरदान प्राप्त होता है।

5- चिंतामणि गणपति- अष्टविनायक में पांचवें गणेश हैं चिंतामणि गणपति। यह मंदिर पुणे जिले के हवेली क्षेत्र में स्थित है। मंदिर के पास ही तीन नदियों का संगम है। ये तीन नदियां हैं भीम, मुला और मुथा। यदि किसी भक्त का मन बहुत विचलित है और जीवन में दुख ही दुख प्राप्त हो रहे हैं तो इस मंदिर में आने पर ये सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। ऐसी मान्यता है कि स्वयं भगवान ब्रहमा ने अपने विचलित मन को वश में करने के लिए इसी स्थान पर तपस्या की थी।

6- श्री गिरजात्मज गणपति- अष्टविनायक में अगले गणपति हैं श्री गिरजात्मज। यह मंदिर पुणे-नासिक राजमार्ग पर पुणे से करीब 90 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। क्षेत्र के नारायणगांव से इस मंदिर की दूरी 12 किलोमीटर है। गिरजात्मज का अर्थ है गिरिजा यानी माता पार्वती के पुत्र गणेश।

यह मंदिर एक पहाड़ पर बौद्ध गुफाओं के स्थान पर बनाया गया है। यहां लेनयादरी पहाड़ पर 18 बौद्ध गुफाएं हैं और इनमें से 8वीं गुफा में गिरजात्मज विनायक मंदिर है। इन गुफाओं को गणेश गुफा भी कहा जाता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 300 सीढिय़ां चढऩी होती हैं। यह पूरा मंदिर ही एक बड़े पत्थर को काटकर बनाया गया है।

7- विघ्नेश्वर गणपति मंदिर-अष्टविनायक में सातवें गणेश हैं विघ्नेश्वर गणपति। यह मंदिर पुणे के ओझर जिले में जूनर क्षेत्र में स्थित है। यह पुणे-नासिक रोड पर नारायणगावं से जूनर या ओजर होकर करीब 85 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।

प्रचलित कथा के अनुसार विघनासुर नामक एक असुर था जो संतों को प्रताणित कर रहा था। भगवान गणेश ने इसी क्षेत्र में उस असुर का वध किया और सभी को कष्टों से मुक्ति दिलवाई। तभी से यह मंदिर विघ्नेश्वर, विघ्नहर्ता और विघ्नहार के रूप में जाना जाता है।

8- महागणपति मंदिर - अष्टविनायक मंदिर के आठवें गणेशजी हैं महागणपति। मंदिर पुणे के रांजणगांव में स्थित है। यह पुणे-अहमदनगर राजमार्ग पर 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । इस मंदिर का इतिहास 9-10वीं सदी के बीच माना जाता है। मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा की ओर है जो कि बहुत विशाल और सुन्दर है। भगवान गणपति की मूर्ति को माहोतक नाम से भी जाना जाता है। यहां की गणेशजी प्रतिमा अद्भुत है। प्रचलित मान्यता के अनुसार मंदिर की मूल मूर्ति तहखाने की छिपी हुई है। पुराने समय में जब विदेशियों ने यहां आक्रमण किया था तो उनसे मूर्ति बचाने के लिए उसे तहखाने में छिपा दिया गया था।

21 अप्रैल 2015

जब विष्णुजी ने तुलसीजी से छल करके किया रमन

क्यों होता है तुलसी-शालिग्राम का विवाह?


धार्मिक मान्यता के अनुसार देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु नींद से जागते हैं। इसी दिन से शुभ कार्यों की शुरुआत भी होती है। देवउठनी एकादशी से जुड़ी कई परंपराएं हैं। ऐसी ही एक परंपरा है तुलसी-शालिग्राम विवाह की। शालिग्राम को भगवान विष्णु का ही एक स्वरुप माना जाता है। तुलसी शालिग्राम का विवाह क्यों होता है इसकी शिव पुराण एक कथा है जो इस प्रकार है।

तुलसी-शालिग्राम विवाह कथा -

शिवमहापुराण के अनुसार पुरातन समय में दैत्यों का राजा दंभ था। वह विष्णुभक्त था। बहुत समय तक जब उसके यहां पुत्र नहीं हुआ तो उसने दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य को गुरु बनाकर उनसे श्रीकृष्ण मंत्र प्राप्त किया और पुष्कर में जाकर घोर तप किया। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे पुत्र होने का वरदान दिया।
भगवान विष्णु के वरदान स्वरूप दंभ के यहां पुत्र का जन्म हुआ। (वास्तव में वह श्रीकृष्ण के पार्षदों का अग्रणी सुदामा नामक गोप था, जिसे राधाजी ने असुर योनी में जन्म लेने का श्राप दे दिया था) इसका नाम शंखचूड़ रखा गया। जब शंखचूड़ बड़ा हुआ तो उसने पुष्कर में जाकर ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की।

शंखचूड़ की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी प्रकट हुए और वर मांगने के लिए कहा। तब शंखचूड़ ने वरदान मांगा कि- मैं देवताओं के लिए अजेय हो जाऊं। ब्रह्माजी ने उसे वरदान दे दिया और कहा कि- तुम बदरीवन जाओ। वहां धर्मध्वज की पुत्री तुलसी तपस्या कर रही है, तुम उसके साथ विवाह कर लो।

ब्रह्माजी के कहने पर शंखचूड़ बदरीवन गया। वहां तपस्या कर रही तुलसी को देखकर वह भी आकर्षित हो गया। तब भगवान ब्रह्मा वहां आए और उन्होंने शंखचूड़ को गांधर्व विधि से तुलसी से विवाह करने के लिए कहा। शंखचूड़ ने ऐसा ही किया। इस प्रकार शंखचूड़ व तुलसी सुख पूर्वक विहार करने लगे। 

शंखचूड़ बहुत वीर था। उसे वरदान था कि देवता भी उसे हरा नहीं पाएंगे। उसने अपने बल से देवताओं, असुरों, दानवों, राक्षसों, गंधर्वों, नागों, किन्नरों, मनुष्यों तथा त्रिलोकी के सभी प्राणियों पर विजय प्राप्त कर ली। उसके राज्य में सभी सुखी थे। वह सदैव भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन रहता था।

स्वर्ग के हाथ से निकल जाने पर देवता ब्रह्माजी के पास गए और ब्रह्माजी उन्हें लेकर भगवान विष्णु के पास गए। देवताओं की बात सुनकर भगवान विष्णु ने बोला कि शंखचूड़ की मृत्यु भगवान शिव के त्रिशूल से निर्धारित है। यह जानकर सभी देवता भगवान शिव के पास आए।

देवताओं की बात सुनकर भगवान शिव ने चित्ररथ नामक गण को अपना दूत बनाकर शंखचूड़ के पास भेजा। चित्ररथ ने शंखचूड़ को समझाया कि वह देवताओं को उनका राज्य लौटा दे, लेकिन शंखचूड़ ने कहा कि महादेव के साथ युद्ध किए बिना मैं देवताओं को राज्य नहीं लौटाऊंगा।

भगवान शिव को जब यह बात पता चली तो वे युद्ध के लिए अपनी सेना लेकर निकल पड़े। शंखचूड़ भी युद्ध के लिए तैयार होकर रणभूमि में आ गया। देखते ही देखते देवता व दानवों में घमासान युद्ध होने लगा। वरदान के कारण शंखचूड़ को देवता हरा नहीं पा रहे थे।

शंखचूड़ और देवताओं का युद्ध सैकड़ों सालों तक चलता रहा। अंत में भगवान शिव ने शंखचूड़ का वध करने के लिए जैसे ही अपना त्रिशूल उठाया, तभी आकाशवाणी हुई कि- जब तक शंखचूड़ के हाथ में श्रीहरि का कवच है और इसकी पत्नी का सतीत्व अखंडित है, तब तक इसका वध संभव नहीं होगा।

