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20 जुलाई 2015

जब शंकर जी ब्याहने चले, नाचे थे भूत पिशाच : राजेश मिश्रा

भष्म रमाकर भोला बन गए थे शिवजी, बरातियों को खाने को मिले गांजा-भांग-धतूरा

यहां प्रस्तुत आलेख में राजेश मिश्रा ने सभी कथा पुराणों, माता सती का पहला जन्म, राजा दक्ष और हिमालय की पुत्री की कहानी, पार्वती मंगल में तुलसीदास द्वारा उल्लेखित, रामचरित मानस आदि से संगृहीत कर सही और गलत सभी तथ्यों को सामने रखा है... इसे अन्यथा न लें. मेरा सिर्फ एक ही उद्देश्य है की लोगों को सभी तथ्यों की जानकारी मिले - जय शिवशंकर- जय माता पार्वती : राजेश मिश्रा
तो प्रेम से बोलें- जय शिव शंकर, गौरी शंकर- पार्वती शिव हरे हरे..

शिव-पार्वती विवाह कथा-पुराणों के अनुसार

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माता सती को ही पार्वती, दुर्गा, काली, गौरी, उमा, जगदम्बा, गिरीजा, अम्बे, शेरांवाली, शैलपुत्री, पहाड़ावाली, चामुंडा, तुलजा, अम्बिका आदि नामों से जाना जाता है। इनकी कहानी बहुत ही रहस्यमय है। यह किसी एक जन्म की कहानी नहीं कई जन्मों और कई रूपों की कहानी है।
देवी भागवत पुराण में माता के 18 रूपों का वर्णन मिलता है। हालांकि नौ दुर्गा और दस महाविद्याओं (कुल 19) के वर्णन को पढ़कर लगता है कि उनमें से कुछ माता की बहने थीं और कुछ का संबंध माता के अगले जन्म से है। जैसे पार्वती, कात्यायिनी अगले जन्म की कहानी है तो तारा माता की बहन थी।

माता सती का पहला जन्म

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सती माता : पुराणों के अनुसार भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक प्रजापति दक्ष कश्मीर घाटी के हिमालय क्षेत्र में रहते थे। प्रजापति दक्ष की दो पत्नियां थी- प्रसूति और वीरणी। प्रसूति से दक्ष की चौबीस कन्याएं जन्मी और वीरणी से साठ कन्याएं। इस तरह दक्ष की 84 पुत्रियां और हजारों पुत्र थे।
राजा दक्ष की पुत्री ‘सती’ की माता का नाम था प्रसूति। यह प्रसूति स्वायंभुव मनु की तीसरी पुत्री थी। सती ने अपने पिती की इच्छा के विरूद्ध कैलाश निवासी शंकर से विवाह किया था।
सती ने अपने पिता की इच्छा के विरूद्ध रुद्र से विवाह किया था। रुद्र को ही शिव कहा जाता है और उन्हें ही शंकर। पार्वती-शंकर के दो पुत्र और एक पुत्री हैं। पुत्र- गणेश, कार्तिकेवय और पुत्री वनलता। जिन एकादश रुद्रों की बात कही जाती है वे सभी ऋषि कश्यप के पुत्र थे उन्हें शिव का अवतार माना जाता था। ऋषि कश्यप भगवान शिव के साढूं थे।
मां सती ने एक दिन कैलाशवासी शिव के दर्शन किए और वह उनके प्रेम में पड़ गई। लेकिन सती ने प्रजापति दक्ष की इच्छा के विरुद्ध भगवान शिव से विवाह कर लिया। दक्ष इस विवाह से संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि सती ने अपनी मर्जी से एक ऐसे व्यक्ति से विवाह किया था जिसकी वेशभूषा और शक्ल दक्ष को कतई पसंद नहीं थी और जो अनार्य था।
दक्ष ने एक विराट यज्ञ का आयोजन किया लेकिन उन्होंने अपने दामाद और पुत्री को यज्ञ में निमंत्रण नहीं भेजा। फिर भी सती अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गई। लेकिन दक्ष ने पुत्री के आने पर उपेक्षा का भाव प्रकट किया और शिव के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें कही। सती के लिए अपने पति के विषय में अपमानजनक बातें सुनना हृदय विदारक और घोर अपमानजनक था। यह सब वह बर्दाश्त नहीं कर पाई और इस अपमान की कुंठावश उन्होंने वहीं यज्ञ कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए।
सती को दर्द इस बात का भी था कि वह अपने पति के मना करने के बावजूद इस यज्ञ में चली आई थी और अपने दस शक्तिशाली (दस महाविद्या) रूप बताकर-डराकर पति शिव को इस बात के लिए विवश कर दिया था कि उन्हें सती को वहां जाने की आज्ञा देना पड़ी। पति के प्रति खुद के द्वारा किए गया ऐसा व्यवहार और पिता द्वारा पति का किया गया अपमान सती बर्दाश्त नहीं कर पाई और यज्ञ कुंड में कूद गई। बस यहीं से सती के शक्ति बनने की कहानी शुरू होती है।
दुखी हो गए शिव जब : यह खबर सुनते ही शिव ने वीरभद्र को भेजा, जिसने दक्ष का सिर काट दिया। इसके बाद दुखी होकर सती के शरीर को अपने सिर पर धारण कर शिव ने तांडव नृत्य किया। पृथ्वी समेत तीनों लोकों को व्याकुल देख कर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र द्वारा सती के शरीर के टुकड़े करने शुरू कर दिए।
शक्तिपीठ : इस तरह सती के शरीर का जो हिस्सा और धारण किए आभूषण जहां-जहां गिरे वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आ गए। देवी भागवत में 108 शक्तिपीठों का जिक्र है, तो देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का जिक्र मिलता है। देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों की चर्चा की गई है। वर्तमान में भी 51 शक्तिपीठ ही पाए जाते हैं, लेकिन कुछ शक्तिपीठों का पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में होने के कारण उनका अस्तित्व खतरें में है।

