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आप जो पढना चाहते हैं इस ब्लॉग में खोजें :: राजेश मिश्रा

22 जून 2015

मलमास माह- क्या करें, क्या न करें


सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में परिवर्तन को संक्रान्ति कहते हैं। जब दो पक्षों में संक्रान्ति नहीं होती है, तब अधिक मास होता है, जिसे मलमास भी कहते है। यह स्थिति 32 माह और 16 दिन में होती है यानि लगभग हर तीन वर्ष बाद मलमास पड़ता है। इस वर्ष 17 जून से 16 जुलाई तक मलमास रहेगा। अषाढ़ महीने में मलमास पड़े ऐसा संयोग दशकों बाद आता है। इससे पहले सन् 1996 में अषाढ़ के महीने में अधिक मास पड़ा था। जिस महीने में अधिक मास पड़ता है, उससे 6 महीने आगे तक पड़ने वाले सभी त्यौहारों की तिथियां 10 से 20 दिन की देरी से आती हैं। अधिक मास में विवाह, मुण्डन, यज्ञोपवीत आदि माॅगलिक कार्य वर्जित रहते हैं। इस मास में सिर्फ भगवान का पूजन, भजन, ध्यान व तीर्थ यात्रा करने से विशेष लाभ मिलता है। अधिक मास में विष्णु जी की स्तुति करने का विधान है। अधिक मास में किया गया जप, तप व दान का कई गुना पुण्य मिलता है।

क्या करें- इस मास में भगवत गीता, श्री राम जी की आराधना, कथा वाचन और विष्णु की उपासना करनी चाहिए। दान, पुण्य, जप व ध्यान करने से पाप नष्ट होते है। धार्मिक यात्रायें व धार्मिक कार्यो में सहयोग करने से भी पुण्य मिलता है। क्या न करें- मलमास में गृह प्रवेश, मुण्डन, यज्ञोपवीत, विवाह, गृह निर्माण, भूमि व प्रापर्टी में निवेश, नया वाहन, नया व्यवसाय आदि चीजों करना वर्जित बताया गया है। नया वस्त्र पहना भी वर्जित है। विष्णु जी के इन नामों को जाप करने से सबका होगा कल्याण- 1-विष्णु। 2-नारायण। 3-कृष्ण। 4-गोविन्द। 5-दामोदर। 6-ह्रषीकेश। 7-केशव। 8-माधव। 9-जनार्दन। 10-गरूडध्वज। 11-पीताम्बर। 12-अच्युत। 13-उपेन्द्र। 14-चक्रपाणि। 15-चतुर्भुज। 16- पद्यनाभ। 17-मधुरिपु। 18-वासुदेव। 19-त्रिविक्रम। 20-देवकीनन्दन। 21-श्रीपति। 22-पुरूषोत्तम। 23-वनमाली। 24-विश्वम्भर। 25-पुण्डरीकाक्ष। 26-वैकुण्ठ। 27-दैत्यारि।

20 जून 2015

नाग भी करता है भगवान महादेव की पूजा


रोज 5 घंटे 10 से 3 लगता है हाजिरी


आस्था या अंधविश्वास जो भी कहा जाए, लेकिन आगरा के एक मंदिर में पिछले 15 सालों से आने वाला नाग लोगों के लिए आश्चर्य और कौतुहल का विषय है।

यह मामला आगरा के सैय्या थाना क्षेत्र अंतर्गत सलेमाबाद गांव के शिव मंदिर का है, जहां पिछले 15 सालों से एक नाग की आस्था रहस्य बनी हुई है। यह नाग 15 सालों से लगातार इस शिवमंदिर में आता है और पूरे पांच घंटे यहां गुजारने के बाद चला जाता है।

स्थानीय लोगों और मंदिर के पुजारी के अनुसार ये नाग पूरे पांच घंटे शिवजी की आराधना करता है, तो वहीं कुछ लोग उसे साक्षात शिव का अवतार मानते हैं।

इस मंदिर में भक्त ही नहीं, नाग भी करता है भगवान महादेव की पूजा


नाग के पूजा करने की बात फैलने से इस मंदिर की प्रसिद्धि जरूर बढ़ गई है। इन 15 वर्षों में नाग ने किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है।