आकाशवाणी सुनकर भगवान विष्णु वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर शंखचूड़ के पास गए और उससे श्रीहरि कवच दान में मांग लिया। शंखचूड़ ने वह कवच बिना किसी संकोच के दान कर दिया। इसके बाद भगवान विष्णु शंखचूड़ का रूप बनाकर तुलसी के पास गए।

वहां जाकर शंखचूड़ रूपी भगवान विष्णु ने तुलसी के महल के द्वार पर जाकर अपनी विजय होने की सूचना दी। यह सुनकर तुलसी बहुत प्रसन्न हुई और पति रूप में आए भगवान का पूजन किया व रमण किया। तुलसी का सतीत्व भंग होते ही भगवान शिव ने युद्ध में अपने त्रिशूल से शंखचूड़ का वध कर दिया।

कुछ समय बाद तुलसी को ज्ञात हुआ कि यह मेरे स्वामी नहीं है, तब भगवान अपने मूल स्वरूप में आ गए। अपने साथ छल हुआ जानकर शंखचूड़ की पत्नी रोने लगी। उसने कहा- आज आपने छलपूर्वक मेरा धर्म नष्ट किया है और मेरे स्वामी को मार डाला। आप अवश्य ही पाषाण ह्रदय हैं, अत: आप मेरे श्राप से अब पाषाण (पत्थर) होकर पृथ्वी पर रहें।

तब भगवान विष्णु ने कहा- देवी। तुम मेरे लिए भारत वर्ष में रहकर बहुत दिनों तक तपस्या कर चुकी हो। अब तुम इस शरीर का त्याग करके दिव्य देह धारणकर मेरे साथ आन्नद से रहो। तुम्हारा यह शरीर नदी रूप में बदलकर गंडकी नामक नदी के रूप में प्रसिद्ध होगा। तुम पुष्पों में श्रेष्ठ तुलसी का वृक्ष बन जाओगी और सदा मेरे साथ रहोगी।

तुम्हारे श्राप को सत्य करने के लिए मैं पाषाण (शालिग्राम) बनकर रहूंगा। गंडकी नदी के तट पर मेरा वास होगा। नदी में रहने वाले करोड़ों कीड़े अपने तीखे दांतों से काट-काटकर उस पाषाण में मेरे चक्र का चिह्न बनाएंगे। धर्मालुजन तुलसी के पौधे व शालिग्राम शिला का विवाह कर पुण्य अर्जन करेंगे।

नेपाल स्तिथ गण्डकी नदी, केवल इस नदी में ही मिलते है शालिग्राम 
परंपरा अनुसार देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान शालिग्राम व तुलसी का विवाह संपन्न कर मांगलिक कार्यों का प्रारंभ किया जाता है। मान्यता है कि तुलसी-शालिग्राम विवाह करवाने से मनुष्य को अतुल्य पुण्य की प्राप्ति होती है। 

19 अप्रैल 2015

​माँ थावेवाली की कथा

सबका कल्याण करनेवाली मैया थावेवाली का महिमा है अपरम्पार
 

मैया के चरणों में सिर रखकर जो भी मनोकामना की जाती है फलीभूत होती है, सबके मुरादें पूरी करती हैं मातारानी, निरोगी काया और सुखी परिवार इनका आशीर्वाद है : राजेश मिश्रा

मैया के भक्तों की कमी नहीं है तभी तो मुंबई से चलकर हर गायक कलाकार अपनी एक भजन सीडी थावेवाली मैया के नाम से समर्पित करता है... इनमें नरेंद्र चंचल, लखबीर सिंह लक्खा, भारत शर्मा व्यास, मनोज तिवारी, कल्पना पटवारी, पवन सिंह, शारदा सिन्हा, अरबिंद अकेला जैसे अनगिनत शामिल हैं... राजेश मिश्रा (भेल्दी निवासी) इसलिए आज इस प्रसंग को आपके सामने लाएं हैं की मैया के चरणों में सिर रखकर जो भी मनोकामना की जाती है फलीभूत होती है. सबके मुरादें पूरी करती हैं मातारानी. निरोगी काया और सुखी परिवार इनका आशीर्वाद है...."जैकारा तवेवाली मैया का : बोल सच्चे दरबार की जय" . भक्तों अब मूल जानकारी-
माँ दुर्गा तीनो लोको में सर्व शक्तिमान है. ब्रहमांड में मौजूद हर तरह की शक्ति इन्ही की कृपा से प्राप्त होती है और अंत में इन्ही में समाहित हो जाती है. इसीलिए माता दुर्गा को आदि शक्ति भी कहा जाता है. देवताओ ने भी जब राक्षसों के साथ युद्घ में स्वयं को कमजोर महसूस किया तब माँ दुर्गा ने उनके शरणागत होने पर प्रचंड रूप धारण करके राक्षसों का संहार किया और देवताओ एवं धर्म की रक्षा की. 
इस जगत की पालनहार माता ही है जिनकी कृपा से सबकुछ होता है. इसलिए इन को जगत जननी भी कहा जाता है. माँ दुर्गा अपने भक्तो और धरती पर धर्म की रक्षा और अधर्म का नाश करने के लिए अनेक रूप के प्रकट हुई है. भक्तगण इनको अलग-अलग रूपों और अलग-अलग नामो से पूजते है. कोई शीतला माता, कोई काली माता, कोई मंगला माता तो कोई माँ वैष्णवी के रूप में पूजता है. माँ दुर्गा के अनेक रूप और नाम है. माँ के इन्ही अनेक रूपों और नमो में से एक माँ थावेवाली भी है.
बिहार में धार्मिक यात्राओं पर आने वाले या छुट्टियां मनाने आने वाले लोगों के लिए यहां कई धार्मिक और पौराणिक स्थल हैं, लेकिन यहां आने वाले लोग गोपालगंज जिले में स्थित थावे मंदिर में जाकर सिंहासिनी भवानी मां के दरबार का दर्शन कर उनका आर्शीवाद लेना नहीं भूलते. मान्यता है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मां सभी मनोकामनाएं पूरा करती हैं.

गोपालगंज जिला मुख्यालय से करीब छह किलोमीटर दूर सिवान जाने वाले मार्ग पर थावे नाम का एक स्थान है, जहां मां थावेवाली का एक प्राचीन मंदिर है. मां थावेवाली को सिंहासिनी भवानी, थावे भवानी और रहषु भवानी के नाम से भी भक्तजन पुकारते हैं. ऐसे तो साल भर यहा मां के भक्त आते हैं, परंतु शारदीय नवरात्र और चैत्र नवरात्र के समय यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगती है.

मान्यता है कि यहां मां अपने भक्त रहषु के बुलावे पर असम के कमाख्या स्थान से चलकर यहां पहुंची थीं. कहा जाता है कि मां कमाख्या से चलकर कोलकाता (काली के रूप में दक्षिणेश्वर में प्रतिष्ठित), पटना (यहां मां पटन देवी के नाम से जानी गई), आमी (छपरा जिला में मां दुर्गा का एक प्रसिद्ध स्थान) होते हुए थावे पहुंची थीं और रहषु के मस्तक को विभाजित करते हुए साक्षात दर्शन दिए थे. देश की 52 शक्तिपीठों में से एक इस मंदिर के पीछे एक प्राचीन कहानी है.