पार्वती कथा :शिव-पार्वती विवाह

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दक्ष के बाद सती ने हिमालय के राजा हिमवान और रानी मैनावती के यहां जन्म लिया। मैनावती और हिमवान को कोई कन्या नहीं थी तो उन्होंने आदिशक्ति की प्रार्थना की। आदिशक्ति माता सती ने उन्हें उनके यहां कन्या के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। दोनों ने उस कन्या का नाम रखा पार्वती। पार्वती अर्थात पर्वतों की रानी। इसी को गिरिजा, शैलपुत्री और पहाड़ों वाली रानी कहा जाता है।
माना जाता है कि जब सती के आत्मदाह के उपरांत विश्व शक्तिहीन हो गया। उस भयावह स्थिति से त्रस्त महात्माओं ने आदिशक्तिदेवी की आराधना की। तारक नामक दैत्य सबको परास्त कर त्रैलोक्य पर एकाधिकार जमा चुका था। ब्रह्मा ने उसे शक्ति भी दी थी और यह भी कहा था कि शिव के औरस पुत्र के हाथों मारा जाएगा।
शिव को शक्तिहीन और पत्नीहीन देखकर तारक आदि दैत्य प्रसन्न थे। देवतागण देवी की शरण में गए। देवी ने हिमालय (हिमवान) की एकांत साधना से प्रसन्न होकर देवताओं से कहा- ‘हिमवान के घर में मेरी शक्ति गौरी के रूप में जन्म लेगी। शिव उससे विवाह करके पुत्र को जन्म देंगे, जो तारक वध करेगा।’
भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए उन्होंने देवर्षि के कहने मां पार्वती वन में तपस्या करने चली गईं। भगवान शंकर ने पार्वती के प्रेम की परीक्षा लेने के लिए सप्तऋषियों को पार्वती के पास भेजा।
सप्तऋषियों ने पार्वती के पास जाकर उन्हें हर तरह से यह समझाने का प्रयास किया कि शिव औघड़, अमंगल वेषभूषाधारी और जटाधारी है। तुम तो महान राजा की पुत्री हो तुम्हारे लिए वह योग्य वर नहीं है। उनके साथ विवाह करके तुम्हें कभी सुख की प्राप्ति नहीं होगी। तुम उनका ध्यान छोड़ दो। अनेक यत्न करने के बाद भी पार्वती अपने विचारों में दृढ़ रही।
उनकी दृढ़ता को देखकर सप्तऋषि अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने पार्वती को सफल मनोरथ होने का आशीर्वाद दिया और वे पुन: शिवजी के पास वापस आ गए। सप्तऋषियों से पार्वती के अपने प्रति दृढ़ प्रेम का वृत्तान्त सुनकर भगवान शिव अत्यन्त प्रसन्न हुए और समझ गए कि पार्वती को अभी में अपने सती रूप का स्मरण है।
सप्तऋषियों ने शिवजी और पार्वती के विवाह का लग्न मुहूर्त आदि निश्चित कर दिया।

