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07 अक्तूबर 2015

ये देवता आज भी दिखाई देते हैं...:राजेश मिश्रा

इन 8 देवता-महापुरुषों की लीला 

को अद्भुत पौराणिक तथ्यों के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ. ये कौन हैं, किस श्राप या वरदान के चलते इन्हें आज भी धरती से मोक्ष नहीं मिला, आज भी ये कहाँ वास करते हैं, किस रूप में दीखते हैं, अपनी एहसास कैसे कराते हैं... किसी ने इनको इस बीच देखा या नहीं.. राजेश मिश्रा विस्तार से बता रहे हैं.... 

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान देते वक्त कहा था कि आत्मा अमर है और यह निश्चित समय के लिए अलग-अलग शरीर धारण करती है. लेकिन गणेश जी तो ऐसे हैं कि जिन्होंने जन्म लिया है और वे हजारों बरस से भक्तों का भार धारण किए हुए हैं. यानी अमर हैं, और इनके बत्तीस रूप हर युग में अलग-अलग होते रहते हैं. प्राचीन मान्यताओं के अनुसार भगवान् गणपति के अलावा आठ और ऐसे देव हैं जो आज भी अपने भारतवर्ष में जीवित हैं. इनका अमरत्व बहुत प्रभावकारी माना जाता है, यदि कोई भक्त दिल से याद करता हैं तो उन पर शीघ्र कृपा होती है. आइए जानते हैं वे मंगलकारी ईश्वर के अंश जिन्हें कलयुग में भी अमरत्व हासिल है.

1. गणेश जी

हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव के पुत्र व मां पार्वती के बेटे गणेश जी कभी भी कहीं भी उपस्थित रहेंगे. ब्रह्माजी ने शिव द्वारा त्रिशूल से उनकी गर्दन काट देने के बाद उन्हें वरदान दिया था कि ये बालक सदां भक्तों की रक्षा का पात्र और सबसे पहले पूजनीय रहेगा.

2. बजरंग बली

हनुमानजी माता सीता की खोज में समुद्र पार कर लंका पहुंचे और माता सीता को रावण की अशोक वाटिका में देखा, हनुमान ने देवी जानकी को श्रीराम की मुद्रिका दी. श्रीराम के वियोग में बेहाल सीता ने श्रीराम की मुद्रिका देखी तब उन्हें यह विश्वास हो गया कि प्रभु उन्हें जल्द ही दैत्यराज रावण की कैद से मुक्त कराएंगे और रावण को उसके किए पाप की सजा मिलेगी. इस सुखद अहसास से प्रसन्न होकर माता सीता ने हनुमान को अमरता का वरदान दिया. तभी से हनुमानजी चिरंजीवी माने जाते हैं.

3. अश्वत्थामा

महाभारत में कौरवों के ओर से पांडवों के विरुद्ध लड़ने वाला ये महावीर आज भी ब्रज में भटक रहा है. अश्वत्थामा आचार्य द्रोण के पुत्र हैं. अश्वत्थामा के माथे पर अमरमणि थी इसीलिए वह अमर हुए, लेकिन अर्जुन ने वह अमरमणि निकाल ली थी. ब्रह्मास्त्र चलाने के कारण श्रीकृष्ण ने उन्हें शाप दिया था कि कल्पांत तक तुम इस धरती पर जीवित रहोगे. माना जाता है कि वे पिसावा व कुरुक्षेत्र के जंगलों में विराजमान हैं और मध्यप्रदेश के असीरगढ किले में शिव पूजा के लिए भी जाते हैं. अपने कर्म के कारण भटक रहा ये महामानव हालांकि किसी को दिखाई नहीं देता लेकिन यह पौराणिक सत्य है.

4. परशुराम जी

परशुराम जी विष्णु के छठवें अवतार माने जाते हैं. इनके पिता का नाम जमदग्नि और माता का नाम रेणुका है. पति परायणा माता रेणुका ने पाँच पुत्रों को जन्म दिया, जिनके नाम क्रमशः वसुमान, वसुषेण, वसु, विश्वावसु तथा राम रखे गए. राम की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें फरसा दिया था इसीलिए उनका नाम परशुराम हो गया. इनका प्रादुर्भाव वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ, इसलिए उक्त तिथि अक्षय तृतीया कहलाती है. इनका जन्म समय सतयुग और त्रेता का संधिकाल माना जाता है. ये भी अमर हैं, इनकी भक्ति करने वाला अकेला ही शत्रुओं पर विजय पाने लायक क्षमता रखता है.

5. विभीषण

त्रेता में जन्मे ये रामभक्त रावण के छोटे भाई हैं. इन्होंने राम की नाम की महिमा जपकर अपने भाई के विरु‍द्ध लड़ाई में उनका साथ दिया और जीवन भर राम नाम जपते रहे. रावण वध के पश्चात् श्रीराम ने इन्हें लंका का राजा बनाया. ये अमर हैं.

6. व्यास जी

दुनिया का सबसे बडा़ महाकाव्य लिखने वाले ये ऋषि अमर माने जाते हैं. व्यास ऋषि पराशर एवं सत्यवती के पुत्र थे. इनके बारे में कहावत हैं कि ये साँवले रंग के थे तथा यमुना के बीच स्थित एक द्वीप में उत्पन्न हुए थे. अतः ये साँवले रंग के कारण ‘कृष्ण’ तथा जन्मस्थान के कारण ‘द्वैपायन’ कहलाए. इनकी माता ने बाद में शान्तनु से विवाह किया, जिनसे उनके दो पुत्र हुए, जिनमें बड़ा चित्रांगद युद्ध में मारा गया और छोटा पुत्र विचित्र वीर्य संतानहीन मर गया. आज पूरी दुनियां में इनकी रचित महाभारत के कारण ही भारत को सबसे प्राचीन देश का दर्जा अर्जित है.

7. कृपाचार्य

ये शरद्वान् गौतम की संतान हैं और अश्वत्थामा की तरह अमर बताए जाते हैं. इन्हें कौरवों के कुलगुरू होने का गौरव हासिल है, और द्रोण-आचार्य की पत्नी के भाई हैं. कथा है कि शिकार खेलते हुए शान्तनु को दो शिशु प्राप्त हुए। उन दोनों का नाम कृपी और कृप रखकर शान्तनु ने उनका लालन-पालन किया. महाभारत युद्ध में कृपाचार्य कौरवों की ओर से सक्रिय थे.

8. राजा बलि

शास्त्रों के अनुसार राजा बलि भक्त प्रहलाद के वंशज हैं. बलि ने भगवान विष्णु के वामन अवतार को अपना सब कुछ दान कर दिया था. इसी कारण इन्हें महादानी के रूप में जाना जाता है. राजा बलि से श्रीहरि अतिप्रसन्न थे. भगवाऩ् ने इन्हें अमरत्व दे दिया.

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