जनश्रुतियों के मुताबिक राजा मनन सिंह हथुआ के राजा थे. वे अपने आपको मां दुर्गा का सबसे बड़ा भक्त मानते थे. गर्व होने के कारण अपने सामने वे किसी को भी मां का भक्त नहीं मानते थे. इसी क्रम में राज्य में अकाल पड़ गया और लोग खाने को तरसने लगे. थावे में कमाख्या देवी मां का एक सच्चा भक्त रहषु रहता था. कथा के अनुसार रहषु मां की कृपा से दिन में घास काटता और रात को उसी से अन्न निकल जाता था, जिस कारण वहां के लोगों को अन्न मिलने लगा, परंतु राजा को विश्वास नहीं हुआ.

राजा ने रहषु को ढोंगी बताते हुए मां को बुलाने को कहा. रहषु ने कई बार राजा से प्रार्थना की कि अगर मां यहां आएंगी तो राज्य बर्बाद हो जाएगा, परंतु राजा नहीं माने. रहषु की प्रार्थना पर मां कोलकता, पटना और आमी होते हुए यहां पहुंची राजा के सभी भवन गिर गए और राजा की मौत हो गई.

मां ने जहां दर्शन दिए, वहां एक भव्य मंदिर है तथा कुछ ही दूरी पर रहषु भगत का भी मंदिर है. मान्यता है कि जो लोग मां के दर्शन के लिए आते हैं वे रहषु भगत के मंदिर में भी जरूर जाते हैं नहीं तो उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है. इसी मंदिर के पास आज भी मनन सिंह के भवनों का खंडहर भी मौजूद है.

मंदिर के आसपास के लोगों के अनुसार यहां के लोग किसी भी शुभ कार्य के पूर्व और उसके पूर्ण हो जाने के बाद यहां आना नहीं भूलते. यहां मां के भक्त प्रसाद के रूप में नारियल, पेड़ा और चुनरी चढ़ाते हैं.

थावे के बुजुर्ग और मां के परमभक्त मुनेश्वर तिवारी कहते हैं कि मां के आर्शीवाद को पाने के लिए कोई महंगी चीज की आवश्यकता नहीं. मां केवल मनुष्य की भक्ति और श्रद्धा देखती हैं. केवल उन्हें प्यार और पवित्रता की जरूरत है. वे कहते हैं कि मां की भक्ति के अनुभवों को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता यह तो अमूल्य अनुभव है.

मंदिर का गर्भ गृह काफी पुराना है. तीन तरफ से जंगलों से घिरे इस मंदिर में आज तक कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है. नवरात्र के सप्तमी को मां दुर्गा की विशेष पूजा की जाती है. इस दिन मंदिर में भक्त भारी संख्या में पहुंचते हैं.

इस मंदिर की दूरी गोपालगंज से जहां छह किलोमीटर है. राष्ट्रीय राजमार्ग 85 के किनारे स्थित मंदिर सीवान जिला मुख्यालय से 28 किलोमीटर दूर है. सीवान और थावे से यहां कई सवारी गाड़ियां आती हैं.

10 अप्रैल 2015

शनि देव के कोप से बचने का उपाय

Shani's Influence, Measure and Totke
कुंडली में शनि का प्रभाव और उपाय एवं टोटके

शनि ऐसा ग्रह है जिसके प्रति सभी का डर सदैव बना रहता है। आपकी कुंडली में शनि किस भाव में है, इससे आपके पूरे जीवन की दिशा, सुख, दुख आदि सभी बात निर्धारित हो जाती है।शनि को कष्टप्रदाता के रूप में अधिक जाना जाता है। किसी ज्योतिषाचार्य से अपना अन्य प्रश्न पूछने के पहले व्यक्ति यह अवश्य पूछता है कि शनि उस पर भारी तो नहीं। भारतीय ज्योतिष में शनि को नैसर्गिक अशुभ ग्रह माना गया है। शनि कुंडली के त्रिक (6, 8, 12) भावों का कारक है। पाश्चात्य ज्योतिष भी है। अगर व्यक्ति धार्मिक हो, उसके कर्म अच्छे हों तो शनि से उसे अनिष्ट फल कभी नहीं मिलेगा। शनि से अधर्मियों व अनाचारियों को ही दंड स्वरूप कष्ट मिलते हैं। मत्स्य पुराण के अनुसार शनि की कांति इंद्रनीलमणि जैसी है। कौआ उसका वाहन है। उसके हाथों में धनुष बाण, त्रिशूल और वरमुद्रा हैं। शनि का विकराल रूप भयानक है। वह पापियों के संहार के लिए उद्यत रहता है।

शास्त्रों में वर्णन है कि शनि वृद्ध, तीक्ष्ण, आलसी, वायु प्रधान, नपुंसक, तमोगुणी और पुरुष प्रधान ग्रह है। इसका वाहन गिद्ध है। शनिवार इसका दिन है। स्वाद कसैला तथा प्रिय वस्तु लोहा है। शनि राजदूत, सेवक, पैर के दर्द तथा कानून और शिल्प, दर्शन, तंत्र, मंत्र और यंत्र विद्याओं का कारक है। ऊसर भूमि इसका वासस्थान है। इसका रंग काला है। यह जातक के स्नायु तंत्र को प्रभावित करता है। यह मकर और कुंभ राशियों का स्वामी तथा मृत्यु का देवता है। यह ब्रह्म ज्ञान का भी कारक है, इसीलिए शनि प्रधान लोग संन्यास ग्रहण कर लेते हैं।

शनि सूर्य का पुत्र है। इसकी माता छाया एवं मित्र राहु और बुध हैं। शनि के दोष को राहु और बुध दूर करते हैं।
शनि दंडाधिकारी भी है। यही कारण है कि यह साढ़े साती के विभिन्न चरणों में जातक को कर्मानुकूल फल देकर
उसकी उन्नति व समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। कृषक, मजदूर एवं न्याय विभाग पर भी शनि का अधिकार होता है। जब गोचर में शनि बली होता है तो इससे संबद्ध लोगों की उन्नति होती है।

शनि भाव 3, 6,10, या 11 में शुभ प्रभाव प्रदान करता है। प्रथम, द्वितीय, पंचम या सप्तम भाव में हो तो अरिष्टकर होता है। चतुर्थ, अष्टम या द्वादश भाव में होने पर प्रबल अरिष्टकारक होता है। यदि जातक का जन्म शुक्ल पक्ष की रात्रि में हुआ हो और उस समय शनि वक्री रहा हो तो शनिभाव बलवान होने के कारण शुभ फल प्रदान करता है। शनि सूर्य के साथ 15 अंश के भीतर रहने पर अधिक बलवान होता है। जातक की 36 एवं 42 वर्ष की उम्र में अति बलवान होकर शुभ फल प्रदान करता है। उक्त अवधि में शनि की महादशा एवं अंतर्दशा कल्याणकारी होती है।