‘पार्वती मंगल’ में शिव-पार्वती विवाह संत तुलसीदास के अनुसार

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पार्वती मंगल गोस्वामी तुलसीदास की प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है। इसका विषय शिव-पार्वती विवाह है। ‘जानकी मंगल’ की भाँति यह भी ‘सोहर’ और ‘हरिगीतिका’ छन्दों में रची गयी है। इसमें सोहर की 148 द्विपदियाँ तथा 16 हरिगीतिकाएँ हैं। इसकी भाषा भी ‘जानकी मंगल की भाँति अवधी है।
कथानक
इसकी कथा ‘रामचरित मानस’ में आने वाले शिव विवाह की कथा से कुछ भिन्न है और संक्षेप में इस प्रकार है-
हिमवान की स्त्री मैना थी। जगज्जननी भवानी ने उनकी कन्या के रूप में जन्म लिया। वे सयानी हुई। दम्पत्ति को इनके विवाह की चिंता हुई। इन्हीं दिनों नारद इनके यहाँ आये। जब दम्पति ने अपनी कन्या के उपयुक्त वर के बारे में उनसे प्रश्न किया, नारद ने कहा -
‘इसे बावला वर प्राप्त होगा, यद्यपि वह देवताओं द्वारा वंदित होगा।’
यह सुनकर दम्पति को चिंता हुई। नारद ने इस दोष को दूर करने के लिए गिरिजा द्वारा शिव की उपासना का उपदेश दिया। अत: गिरिजा शिव की उपासना में लग गयीं। जब गिरिजा के यौवन और सौन्दर्य का कोई प्रभाव शिव पर नहीं पड़ा, देवताओं ने कामदेव को उन्हें विचलित करने के लिए प्रेरित किया किंतु कामदेव को उन्होंने भस्म कर दिया। फिर भी गिरिजा ने अपनी साधना न छोड़ी। कन्द-मूल-फल छोड़कर वे बेल के पत्ते खाने लगीं और फिर उहोंने उसको भी छोड़ दिया। तब उनके प्रेम की परीक्षा के लिए शिव ने बटु का वेष धारण किया और वे गिरिजा के पास गये। तपस्या का कारण पूछने पर गिरिजा की सखी ने बताया कि वह शिव को वर के रूप में प्राप्त करना चाहती हैं। यह सुनकर बटु ने शिव के सम्बन्ध में कहा-
‘वे भिक्षा मांगकर खाते-पीते हैं, मसान में वे सोते हैं, पिशाच-पिशाचिनें उनके अनुचर हैं- आदि। ऐसे वर से उसे क्या सुख मिलेगा?’
किंतु गिरिजा अपने विचारों में अविचल रहीं। यह देखकर स्वयं शिव साक्षात प्रकट हुए और उहोंने गिरिजा को कृतार्थ किया। इसके अनंतर शिव ने सप्तर्षियों को हिमवान के घर विवाह की तिथि आदि निश्चित करने के लिए भेजा और हिमवान से लगन कर सप्तर्षि शिव के पास गये। विवाह के दिन शिव की बारात हिमवान के घर गयी। बावले वर के साथ भूत-प्रेतादि की वह बारात देखकर नगर में कोलाहल मच गया। मैना ने जब सुना तो वह बड़ी दु:खी हुई और हिमवान के समझाने – बुझाने पर किसी प्रकार शांत हुई। यह लीला कर लेने के बाद शिव अपने सुन्दर और भव्य रूप में परिवर्तित हो गये और गिरिजा के साथ धूम-धाम से उनका विवाह हुआ।