पुजारी और ग्रामीणों का कहना है कि मंदिर में पुजारी के पूजा करने के बाद सुबह लगभग 10 बजे नाग मंदिर में आता है और दोपहर तीन बजे तक शिवजी की पूजा करता है। इस दौरान मंदिर में कोई नहीं जाता और न ही नाग लोगों के चढ़ाए गए दूध को पीता है।

वैसे भी विज्ञान के मुताबिक, नाग और कोई सांप न तो दूध पीते हैं और न फल खाते हैं। इसके बावजूद लोगों की आस्था के चलते महाशिवरात्रि पर न जाने कितने सांपों को जबरन दूध पिलाने की कोशिश की जाती है। सपेरे घर-घर, मंदिर-मंदिर पिटारे में सांपों को लेकर जाते हैं। वे दूध में सांप का मुंह डालते हैं, जिससे सांपों की मौत तक हो जाती है।

12 जून 2015

पूजा में पत्नी बाएं क्यों बैठती है?

वामांगी कहलाने वाली स्त्री दाहिने कब बैठती है? 
रक्षासूत्र बांधते समय, डॉक्टर द्वारा नाड़ी और ज्योतिष स्त्री के बाएं हाथ को तरजीह क्यों देते हैं... राजेश मिश्रा


सप्तपदी हिन्दू धर्म में विवाह संस्कार का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। इसमें वर उत्तर दिशा में वधु को सात मंत्रों के द्वारा सप्त मण्डलिकाओं में सात पदों तक साथ ले जाता है। इस क्रिया के समय वधु भी दक्षिण पाद उठाकर पुन: वामपाद मण्डलिकाओं में रखती है। विवाह के समय सप्तपदी क्रिया के बिना विवाह कर्म पक्का नहीं होता है। अग्नि की चार परिक्रमाओं से यह कृत्य अलग है। जिस विवाह में सप्तपदी होती है, वह 'वैदिक विवाह' कहलाता है। सप्तपदी वैदिक विवाह का अभिन्न अंग है। इसके बिना विवाह पूरा नहीं माना जाता। सप्तपदी के बाद ही कन्या को वर के वाम अंग में बैठाया जाता है।

महाभारत शांतिपर्व 235.18 के अनुसार पत्नी पति का शरीर ही है और उसके आधे भाग को अर्द्धागिनी के रूप में वह पूरा करती है। "अथो अर्धो वा एव अन्यत: यत् पत्नी" अर्थात पुरूष का शरीर तब तक पूरा नहीं होता, जब तक कि उसके आधे अंग को नारी आकर नहीं भरती। पौराणिक आख्यानों के अनुसार पुरूष का जन्म ब्रह के दाहिने कंधे से और स्त्री का जन्म बाएं कंधे से हुआ है, इसलिए स्त्री को वामांगी कहा जाता है और विवाह के बाद स्त्री को पुरूष के वाम भाग में प्रतिष्ठित किया जाता है।

सप्तपदी होने तक बधू को दाहिनी ओर बिठाया जाता है, क्योंकि वह बाहरी व्यक्ति जैसी स्थिति में होती है। प्रतिज्ञाओं से बद्ध हो जाने के कारण पत्नी बनकर आत्मीय होने से उसे बाई ओर बैठाया जाता है। इस प्रकार बाई ओर आने के बाद पत्नी गृहस्थ जीवन की प्रमुख सूत्रधार बन जाती है और अधिकार हस्तांतरण के कारण दाहिनी ओर से वह बाई ओर आ जाती है। इस प्रक्रिया को शास्त्र में आसन परिवर्तन के नाम से जाना जाता है। अन्य हिन्दू शास्त्रों में स्त्री को पुरूष्ज्ञ का वाम अंग बतलाया गया है।