शनि किस भाव में है और उसके क्या फल है, जानिएं…

प्रथम भाव/लग्न में शनि हो तो…


जिस व्यक्ति की कुंडली में शनि प्रथम भाव में हो वह व्यक्ति राजा के समान जीवन जीने वाला होता है। यदि शनि अशुभ फल देने वाला है तो व्यक्ति रोगी, गरीब और बुरे कार्य करने वाला होता है।
जिन जातकों के जन्म काल में शनि वक्री होता है वे भाग्यवादी होते हैं। उनके क्रिया-कलाप किसी अदृश्य शक्ति से प्रभावित होते हैं। वे एकांतवासी होकर प्रायः साधना में लगे रहते हैं।धनु, मकर, कुंभ और मीन राशि में शनि वक्री होकर लग्न में स्थित हो तो जातक राजा या गांव का मुखिया होता है और राजतुल्य वैभव पाता है।
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1.जिस जातक की कुंडली में दुसरे घर में शनिहो , वह लकड़ी संबंधी व्यापार ,कोयला एवंलोहे के व्यापार में धन अर्जित करता हैं । उसे निंदित कार्यो तथा साधनों से प्रचुरसंपाति प्राप्त होती हैं । वह श्रेष्ठ व बिना स्वीकारी जाने वाली विधाओ का अध्यनकरता हैं ।
2. भृगु सूत्र के अनुसार दूसरे भाव में शनि से जातक निर्धनहोता हैं । आंखो की बीमारियाँ उसे कष्ट देती रहेगी । ऐसे जातक के दो विवहा भी होसकते हैं । जातक किसी धार्मिक स्थान का कर्ता – धर्ता होता हैं । और स्त्री वर्गको मूर्ख बनाकर धन इकट्टा कर्ता हैं ।
3. जातक को राजकीयअनुकंपा भी मिलती हैं ।
4. दूसरे भाव में शनि जातक को परिवार से दूर कर्ता हैं । ऐसाजातक सुख साधन – समार्धी की खोज में दूर देश – विदेश की यात्रा कर्ता हैं ।
उसकाभाग्योद्ये पैत्रक निवास से दूर होता हैं ।
5. जातक झूठ बोलने बाला , चंचल , बातूनी तथा दूसरों को मूर्ख बनाने में अच्छाहोता हैं ।
6. ऐसा जातक पिता के साथ रहा कर धन कभी अर्जित कभी नहीं करसकता ।
7. यदि शनि दूसरे घर में होतो जातक का चेहरा अच्छा न होगा ।
8. ऐसा जातक को किसी न किसी प्रकार के नशे(पान , सिगरेट , शराब आदि ) की आदत होती हैं ।
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अगर कुंडली में तीसरे भाव में शनि होतो जातक बुद्धिमान औरउदार होता हैं , तथा इसे स्त्री का सुख भी प्राप्त होता हैं , किंतु वह आलस्य से भरपूर मलिन देह वाला , नीचप्रवर्ती का होता हैं । चित में हमेशअशांति ऐसे शनि के प्रभाव हैं ।तृतीय भाव का वक्री शनि जातक को गूढ़ विद्याओं का ज्ञाता बनाता है, लेकिन माता के लिए अच्छा नहीं होता है।
2. आपने लोगो से संघर्षपूर्ण स्थितियो और कठोर परिश्रम के बादभी मिलने वाली असफलता जातक को परेशान करती हैं ।
3. सोभाग्य के उदय में विभिन्न बधाये प्रकट होती हैं ।
4. अनेक लोग अवलंबित रहते हैं । भाइयो से तनावपूर्ण संबंध रहतेहैं और कलेश प्राप्त होता हैं ।
5. तीसरे भाव क शनि कुंडली जब होते हैं तब जातक को माता पितासे मात्र आशीर्वाद क अलावा और कुछ प्राप्त नहीं होता ।
6. पुरुष राशि में शनि तीसरे भाव में संतान जल्दी होती हैं , परंतुगर्भपात की समभावनए प्रबल रहती हैं ।
7. पाप ग्रह युक्त शनि से भइयो का अहित करता हैं ।पापयुक्तशनि से भाई जातक से दुएष रखने वाले होगे ।
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यदि जन्म कुंडली में शनि चतुर्थ भाव में होतो जातक गृहहीन औरमाता नहीं होती या उसको कष्ट होता हैं । ऐसाव्यक्ति बचपन में रोगी भी रहता है । यह भाव सुख का भाव माना जाता हैं । अतः इधर शनिबैठ कर सुख को नष्ट करता है । इसी कारण जातक सदा दुखी रहता है ।
चतुर्थ भावस्थ शनि मातृ हीन, भवन हीन बनाता है। ऐसा व्यक्ति घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी नहीं निभाता और अंत में संन्यासी बन जाता है। लेकिन, चतुर्थ में शनि तुला, मकर या कुंभ राशि का हो तो जातक को पूर्वजों की संपत्ति प्राप्त होती है।
2. जातक तथा उसके माता – पिता के मध्य हमेशा कलह रहती हैं । जातकबंधु विरोध तथा झूठे आरोपो से दुखी रहता है ।
3. चौथे भाव में शनि पित्त तथा वायु विकार से ग्रस्त रखता है ।
4. चौथे घर में शनि से अनुमान लगाया जाता है की माता की म्रत्युपिता से पहले होती है ।
5. अभिभावक से जातक के विचार और सोच एक दूसरे से विरुद्ध होते है ।
6. मेष , व्रष , सिंह , तुला , धनु , व्रश्चिक , मीन और मिथुन वालों को सरकारी सेवाए प्रदान करता है ।
7. जातक की रुचि वैज्ञानिकविषयों में होती हैं ।
8. जातक को व्यापार के प्रारम्भ में अनेक घोर संकट प्रकट होते है।
9. जातक का 36वें तथा 56वें वर्ष उत्तम होते है ।
10. पश्चिम दिशा प्रगति के अनुकूल होती है ।
11. शनि अपनी राशि या अपनीउच्च राशि पर होतो दोषो का परिहार हो जाता है ।
पेत्रक स्थान त्यागने पर भीजातक की दुर्भाग्य से मुक्ति नहीं मिल पाती ।
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पंचम भाव में शनि का प्रभाव….

पंचम भाव का वक्री शनि प्रेम संबंध देता है।लेकिन जातक प्रेमी को धोखा देता है। वह पत्नी एवं बच्चे की भी परवाह नहीं करता है।
1. पांचवे भाव में शनि के बारे फलदीपिका में बताया गया है कीऐसा जातक शैतान और दुष्ट बुद्धि वाला होता है । तथा ज्ञान , सुत , धन तथा हर्ष इन चारों से रहित होता है अर्थात इनके सुख में कमी करता है ।
2. ऐसा जातक भ्रमण करता है अथवा उसकी बुद्धि भ्रमित रहती है ।
3. अगर पंचम भाव में शनि हो तो वह आदमी ईश्वर में विश्वास नहींकरता और मित्रों से द्रोह करता है तथा पेट पीड़ा से परेशान , घूमनेवाला , आलसी और चतुर होता है ।
4. जिनके पंचम भाव में शनि होता है , उसकादिमाग फिजूल विचारों से ग्रस्त रहता है ।
5. व्यर्थ की बातों में वह अधिक दिमाग खपाता है एवं मंदमती होताहै । आय से ज्यादा खर्च अधिक करता है ।
6. यदि शनि उच्च का होकर पंचम हो तो जातक के पैरों में कमजोरी लादेता है ।
7. पीड़ित शनि लॉटरी , जुआ , सट्टा , अथवा रेस के माध्यम से धन की हानि करता हैं ।
8. मेष , सिंह , धनु राशि का शनि, जातक में अहम का उदय करता है । जातक अपने विचारों को गोपनीयरखता है ।
9. अनिश्चित वार्तालाप का आदी होता है । जातक किसी प्रकार की स्वार्थसिद्धिमें कुशल होता है ।
10. ऐसे जातक बैंक , जिला परिषद , सामाजिकसंस्था , विधानसभा , संसद एवं रेलवे आदिमें अधिकारी होते है।
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षष्ठ भाव में शनि हो तो…..

जिस व्यक्ति की कुंडली में शनि छठे भाव में हो तो वह कामी, सुंदर, शूरवीर, अधिक खाने वाला, कुटिल स्वभाव, बहुत शत्रुओं को जीतने वाला होता है।षष्ठ भाव का वक्री शनियदि निर्बल हो तो रोग, शत्रु एवं ऋण कारक होता है।

सप्तम भाव में शनि हो तो……

सप्तम भाव का शनि होने पर व्यक्ति रोग, गरीब, कामी, खराब वेशभूषा वाला, पापी, नीच होता है।सप्तम भाव का वक्री शनि पति या पत्नी वियोग देता है।यदि शनि मिथुन, कन्या, धनु या मीन का हो तो एक से अधिक विवाहों अथवा विवाहेतर संबंधों का कारक होता

अष्टम भाव में शनि हो तो…..