रामचरित मानस में शिव-पार्वती विवाह

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‘मानस’ में शिव के लिए गिरिजा की तपस्या तथा शिव का एकाकीपन देखकर राम ने शिव से गिरिजा को अंगीकार करने के लिए कहा है, जिसे उन्होंने स्वीकार किया है। तदंतर शिव ने सप्तर्षियों को गिरिजा की प्रेम-परीक्षा के लिए भेजा है। ‘पार्वती मंगल’ में राम बीच में नहीं पड़ते और गिरिजा की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव स्वयं बटु रूप में जाकर पार्वती की परीक्षा लेते हैं। ‘मानस’ में जो संवाद सप्तर्षि और गिरिजा के बीच में होता है, वह ‘पार्वती मंगल’ में बटु और उनके बीच होता है। ‘मानस’ में कामदहन इस प्रेम-परीक्षा के बाद होता है, जो ‘पार्वती मंगल’ में पहले ही हुआ रहता है। इसीलिए इसके बाद ‘मानस’ में विष्णु आदि को मिल कर शिव से अनुरोध करना पड़ता है कि वे पार्वती को अर्द्धांगिनी रूप में अंगीकार करे, जो ‘पार्वती मंगल’ में नहीं है। तदनन्तर ‘मानस’ में ब्रह्मा ने सप्तर्षि को हिमवान के घर लग्न-पत्रिका प्राप्त करने के लिए भेजा है, जिसके लिए ‘पार्वती मंगल’ में शिव ही उन्हें भेजते हैं। शेष कथा दोनों रचनाओं में प्राय: एक-सी है।

दोनों रचनाओं में अंतर

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प्रश्न यह है कि इस अंतर का कारण क्या है?’मानस’ की कथा शिव-पुराण का अनुसरण करती है और ‘पार्वती मंगल’ की कथा ‘कुमार-सम्भव’ का। ऐसा ज्ञात होता है कि किसी समय तुलसीदास ने शिव-विवाह के विषय का भी उसी प्रकार का एक स्त्री-लोकोपयोगी खण्डकाव्य रचना चाहा, जिस प्रकार उन्होंने राम-विवाह का ‘जानकी मंगल’ रचा था। इस समय ‘शिव-पुराण’ की तुलना में उन्हें ‘कुमार सम्भव’ का आधार ग्रहण करना अधिक जंचा और इसीलिए उन्होंने ऐसा किया।पाठक मित्रों,अंत में आप सबलोग शिव-पार्वती विवाह के इस लोकप्रिय गीत का आन्नद लीजिये -
बम बम भोला
बम बम भोला
बम बम भोला
बम बम भोला
शिवजी बिहाने (बिआहने/बिआह करने) चले
पालकी सजाय के
भाभूति (भभूति/विभूति) लगाय के ना.
हो,
शिवजी बिहाने (बिआहने/बिआह करने) चले
पालकी सजाय के
भाभूति (भभूति/विभूति) लगाय के ना.
पालकी सजाय के ना.
हो जब शिव बाबा करे तइयारी,
लइ के सकल समान हो
दहिने अंग त्रिशूल विराजे