साथ ही वाम अंग में बैठने के अवसर भी बताए गए है। "वामे सिन्दूरदाने च वामे चैव द्विरागमने, वामे शयनैकश्यायां भवेज्जाया प्रियार्थिनी" अर्थात सिंदूरदान, द्विरागमन के समय, भोजन, शयन व सेवा के समय में पत्नी हमेशा वामभाग में रहे। इसके अलावा अभिषेक के समय, आशीर्वाद ग्रहण करते समय और ब्राह्माण के पांव धोते समय भी पत्नी को उत्तर में रहने को कहा गया है। उल्लेखनीय है कि जो धार्मिक कार्य पुरूष प्रधान होते हैं, जैसे-विवाह, कन्यादान, यज्ञ, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, निष्क्रमण आदि में पत्नी पुुरूष के दाई (दक्षिण) ओर रहती है, जबकि स्त्री प्रधान कार्यो में वह पुरूष के वाम (बाई) अंग की तरफ बैठती है।

आप जानते ही होंगे कि मौली (लाल नाडा/कलावा/रक्षा सूत्र) स्त्री के बाएं हाथ की कलाई में बांधने का नियम शास्त्रों में लिखा है। ज्योतिषी स्त्रियों  के बाएं हाथ की हस्त रेखाएं देखते हैं। वैद्य स्त्रियों  की बाएं हाथ की नाडी को छूकर उनका इलाज करते हैं। ये सब बातें भी स्त्री को वामांगी होने का संकेत करती है।

09 जून 2015

श्रीसूक्तम् - अर्थ सहित

अथ श्री श्रीसूक्तम् - अर्थ सहितम् :: ऋग्वेद

॥ श्री गणेशाय नम:॥ श्रीमहाकालीमहालक्ष्मी   महासरस्वती देवाताभ्यो नम:।
यःशुचिः प्रयतोभूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् । सूक्तमं पंचदशर्च श्रीकामःसततं जपेत् ।
जोभी व्यक्ति प्रतिदिन श्रीसूक्तम् का 16 बार पाठ करता है उसे कभी धन की कमी नही होती ऐसा माँ महालक्ष्मी का वरदान है ।

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ।। (1)

अर्थ:- हे जातवेदा अग्निदेव आप मुझे सुवर्ण के समान पीतवर्ण वाली तथा किंचित हरितवर्ण वाली तथा हरिणी रूपधारिणी सुवर्नमिश्रित रजत की माला धारण करने वाली , चाँदी के समान धवल पुष्पों की माला धारण करने वाली , चंद्रमा के सद्रश प्रकाशमान तथा चंद्रमा की तरह संसार को प्रसन्न करने वाली या चंचला के सामान रूपवाली ये हिरण्मय ही जिसका सरीर है ऐसे गुणों से युक्त लक्ष्मी को मेरे लिए बुलाओ ।।

ॐ तां म आ व ह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ।। (2)

अर्थ:- हे जातवेदा अग्निदेव आप उन जगत प्रसिद्ध लक्ष्मी जी को मेरे लिए बुलाओ जिनके आवाहन करने पर मै सुवर्ण, गौ, अश्व और पुत्र पौत्रदि को प्राप्त करूँ ।।

ॐ अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनाद्प्रमोदिनीम् ।
श्रियं देवीमुप ह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ।। (3)

अर्थ:- जिस देवी के आगे और मध्य में रथ है अथवा जिसके सम्मुख घोड़े रथ से जुते हुए हैं, ऐसे रथ में बैठी हुई, हथिनियों की निनाद से संसार को प्रफुल्लित करने वाली देदीप्यमान एवं समस्त जनों को आश्रय देने वाली लक्ष्मी को मैं अपने सम्मुख बुलाता हूँ । देदीप्यमान तथा सबकी आश्रयदाता वह लक्ष्मी मेरे घर में सर्वदा निवास करे ।।

ॐ कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।
पद्मेस्थितां पदमवर्णां तामिहोप ह्वये श्रियम् ।। (4)

अर्थ:- जिसका स्वरूप वाणी और मन का विषय न होने के कारण अवर्णनीय है तथा जो मंद हास्ययुक्ता है, जो चारों ओर सुवर्ण से ओत प्रोत है एवं दया से आर्द्र ह्रदय वाली देदीप्यमान हैं । स्वयं पूर्णकाम होने के कारण भक्तो के नाना प्रकार के मनोरथों को पूर्ण करने वाली । कमल के ऊपर विराजमान, कमल के सदृश्य गृह मैं निवास करने वाली संसार प्रसिद्ध लक्ष्मी को मैं अपने पास बुलाता हूँ ।।