अष्टम भाव में शनि होने पर व्यक्ति कुष्ट या भगंदर रोग से पीडि़त, दुखी, अल्पायु, हर कार्य को करने में अक्षम होता है।अष्टम भाव में शनि हो तो जातक ज्योतिषी दैवज्ञ, दार्शनिक एवं वक्ता होता है। ऐसा व्यक्ति तांत्रिक, भूतविद्या,काला जादू आदि से धन कमाता है।

नवम भाव में शनि हो तो…..

ऐसा व्यक्ति जिसकी कुंडली में नवम भाव में शनि हो वह अधार्मिक, गरीब, पुत्रहीन, दुखी होता है।नवमस्थ वक्री शनि जातक की पूर्वजों से प्राप्त धन में वृद्धि करता है। उसे धर्म परायण एवं आर्थिक संकट आने पर धैर्यवान बनाता है।

दशम भाव में शनि हो तो…..

दशम भाव का शनि होने पर व्यक्ति धनी, धार्मिक, राज्यमंत्री या उच्चपद पर आसीन होता है।दशमस्थ शनि वक्री हो तो जातक वकील, न्यायाधीश,बैरिस्टर, मुखिया, मंत्री या दंडाधिकारी होता है।

एकादश भाव में शनि हो तो….

जिस व्यक्ति की कुंडली में ग्याहरवें भाव में शनि हो वह लंबी आयु वाला, धनी, कल्पनाशील, निरोग, सभी सुख प्राप्त करने वाला होता है।एकादश भाव का शनि जातक को चापलूस बनाता है। व्यय भावस्थ वक्री शनि निर्दयी एवं आलसी बनाता है।

द्वादश भाव में शनि हो तो…..

बाहरवें भाव में शनि होने पर व्यक्ति अशांत मन वाला, पतित, बकवादी, कुटिल दृष्टि, निर्दय, निर्लज, खर्च करने वाला होता है।
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लाल किताब के अनुसार कुंडली के सभी भावों के शनि कष्ट निवारण के उपाय /टोटके…

प्रथम भाव मैं शनि हो तो

  • अपने ललाटपर प्रतिदिन दूध अथवा दही का तिलक लगाए ।
  • शनिवार केदिन न तो तेल लगाए और न हे तेल खाए ।
  • तांबे केबने हुए चार साँप शनिवार के दिन नदी में प्रवाहित करे ।
  • भगवान शनिदेव या हनुमान जी के मंदिर में जाकर यह प्रथना करे की प्रभु !
हमसे जो पाप हुएहैं , उनके लिए हमे क्षमा करो , हमारा कल्याण करो ।
जब भी आपको समय मिले शनि दोष निवारण मंत्र का जाप करे ।


दूसरे भाव में शनि हो तो

  • शराब का त्याग करे और मांसाहार भी न करे ।
  • साँपो को दूध पिलाए कभी भी साँपो को परेशान न करे , न ही मारे ।
  • दो रंग वाली गाए / भैस कभी भी न पालें ।
  • अपने ललाट पर दूध / दही का तिलक करे
  • रोज शनिवार को कडवे तेल का दान करें ।
  • शनिवार के दिन किसी तालाब, नदी में मछलियों को आटा डाले ।
  • सोते समय दूध का सेवन न करें ।
  • शनिवार के दिन सिर पर तेल न लगाएं ।

तीसरे भाव में हो तो

  • आपके घर का मुख्य दरबाजा यदि दक्षिण दिशा की ओर हो तो उसे बंद करवा दे ।
  • रोज शनि चालीसा पढ़ें तथा दूसरों को भी शनि चालीसा भेंट करें ।
  • शराब का त्याग करे और मांसाहार भी न करे ।
  • गले में शनि यंत्र धारण करें ।
  • मकान के आखिर में एक अंधेरा कमरा बनवाएँ ।
  • अपने घर पर एक काला कुत्ता पाले तथा उस का ध्यान रखें ।
  • घर क अंदर कभी हैंडपम्प न लगवाएँ ।

चतुर्थ भाव में शनि हो तो

  • रात में दूध न पिये ।
  • पराई स्त्री से अवैध संबंध कदापि न बनाएँ ।
  • कौवों को दना खिलाएँ ।
  • सर्प को दूध पिलाएँ
  • काली भैस पालें ।
  • कच्चा दूध शनिवार दिन कुएं में डालें ।
  • एक बोतल शराब शनिवार के दिन बहती नदी में प्रवाहित करें ।

पंचम भाव में शनि हो तो

  • पुत्र के जन्मदिन पर नमकीन वस्तुएं बांटनी चाहिए । मिठाई आदि नहीं ।
  • माँस और शराब का सेवन न करें ।
  • काला कुत्ता पालें और उसका पूरा ध्यान रखें ।
  • शनि यंत्र धारण करें ।
  • शनिदेव की पुजा करें ।
  • शनिवार के दिन अपने भार के दसवें हिस्से के बराबर वजन करके , बादाम नदी में प्रवाहित करने का कार्य करें ।

छठवाँ भावमें शनि हो तो

  • चमड़े के जूते , बैग , अटैची आदि काप्रयोग न करें ।
  • शनिवार का व्रत करें ।
  • चार नारियल बहते पनि में प्रवाहित करें । ध्यान रहे , गंदेनाले मे नहीं करें , परिणाम बिल्कुल उल्टा होगा ।
  • हर शनिवार के दिन काली गाय को घी से चुपड़ी हुई रोटी नियमितरूप से खिलाएँ ।
  • शनि यंत्र धारण करें ।

सप्तम भाव में शनि हो तो

  • पराई स्त्री से अवैध संबंध कदापि न बनाएँ ।
  • हर शनिवार के दिन काली गाय को घी से चुपड़ी हुई रोटी नियमितरूप से खिलाएँ ।
  • शनि यंत्र धारण करें ।
  • मिट्टी के पात्र में शहद भरकर खेत में मिट्टी के नीचे दबाएँ। खेत की जगह बगीचे में भी दबा सकते हैं ।
  • अपने हाथ में घोड़े की नाल का शनि छल्ला धारण करें ।

अष्टम भाव में शनि हो तो

  • गले में चाँदी की चेन धारण करें ।
  • शराब का त्याग करे और मांसाहार भी न करे ।
  • शनिवार के दिन आठ किलो उड़द बहती नदी में प्रवाहित करें । उड़द काले कपड़े में बांध कर ले जाएँ और बंधन खोल कर ही प्रबहित करें ।
  • सोमवार के दिन चावल का दान करना आपके लिए उत्तम हैं ।
  • काला कुत्ता पालें और उसका पूरा ध्यान रखें ।

नवम भाव में शनि हो तो

  • पीले रंग का रुमाल सदैव अपने पास रखें ।
  • साबुत मूंग मिट्टी के बर्तन में भरकर नदी में प्रवाहित करें।
  • साव 6 रत्ती का पुखराज गुरुवार को धारण करें ।
  • कच्चा दूध शनिवार दिन कुएं में डालें ।
  • हर शनिवार के दिन काली गाय को घी से चुपड़ी हुई रोटी नियमितरूप से खिलाएँ ।
  • शनिवार के दिन किसी तालाब, नदी में मछलियों को आटा डाले ।

दशम भाव में शनि हो तो

  • पीले रंग का रुमाल सदैव अपने पास रखें ।
  • आप अपने कमरे के पर्दे , बिस्तर का कवर , दीवारों का रंग आदि पीला रंग की करवाएँ यह
  • आप के लिए उत्तम रहेगा ।
  • पीले लड्डू गुरुवार के दिन बाँटे ।
  • आपने नाम से मकान न बनवाएँ ।
  • अपने ललाटपर प्रतिदिन दूध अथवा दही का तिलक लगाए ।
  • शनि यंत्र धारण करें ।
  • जब भी आपको समय मिले शनि दोष निवारण मंत्र का जाप करे ।