नाचे भूत वैताल हो
बह्मा चले विष्णु चले
लइ के (लेकर) वेद पुराण हो
शंख चक्र ओ गदा धनुष ले
चले सिरी (श्री) भगवान हो.
और बन ठन के चले वो भोला
लेके भांग धतूर का गोला.
बोले जे हरदम
चले लड़िका पराय के
भाभूति लगाय के
पालकी सजाय के ना.
हो,
शिवजी बिहाने चले
पालकी सजाय के
भाभूति लगाय के
पालकी सजाय के ना.
कोई आई कोई आया
कोई आई कोई आया
माता मतधिन परछन चलली
तिलक देली लिलार हो
काला नाग गरदन के नीचे
उहो देलक फुफकार हो
लोटा फेंक के भाग चलइली
का बिधि लिखल लिलार हो
इनके संग बिबाह ना करबो
गौरी रही कुँआरी हो
कहे पारबती समुझाई
बतिया मानो हमरो माई
जेहो है आइल हम करमा लिखाई के
भाभूति लगाय के
पालकी सजाय के ना.
हो,
शिवजी बिहाने चले
पालकी सजाय के
भाभूति लगाय के
पालकी सजाय के ना.
(विवाह क मंत्रोच्चार)
हो,
जब शिव बाबा मँड़वा गइले
होला मंगलाचार हो
बाबा पंडित वेद उचारे
होला शिष्टाचार हो
बजर विखी (वज्रविष वाले सांपों) की लगी झालरी
नागिन की अधिकार हो
बीच मँड़वा में नाउन अइली
कर बन ठन बड़ियार हो.
एगो नागिन दिहलें बिदाई
नाउन धवले चली पराई
सब हँसे लगले ठोका ठठाई के
भाभूति लगाय के
पालकी सजाय के ना.
हो,
शिवजी बिहाने चले
पालकी सजाय के
भाभूति लगाय के
पालकी सजाय के ना
ओ कोमल रूप धरे शिव-शंकर
खुशी भये नर-नारी हो
राजही नाचन गान कराइले
इज्जत रहें हमार हो
रहे वर साथी शिव-शंकर से
केहू के न पावल पार हो
इन के जटा से गंगा बहिली
महिमा अगम अपार हो
जय शिव-शंकर ध्यान लगाये
इन के तीनों लोक दिखाये
कहे दुःख हरण यही
छडो बनवाए के
भभूति लगाये के
पालकी सजाये के ना
ओ शिवजी बिहाने चले
पालकी सजाये के
भभूति लगाये के
पालकी सजाये के ना
ओ शिवजी बिहाने चले
पालकी सजाये के
भभूति लगाये के
पालकी सजाये के ना
ओ शिवजी बिहाने चले
पालकी सजाये के
भभूति लगाये के
पालकी सजाये के ना 
फिल्म : मुनीमजी
संगीतकार : एस डी बर्मन
गीतकार : शैलेन्द्र
गायक : हेमंत कुमार
हिमालिनी और हिंदी साहित्य कोश वेबपेज से आभार सहित संकलित.
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संकलन और प्रस्तुति=सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी,प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम,ग्राम-घमहापुर,पोस्ट-कंदवा,जिला-वाराणसी.पिन-२२११०६.