ॐ चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्ती श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् ।
तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ।। (5)

अर्थ:- चंद्रमा के समान प्रकाश वाली प्राकृत कान्तिवाली, अपनी कीर्ति से देदीप्यमान, स्वर्ग लोक में इन्द्रादि देवों से पूजित अत्यंत दानशीला, कमल के मध्य रहने वाली, सभी की रक्षा करने वाली एवं अश्रयदाती, जगद्विख्यात उन लक्ष्मी को मैं प्राप्त करूँ इसलिए मैं तुम्हारा आश्रय लेता हूँ ।।

ॐ आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्य अलक्ष्मीः ।। (6)

अर्थ:- हे सूर्य के समान कांति वाली देवी आपके तेजोमय प्रकाश से बिना पुष्प के फल देने वाला एक वृक्ष विशेष उत्पन्न हुआ जिसे विल्व वृक्ष कहते हैं । आपके हाथ से बिल्व का वृक्ष उत्पन्न हुआ, वह बिल्व वृक्ष का फल मेरे बाह्य और आभ्यन्तर की दरिद्रता को नष्ट करें ।।

उपैतु मां देवसखः किर्तिश्च मणिना सह ।
प्रदुभुर्तॉऽस्मि रास्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिंमृद्धिम ददातु मे ।। (7)

अर्थ:- हे लक्ष्मी ! देवसखा अर्थात श्री महादेव के सखा (मित्र ) इन्द्र, कुबेरादि देवताओं की अग्नि मुझे प्राप्त हो अर्थात मैं अग्निदेव की उपासना करूँ । एवं मणि के साथ अर्थात चिंतामणि के साथ या कुबेर के मित्र मणिभद्र के साथ या रत्नों के साथ, कीर्ति कुबेर की कोषशाला या यश मुझे प्राप्त हो अर्थात धन और यश दोनों ही मुझे प्राप्त हों । मैं इस संसार में उत्पन्न हुआ हूँ, अतः हे लक्ष्मी आप यश और ऐश्वर्य मुझे प्रदान करें ।।

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठमलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।
अभूतिमसमृद्धि च सर्वां निर्गुद में गृहात् ।।(8)

अर्थ:- भूख एवं प्यास रूप मल को धारण करने वाली एवं लक्ष्मी की ज्येष्ठ भगिनी दरिद्रता मुझसे सदा ही दूर रहें, ऐसी प्रार्थना करता हूँ । हे लक्ष्मी आप मेरे घर में आने वाले ऐश्वर्य तथा धन को बाधित करने वाले सभी विघ्नों को दूर करें ।।

गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप हवये श्रियम् ।। (9)

अर्थ:- सुगन्धित पुष्प के समर्पण करने से प्राप्त करने योग्य, किसी से भी न दबने योग्य, धन धान्य से सर्वदा पूर्ण कर गौ, अश्वादि पशुओं की समृद्धि देने वाली, समस्त प्राणियों की स्वामिनी तथा संसार प्रसिद्ध लक्ष्मी को मैं अपने घर परिवार में सादर बुलाता हूँ ।।

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।
पशुनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ।। (10)

अर्थ:- हे लक्ष्मी ! मैं आपके प्रभाव से मानसिक इच्छा एवं संकल्प तथा वाणी की सत्यता, गौ आदि पशुओ के रूप (अर्थात दुग्ध -दधिआदि) एवं अन्नों के रूप (अर्थात भक्ष्य,भोज्य, चोष्य, चतुर्विध भोज्य पदार्थ) इन सभी पदार्थो को प्राप्त करूँ । सम्पति और यश मुझमें आश्रय ले अर्थात मैं लक्ष्मीवान एवं कीर्तिमान बनूँ ऐसी कृपा करें ।।

कर्दमेन प्रजा भूता मयि संभव कर्दम ।
श्रियम वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ।।(11)