एकादश भाव में शनि हो तो

  • शराब और माँस से दूर रहें ।
  • मित्र के वेश मे छुपे शत्रुओ से सावधान रहें ।
  • सूर्योदय से पूर्व शराब और कड़वा तेल मुख्य दरवाजे के पास भूमिपर गिराएँ ।
  • परस्त्री गमन न करें ।
  • शनि यंत्र धारण करें ।
  • कच्चा दूध शनिवार दिन कुएं में डालें ।
  • कौवों को दना खिलाएँ ।

बारह भाव में शनि हो तो

  • प्रथम जातक झूठ न बोले ।
  • शराब और माँस से दूर रहें ।
  • चार सूखे नारियल बहते पनि में परवाहित करें ।
  • शनि यंत्र धारण करें ।
  • शनिवार के दिन काले कुत्ते ओर गाय को रोटी खिलाएँ ।
  • शनिवार को कडवे तेल , काले उड़द का दान करे ।
  • सर्प को दूध पिलाएँ

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जानिए बारह राशियों पर शनि का प्रभाव…..

कुछ ग्रहों के साथ शनिदेव शुभ होते हैं और कुछ के साथ अशुभ फलदायी, उसी प्रकार 12 राशियों में से कुछ में शनि लाभदायक तो कुछ में हानिकारक होते हैं। जिन जातक को शनि की साढ़ेसाती व ढैया का प्रभाव है। जानिए, आपकी कुंडली में शनि किस राशि में हैं और यह आपको किस प्रकार से प्रभावित करेंगे :-
मेष राशि :
राशिचक्र में सबसे पहला स्थान मेष राशि का है। इस राशि में शनि नीच का होता है। शनि नीच होने से यह अशुभ फलदायी होता है। इस राशि शनि की स्थिति से व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी होती है। इस राशि में जिनके शनि होता है शनि उन्हें हठी और क्रोधी बनाता है। यह व्यक्ति को बुरी आदतों की ओर ले जाता है। मेष राशि में जब शनि की महादशा चलती है उस समय रिश्तेदारों एवं मित्रों के साथ विरोध उत्पन्न होता है। इस समय संबंधों में दूरियां भी बढ़ जाती हैं।
वृषभ राशि :
वृष राशि राशिचक्र में दूसरी राशि है। जिस व्यक्ति की कुंडली में शनि इस राशि में होता है वह व्यक्ति असत्य भाषण करने वाला होता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ऐसा व्यक्ति विश्वासपात्र नहीं होता यह अपने स्वार्थ के लिए किसी को धोखा दे सकता है। यह काफी चतुर और शक्तिशाली होता है। काम की भावना इनमें अधिक रहती है।
मिथुन राशि :
मिथुन तीसरी राशि है। इस राशि में शनि का होने पर यह व्यक्ति को दुःसाहसी बनाता है। व्यक्ति चतुर और धूर्त प्रकृति का होता है। राजनीति एवं कुटनीतिक क्षेत्र में इन्हें विशेष सफलता मिलती है। इनमें दया और सद्भावना की कमी होती है। संतान की दृष्टि से यह स्थिति बहुत अच्छी नहीं होती है, क्योंकि यह अल्प संतान का योग निर्मित करता है। साहित्य, संगीत एवं सौन्दर्य के प्रति व्यक्ति में विशेष लगाव रहता है।
कर्क राशि :
राशि चक्र की चौथी राशि है कर्क राशि। जिस व्यक्ति की कुंडली में चतुर्थ भाव में शनि होता है वह व्यक्ति जिद्दी और दूसरों से ईर्ष्या करने वाला होता है। स्वार्थ की भावना इनमें प्रबल रहती है। मातृ पक्ष से इन्हें सुख की कमी महसूस होती है। जब शनि की महादशा कर्क राशि में होती है उस समय इन्हें विशेष कष्ट होता है। शनि की महादशा में पारिवारिक जीवन में उथल-पुथल, मानसिक अशांति, अस्वस्थता मिलती है।
सिंह राशि :
सिंह राशि राशि चक्र में पांचवीं राशि है। इस राशि में शनि के होने से शनि व्यक्ति को गंभीर और चिंतनशील बनाता है। व्यक्ति अपने कार्य में निपुण और परिश्रमी होता है। इस राशि में शनि से प्रभावित व्यक्ति अपनी बातों पर अडिग रहने वाला होता है। गोचर में इस राशि में जब शनि की महादशा चलती है, उस समय इन्हें अत्यधिक परिश्रम करना होता है। अनावश्यक रूप से धन की हानि होती है और मन में निराशात्मक विचार आते रहते हैं।
कन्या राशि :
जिनकी कुंडली में कन्या राशि में शनि होता है वे परोपकारी और गुणवान होते हैं। इस राशि में जिनके शनि होता है वे धनवान और शक्तिशाली होते हैं। कम बोलने वाले और लेखन एवं गंभीर विषयों में रुचि रखने वाले होते हैं। ये सामाजिक कार्यों में शामिल रहते हैं। पारंपारिकता एवं पुराने विचारों में यकीन रखने वाले होते हैं। इस राशि में शनि की महादशा में इन्हें यश और लाभ मिलता है।
तुला राशि :
तुला राशि में शनि उत्तम फल देने वाला होता है। यह व्यक्ति को स्वाभिमानी, महत्वाकांक्षी और भाषण कला में निपुण बनाता है। यह व्यक्ति को स्वतंत्र विचारों वाला और चतुर बनाता है। आर्थिक रूप से मजबूत और कुशल मानसिक क्षमता प्रदान करता है।
वृश्चिक राशि :
शनिदेव जिनकी कुंडली में वृश्चिक राशि में होते हैं वह व्यक्ति जोशीला और क्रोधी होता है। इनमें अभिमान और वैराग्य की भावना रहती है। इनका स्वभाव गंभीर और ईष्यालु होता है। इस राशि में शनि की महादशा जब चलती है तब आर्थिक क्षति और मान-सम्मान की हानि होती है।
धनु राशि :
राशिचक्र में शनि का स्थान नवम है। इस राशि में शनि होने पर यह व्यक्ति को व्यावहारिक और ज्ञानवान बनाता है। व्यक्ति परिश्रमी और नेक विचारों वाला होता है। चतुराई और अक्लमंदी से काम करने वाला एवं दूसरों के उपकार को मानने वाला होता है। इस राशि में जब शनि की महादशा चलती है उस समय व्यक्ति को सुख और उत्तम फल प्राप्त होता है। शिक्षा के क्षेत्र में महादशा के दौरान सफलता मिलती है।
मकर राशि :
राशि चक्र की दसवीं राशि यानी मकर राशि में शनि व्यक्ति को परिश्रमी और ईश्वर के प्रति आस्थावान बनाता है। कारोबार में प्रगति, आर्थिक लाभ, जमीन जायदाद का लाभ यह शनि दिलाता है। शनि इनकी प्रकृति शंकालु बनाता है। लालच और स्वार्थ की भावना भी इनके अंदर रहती है।
कुंभ राशि :
जिनकी कुंडली में शनि दशम भाव यानी कुंभ राशि में होता है वह व्यक्ति अहंकारी होता है। आर्थिक रूप से सामान्य रहते हैं। कूटनीतिक क्षेत्र में सफल और बुद्धिमान होते हैं। नेत्र रोग से पीडि़त होते हैं। व्यवहार कुशल और भाग्य के धनी होते हैं।
मीन राशि :
मीन राशिचक्र की 12वीं राशि है। मीन राशि में शनि स्थित होने पर यह व्यक्ति को गंभीर बनाता है। व्यक्ति दूसरों से ईर्ष्या रखने वाला व महत्वाकांक्षी होता है। इस राशि में शनि के होने पर व्यक्ति उदार और समाज में प्रतिष्ठित होता है। शनि इनकी आर्थिक स्थिति भी सामान्य बनाए रखता है।
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गोचर के शनि का प्रभाव एवं उपाय….