जब शंकर जी ब्याहने चले, नाचे थे भूत पिशाच


जब भगवान शंकर व पार्वती का विवाह होने वाला था, तो एक बड़ी सुंदर घटना हुई। उनका विवाह भव्य पैमाने पर हो रहा था। उनके विवाह में बड़े से बड़े व छोटे से छोटे लोग सम्मलित हुए। सभी देवता तो वहां मौजूद थे ही, साथ ही असुर भी वहां पहुंचे। आमतौर पर जहां देवता जाते थे, वहां असुर जाने से मना कर देते थे व जहां असुर जाते थे, वहां देवता नहीं जाते थे। उनकी आपस में बिल्कुल नहीं बनती थी। मगर यह तो भगवान शंकर का विवाह था इसलिए उन्होंने अपने सारे झगड़े भुलाकर एक बार एक साथ आने का मन बनाया। 
भगवान शंकर पशुपति हैं, मतलब सभी जीवों के देवता भी हैं, तो सारे जानवर, कीड़े-मकौड़े व सारे जीव उनके विवाह में उपस्थित हुए। यहां तक कि भूत-पिशाच व विक्षिप्त लोग भी उनके विवाह में मेहमान बन कर पहुंचे। एक तरफ भूत-पिशाच नाच रहे थें दूसरी तरफ पार्वती की माता मैना रानी भूत-पिशाच को देखकर बेसुध हो गई थी।
यह एक राजसिक विवाह था अतः विवाह समारोह से पहले एक अहम समारोह होना था। वर-वधू दोनों की वंशावली घोषित की जानी थी। पार्वती की वंशावली का बखान खूब धूमधाम से किया गया। यह कुछ देर तक चलता रहा। आखिरकार जब उन्होंने अपने वंश के गौरव का बखान खत्म किया, तो वे उस ओर मुड़े, जिधर वर भगवान शंकर बैठे हुए थे। सभी अतिथि इंतजार करने लगे कि वर की ओर से कोई उठकर भगवान शंकर के वंश के गौरव के बारे में बोलेगा मगर किसी ने एक शब्द भी नहीं कहा।
वधू का परिवार अचंभित था कि भगवान शंकर के परिवार में कोई ऐसा नहीं है जो खड़े होकर उनके वंश की महानता के बारे में बता सके ? मगर वाकई कोई नहीं था। वर के माता-पिता, रिश्तेदार या परिवार से कोई वहां नहीं आया था क्योंकि उनके परिवार में कोई था ही नहीं। वह सिर्फ अपने गणों के साथ आए थे।
पार्वती के पिता पर्वतराज ने भगवान शंकर से अनुरोध किया,"कृपया अपने वंश के बारे में कुछ बताइए।"
भगवान शंकर कहीं शून्य में देखते हुए चुपचाप बैठे रहे। वह न तो दुल्हन की ओर देख रहे थे, न ही विवाह को लेकर उनमें कोई उत्साह नजर आ रहा था। वह बस अपने गणों से घिरे हुए बैठे रहे व शून्य में घूरते रहे। वधू पक्ष के लोग बार-बार उनसे यह सवाल पूछते रहे क्योंकि कोई भी अपनी बेटी का विवाह ऐसे व्यक्ति से नहीं करना चाहेगा, जिसके वंश का अता-पता न हो। उन्हें जल्दी थी क्योंकि विवाह के लिए शुभ मुहूर्त तेजी से निकला जा रहा था मगर भगवान शंकर मौन रहे। भगवान शंकर कहीं शून्य में देखते हुए चुपचाप बैठे रहे।
समाज के लोग, कुलीन राजा-महाराजा व विप्र गण घृणा से भगवान् शंकर की ओर देखने लगे व तुरंत फुसफुसाहट शुरू हो गई," इसका वंश क्या है ? यह बोल क्यों नहीं रहा है ? इसे अपने वंश के बारे में बताने में शर्म आ रही है।"
फिर नारद मुनि, जो उस सभा में मौजूद थे, ने यह सब तमाशा देखकर अपनी वीणा उठाई व उसकी एक ही तार खींचते रहे। वह लगातार एक ही धुन बजाते रहे। इससे खीझकर पार्वती के पिता पर्वत राज अपना आपा खो बैठे और बोले, "यह खिझाने वाला शोर क्यों कर रहे हैं? क्या यह कोई जवाब है?"
नारद ने जवाब दिया," वर के माता-पिता नहीं हैं।"
राजा ने पूछा," क्या आप यह कहना चाहते हैं कि वह अपने माता-पिता के बारे में नहीं जानते।"
नारद मुनी बोले, "नहीं, इनके माता-पिता ही नहीं हैं और नारद बोले कि इनकी कोई विरासत नहीं है। इनका कोई गोत्र नहीं है। इनके पास कुछ नहीं है। इनके पास अपने खुद के अलावा कुछ नहीं है।"
पूरी सभा चकरा गई। पर्वत राज ने कहा, " हम ऐसे लोगों को जानते हैं जो अपने पिता या माता के बारे में नहीं जानते। ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति हो सकती है। मगर हर कोई किसी न किसी से जन्मा है। ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी का कोई पिता या मां ही न हो।"
नारद ने जवाब दिया, ‘क्योंकि यह स्वयंभू हैं। इन्होंने खुद की रचना की है। इनके न तो पिता हैं न माता। इनका न कोई वंश है, न परिवार। यह किसी परंपरा से संबंध नहीं रखते व न ही इनके पास कोई राज्य है। इनका न तो कोई गोत्र है व न कोई नक्षत्र। न कोई भाग्यशाली तारा इनकी रक्षा करता है। यह इन सब चीजों से परे हैं। यह एक योगी हैं व इन्होंने सारे अस्तित्व को अपना एक हिस्सा बना लिया है। ये किसी से उत्त्पन्न नहीं हुए हैं वरन सम्पूर्ण ब्रहमांड इन्ही से उत्पन्न हुआ है।"

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