अर्थ:- हे कर्दम आप अपनी माँ लक्ष्मी से हमारे लिए ही नहीं, अपितु हमारे सभी परिवार तथा हमारी समस्त प्रजा के कल्याण के लिए हमारे तरफ से प्रार्थना करें, कि माँ लक्ष्मी हम सभी के कल्याणार्थ हमारे घर आयें, हमारे यहाँ आप अपनी माँ के साथ रहें ताकि हम भी सुख पूर्वक निवास करें । हे कर्दम ! आपसे हमारी प्रार्थना है कि आप हमारे घर आयें, हमारे यहाँ निवास करें, क्योंकि आपके हमारे यहाँ आने से माँ लक्ष्मी को मेरे यहाँ आना ही पड़ेगा । हे कर्दम ! मेरे घर में लक्ष्मी निवास करें, केवल इतनी ही प्रार्थना नहीं है अपितु कमल की माला धारण करने वाली संपूर्ण संसार की माँ लक्ष्मी को मेरे घर में आप निवास कराओ ।।

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस् मे गृहे ।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ।।(12)

अर्थ:- जिस प्रकार कर्दम की संतति 'ख्याति 'से लक्ष्मी अवतरित हुई उसी प्रकार कल्पान्तर में भी समुन्द्र मंथन द्वारा चौदह रत्नों के साथ लक्ष्मी का भी आविर्भाव हुआ है । इसी अभिप्राय से कहा जा सकता है कि वरुण देवता स्निग्ध अर्थात मनोहर पदार्थो को उत्पन्न करें । (पदार्थो कि सुंदरता ही लक्ष्मी है । लक्ष्मी के आनंद, कर्दम ,चिक्लीत और श्रित - ये चार पुत्र हैं । इनमें 'चिक्लीत' से प्रार्थना की गई है कि हे चिक्लीत नामक लक्ष्मी पुत्र ! तुम मेरे गृह में निवास करो । केवल तुम ही नहीं अपितु दिव्यगुण युक्त सर्वाश्रयभूता अपनी माता लक्ष्मी को भी मेरे घर में निवास कराओ ।।

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिंडगलां पदमालिनीम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मी जातवेदो म आ वह ।। (13)

अर्थ:- हे अग्निदेव ! तुम मेरे घर में पुष्करिणी अर्थात दिग्गजों (हाथियों ) के सूंडाग्र से अभिषिच्यमाना (आर्द्र शरीर वाली) पुष्टि को देने वाली अथवा पुष्टिरूपा रक्त और पीतवर्णवाली, कमल कि माला धारण करने वाली संसार को प्रकाशित करने वाली प्रकाश स्वरुप लक्ष्मी को बुलाओ ।।

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् ।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मी जातवेदो म आ वह ।। (14)

अर्थ:- हे अग्निदेव ! तुम मेरे घर में भक्तों पर सदा दयार्द्रर्चित अथवा समस्त भुवन जिसकी याचना करते हैं, दुस्टों को दंड देने वाली अथवा यष्टिवत् अवलंबनीया (सारांश यह है, कि 'जिस प्रकार लकड़ी के बिना असमर्थ पुरुष चल नहीं सकता, उसी प्रकार लक्ष्मी के बिना संसार का कोई भी कार्य नहीं चल सकता), सुन्दर वर्ण वाली एवं सुवर्ण कि माला वाली सूर्यरूपा (अर्थात जिस प्रकार सूर्य अपने प्रकाश और वृष्टि द्वारा जगत का पालन -पोषण करता है उसी प्रकार लक्ष्मी ,ज्ञान और धन के द्वारा संसार का पालन -पोषण करती है) अतः प्रकाश स्वरूपा लक्ष्मी को हमारे लिए बुलाओ ।।

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मी मन पगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ।। (15)

अर्थ:- हे अग्निदेव ! तुम मेरे यहाँ उन जगद्विख्यात लक्ष्मी को जो मुझे छोड़कर अन्यत्र न जाने वाली हों, उन्हें बुलाओ । जिन लक्ष्मी के द्वारा मैं सुवर्ण, उत्तम ऐश्वर्य, गौ, दासी, घोड़े और पुत्र -पौत्रादि को प्राप्त करूँ अर्थात स्थिर लक्ष्मी को प्राप्त करूँ ।।

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ।। (16)

अर्थ:- जो मनुष्य लक्ष्मी कि कामना करता हो, वह पवित्र और सावधान होकर प्रतिदिन अग्नि में गौघृत का हवन और साथ ही श्रीसूक्त कि पंद्रह ऋचाओं का प्रतिदिन पाठ करें ।।




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