जब गोचर शनि चंद्र लग्न से चैथे, सातवें और दसवें स्थान में जाता है, तो उसे कंटक शनि कहते है तब साधारण रूप से कंटक शनि मानसिक दुःख की वृद्धि करता है, जीवन को अव्यवस्थित बनाता है और इस कारण नाना प्रकार के दुःखों का सामना करवाता है।

जब गोचर का शनि चंद्र लग्न से चैथे स्थान में होता है, तब जातक के निवास स्थान में अवश्य ही परिवर्तन होता है और उसका स्वास्थ्य भी बिगड़ जाता है। चंद्र लग्न से जब गोचर का शनि सातवें स्थान में होता है, तब जातक का परदेश वास होता है और यदि वह सप्तम स्थान पर चर राशि का हो, तो यह फल अवश्य ही होता है।

चंद्र लग्न से यदि गोचर का शनि दसवें स्थान में होता है, तब जातक के व्यवसाय एवं नौकरी आदि में गड़बड़ी होती है और असफलताएं मिलती हैं। इस प्रकार कुंडली में स्थित अशुभ शनि के प्रभाव, गोचर शनि के दुष्प्रभाव तथा दशा-अंतर्दशाओं में ग्रह पीड़ा के निवारण हेतु जातक को चाहिए कि वह, श्रद्धा से युक्त, पवित्र और एकाग्र चित्त हो कर, शनि की लौह प्रतिमा का शमी पत्रों से पूजन करे, तिल मिश्रित उड़द भात, लोहा, काली गौ, या बैल ब्राह्मण को दान करे तथा शनिवार के दिन निम्न स्तोत्र का पाठ करे——

नमः कृष्णाय नीलाय शितिकंठनिभाय च। नमः कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नमः।।
नमो निर्मांसदेहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च। नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।
नमः पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णे च वै पुनः। नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोअस्तु ते।।
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नमः। नमो घोराय रौद्राय भीषणाय करालिने।।
नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोअसतु ते। सूर्यपुत्र नमस्तेअस्तु भास्करेअभयदाय च।।
अधोदृष्टे नमस्तेअस्तु संवर्तक नमोअस्तु ते। नमो मंदगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोअस्तु ते।।
तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च। नमो नित्थं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नमः।।
ज्ञान चक्षुर्नमतेअस्तु कश्यपात्मजसूनवे। तुष्टो ददासि वै राज्यं रूष्टो हरसि तत्क्षणात्।।
देवासुरमनुष्याश्च सिद्धविद्याधरोरगाः। त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः।।
प्रसाद कुरू मे देव वरार्होअहमुपागतः।।

शनिवार को सवेरे उठ कर इस स्तोत्र का पाठ जो भी करता है तथा पाठ होते समय जो श्रद्धापूर्वक इसे सुनता है, उसके लिए शनि की पीड़ा कम होगी तथा पाप से शीघ्र मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होगा।

कुछ अन्य उपाय / टोटके….

शनि प्रदत्त कष्टों के निवारण के उपाय साढ़ेसाती अथवा ढैया के समय शिव आराधना तथा ¬ नमः शिवाय मंत्र के यथा शक्ति जप से शनि जन्य कष्टों का निवारण होता है। शनि प्रदत्त कष्टों के निवारण हेतु हनुमान जी की आराधना भी विशेष लाभकारी है।

पद्मपुराण में वर्णित दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ उत्तम उपाय माना गया है।
बृहत पाराशर होराशास्त्र में उल्लेख है कि जिस समय जो ग्रह प्रतिकूल हो उस समय जातक उस ग्रह का यत्नपूर्वक पूजन करे, क्योंकि ब्रह्मा ने ग्रहों को आदेश दिया है कि जो व्यक्ति उनकी पूजा करे, उसका वे कल्याण करें। इसलिए शनि के कष्टकारक होने पर शनिवार को प्रातः नहा धोकर शनि मंदिर में प्रतिमा का काले तिल के तेल से तैलाभिषेक करें, फिर नीले फूल तथा काली साबुत उड़द, काले तिल, लोहा व गुड़ आदि चढ़ाकार पूजन करें।
फिर रुद्राक्ष की माला पर ॐ शं शनैश्चराय नमः अथवा ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः मंत्र का 23,000 जप कर उसके दशांश का शमी की समिधा, देसी घी व काले तिल से हवन करना चाहिए।

शनिवार को सायंकाल पीपल की जड़ में तिल के तेल का दीपक जलाने से भी शनि प्रदत्त कष्टों से मुक्ति मिलती है। जिनका शनि शुभ हो तथा उसकी दशा, अंतर्दशा, साढ़ेसाती, ढैया आदि नहीं भी चल रही हों, उन्हें भी सुनहरे भविष्य के लिए शनि की उपासना, उसके मंत्रों का जप तथा स्तोत्र का पाठ करते रहना चाहिए।

ध्यान रहे कि शनि पीड़ा का पूर्ण निवारण संभव नहीं है, उसे केवल कम किया जा सकता है। इस हेतु पूजा अर्चना के साथ धर्मानुकूल आचरण बनाए रखना भी जरूरी है।

क्योंकि शनि क्रूर नहीं न्यायाधीश है। इसलिये यदि आचरण अच्छा रखेंगे तो शनि आपको कष्ट नहीं बल्कि शुभ फल ही देंगे।
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शनि निम्नवर्गीय लोगों को लाभ देने वाला एवं उनकीउन्नति का कारक है……

शनि हस्त कला, दास कर्म, लौह कर्म, प्लास्टिक उद्योग, रबर उद्योग, ऊन उद्योग, कालीन निर्माण, वस्त्र निर्माण, लघु उद्योग, चिकित्सा, पुस्तकालय, जिल्दसाजी, शस्त्र निर्माण, कागज उद्योग, पशुपालन, भवन निर्माण, विज्ञान, शिकार आदि से जुड़े लोगों की सहायता करता है। यह कारीगरों, कुलियों, डाकियों, जेल अधिकारियों, वाहन चालकों आदि को लाभ पहुंचाता है तथा वन्य जन्तुओं की रक्षा करता है।

03 अप्रैल 2015

15 साल बाद हनुमान जयंती के दिन चंद्र ग्रहण पर क्या करें?

सूतक तड़के 3.46 बजे शुरू हो जाएंगे, ग्रहण 3.45  बजे शुरू हो जाएंगे और शाम  7.15 बजे समाप्त होगा

शनिवार, 4 अप्रैल 2015 को हनुमान जयंती है और शनिवार को ही चंद्र ग्रहण भी रहेगा। ये ग्रहण 3 घंटे 36 मिनट का रहेगा। इस दिन चंद्र कन्या राशि में रहेगा। इस कारण कन्या राशि के लोगों को ग्रहण देखने से बचना चाहिए।
हनुमान जयंती पर 4 अप्रैल को खग्रास चंद्रग्रहण पड़ रहा है। ज्योतिष मान रहे हैं कि यह ग्रहण हनुमान जयंती के दिन 15 साल बाद पड़ा है। इससे राजनीतिक लोग, अभिनेता, प्रचारकों को नुकसान पहुंच सकता है। ग्रहण के चलते शहर समेत जिले भर के हनुमान मंदिरों में पट बंद रहेंगे तो कुछ में ब्रह्म मुहूर्त में ही पूजा होगी। इस दिन के लिए मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना का इंतजाम किया गया है। इस ग्रहण के सूतक तड़के 3.46 बजे शुरू हो जाएंगे, जो कि पूरे दिन रहेंगे। शाम को 7.15 बजे चंद्रग्रहण समाप्त होगा। सूतक लगने के साथ हनुमान मंदिरों में पट बंद कर दिए जाएंगे। हालांकि कुछ मंदिर में जरूर संकट मोचन के जन्मोत्सव पर खुशियां मनाई जाएंगी।


दोष से बचने को करें पूजा-अर्चना-

हनुमान जयंती के दिन पडऩे वाला खग्रास चंद्रग्रहण दोषप्रद होता है इसके अलावा वर्तमान फसल व आगामी शीतकालीन फसल के लिए चंद्रग्रहण दोषप्रद है। इससे बचने के लिए लोगों को स्नान, दान, जप, स्तुति पाठ, मंत्र जाप, शाबर मंत्र सिद्धि, आराधना, इस्टसिद्धि व हवन आदि करना चाहिए। इस दिन हनुमत आराधना का विशेष महत्व होगा।

इससे पहले 25 अप्रैल 2013 में अल्प खंडग्रास चंद्र ग्रहण, 15 अप्रैल 1995 को ग्रस्तोदय चंद्र ग्रहण और 2 अप्रैल 1996 को खंडग्रास चंद्र ग्रहण हनुमान जयंती पर आए थे। यह चंद्र ग्रहण भारत सहित अन्य देशों में भी दिखाई देगा। इस दिन जातक को विशेष रूप से शनि की ढैया व साढ़े साती से बचने के लिए हनुमान उपासना करनी चाहिए। मंगल दोष निवारण के लिए भी हनुमत उपासना श्रेष्ठ सिद्ध होगी। अल्प खंडग्रास चंद्र ग्रहण कन्या राशि में हस्त नक्षत्र में होगा। ग्रहण 3.45 बजे शुरू तथा 7.15 पर समाप्त होगा। इसलिए पर्वकाल 3 घंटे 33 मिनट तथा सूतक 9 घंटे का होगा। खंडग्रास चंद्र ग्रहण भारत के पूर्वी इलाकों असम, अरुणाचल प्रदेश में खंडग्रास उदय होने के साथ साथ चीन, ऑस्ट्रेलिया, उतरी व दक्षिणी अमरीका के पूर्वी भाग स्थित नगरों में भी दिखाई देगा। चैत्र शुक्ल पूर्णिमा शनिवार 4 अप्रैल को दोपहर बाद से सायंकाल तक होने वाला खंडग्रास चंद्र ग्रहण संपूर्ण भारत में ग्रस्तोदय खंडग्रास के रूप में दिखाई देगा।

चंद्र ग्रहण के दिन हनुमानजी का विशेष पदार्थों से अभिषेक लाभकारी होगा। इस दिन एक दोने में चार लड्डू गुलाब के फूलों से ढक कर ऊपर मसाले के पान में दो लौंग लगाकर हनुमानजी के चरणों में अर्पित करने सभी प्रकार के दुखों का नाश होता है।

अजब संयोग-

इस वर्ष में शनिवार के साथ अजब संयोग जुड़ा हुआ है। अप्रैल में जिस तारीख को शनिवार पड़ रहा है, उस तारीख और माह के अंक एक ही है। 4 अप्रैल (शनिवार) को चंद्र प्रधान हस्त नक्षत्र की युति बन रही है। चंद्र ग्रहण का समय चंद्रोदय के समय से ही रहेगा।

ग्रहण का सूतक-

ग्रहण का सूतक 4 अप्रैल को सूर्योदय के साथ ही प्रारंभ हो जाएगा। सूतक प्रारंभ हो जाने बाद (बच्चों वृद्ध व रोगियों को छोड़कर) धार्मिक जनों को भोजन आदि नहीं करना चाहिए। पं.राजेश शर्मा के अनुसार सूतक तड़के 3.46 बजे शुरू हो जाएगा। शाम को 7.15 बजे चंद्रग्रहण समाप्त होगा। इस दौरान जप, तप और यज्ञ करना लाभकारी होता है। वहीं, सभी राशियों पर चंद्रग्रहण का अलग-अलग प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि 15 साल पहले भी हनुमान जयंती के दिन चंद्र को ग्रहण लगा था।

चंद्रग्रहण का राशियों पर प्रभाव-

मेष- व्यापार बढ़ेगा और भाग्य का पक्ष मजबूत साबित होगा।

वृष- आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। पद-प्रतिष्ठा आदि का लाभ।

मिथुन- घरेलू मामले में दिक्कतें। पद-प्रतिष्ठा में कुछ अड़चने आ सकती हैं।

कर्क- आर्थिक पक्ष मजबूत होगा। परिवार में शुभ कार्यों के योग।

सिंह- सकारात्मक विचारों से आत्मबल मजबूत होगा। परिवार में खुशी का माहौल रहेगा।

कन्या- धन निवेश में सावधानी बरतें। घरेलू मामलों में तनाव आ सकता है।

तुला- जीवन में नई उमंगें आएंगी। व्यावसायिक क्षेत्र में उन्नति प्राप्त होगी।

वृश्चिक- नकारात्मक विचारों से बचना होगा। विरोधियों से सावधान रहें।

धनु- विवाद की आशंका। व्यवसाय में आज किसी को ऋण न दें।

मकर- प्रयास सार्थक होंगे। रोजी व रोजगार की दिशा में किया गया प्रयास सार्थक सिद्ध होगा।

कुंभ- विरोधी तत्व नुकसान पहुंचा सकते हैं। संस्कारिक सुखों की ओर मन आकर्षित होगा।

मीन- शुभ समाचार की प्राप्ति होगी। किसी गरीब व्यक्ति की मदद करने का अवसर मिल सकता है।

300 साल पुरानी हनुमान जी की मूर्ति

300 Year Old Hanuman Murti
इसका रहस्य जानकर चौंक जाएंगे

पवनपुत्र हनुमान की कई मूर्तियां आपने देखी होगी। कुछ पत्थर के बने होंगे तो कुछ धातु के। मिट्टी के बने हनुमान और प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियां भी आपने देखी होगी लेकिन 300 साल पुरानी यह मूर्ति ऐसी चीज से बनी है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।
चलिए हनुमान जी की प्रतिमा का पहला रहस्य बता देते हैं कि यह गाय के गोबर से बनी है। हनुमान जी के अन्य मंदिरों की तरह यहां भी हनुमान जी को खुश करने के लिए भक्त बजरंगबली की मूर्ति का चमेली के तेल और सिंदूर से अभिषेक करते हैं।

हर मंगलवार को यहां भक्तों की बड़ी संख्या होती और हनुमान चालीसा एवं सुंदरकांड का पाठ किया जाता है। भक्तों का मानना है कि इस प्राचीन प्रतिमा के दर्शन मात्र से सब संकट दूर हो जाते हैं। 
आपके मन में यह प्रश्न आ रहा होगा कि यह प्रतिमा कहां है। तो इसका जवाब है, यह प्रतिमा उत्तर प्रदेश के निगोहां के उतरावां गांव में स्थित है। मंदिर प्रांगण में एक शिव मंदिर भी है। भक्तों में इस मंदिर के प्रति अटूट श्रद्घा। इस कारण कई बार मंदिर के जिर्णोद्घार का भी प्रयास किया गया। लेकिन हर बार लोग असफल रहे।

लोग बताते हैं कि जब भी यहां मंदिर के जिर्णोद्घार का प्रयास किया गया कुछ न कुछ अनहोनी हो जाती है और काम रुक जाता है। माना जाता है कि इसका कारण मंदिर प्रांगण में मौजूद चार साधुओं की समाधि है।

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