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07 अक्तूबर 2015

सीता को एक गर्भवती के श्राप ने राम से दूर कर दिया...

विवाह से पूर्व सीता की महत्वाकांक्षा ने नस्ट कर दी राम की खुशियां... वह गर्भवती कौन थी.. जिसने श्राप दिया...


धर्म हमें सच्चाई के मार्ग पर चलना सिखाता है. सनातन धर्म में दूसरों को पीड़ा पहुँचाने को पाप और परोपकार को पुण्य माना गया है. इस धर्म से जुड़ी किंवदंतियां यह बताती है कि ईश्वर को भी अपनी गलती की सजा भोगनी पड़ती है.

ऐसी ही एक किंवदंती है जो बताती है कि दशरथ वधू माता सीता द्वारा जब किसी को तड़पाया गया तो उन्हें उसकी सजा भोगनी पड़ी थी. इस घटना को बहुत कम लोग ही जानते हैं. किस गर्भवती को तड़पाया था माँ सीता ने? किसने दिया था माता सीता को श्राप? माता सीता को उस श्राप की कौन सी सजा मिली थी?

सीता मिथिला नरेश जनक की पुत्री थी. एक दिन उद्यान(बगीचे) में खेलते हुए कन्या सीता को एक नर व मादा तोते का जोड़ा दिखाई पड़ा. वो दोनों आपस में बातें कर रहे थे.

वो जोड़ा ये बात कर रहे थे कि भूमंडल में राम नाम का बड़ा प्रतापी राजा होगा जिसकी अत्यंत सुंदर पत्नी सीता होगी. उत्सुकतावश सीता अपने को रोक ना सकी और उनकी बातें सुनने लगी. उन्हें अपने ब्याह के बारे में सुन अच्छा लग रहा था. इसी उमंग में उन्होंने बातचीत में मग्न तोते के उस जोड़े को पकड़वा लिया.

सीता उनसे अपने और श्रीराम के बारे में और भी बातें सुनना चाहती थी इसलिए उन्होंने उस जोड़े से पूछा कि उन्हें राम और उसके विवाह के बारे में ये बातें कहाँ से पता चली. तोते ने कहा कि उन्होंने ये बात महर्षि वाल्मीकि के मुख से उनके आश्रम में शिष्यों को पढ़ाते वक्त सुनी.

इस पर सीता ने कहा कि ‘’तुम जनक की जिस पुत्री के बारे में बात कर रहे हो वो मैं ही हूँ. तुम्हारी बातें मुझे रोमांचित कर रही है इसलिए अब मैं तुम्हें तब छोड़ूँगी जब मेरा विवाह श्रीराम से हो जाएगा.’’

तोते ने याचना करते हुए कहा कि ‘’हे देवी! हम पक्षी हैं जिसे घर में सुख नहीं मिल सकता है. हमारा काम ही आसमाँ में विचरण करना है.’’ सीता ने नर तोते को आज़ाद कर दिया और कहा कि ‘’ठीक है तुम सुखपूर्वक विचरो, परंतु तुम्हारी पत्नी को मैं तब छोड़ूँगी जब मुझे राम प्राप्त हो जाएँगे.’’

नर तोते ने फिर गिड़गिड़ाते हुए कहा हे सीते मेरी यह पत्नी गर्भ से है. मैं इसका वियोग सह ना पाऊँगा. कन्या सीता ने फिर भी मादा तोते को नहीं छोड़ा. इस पर क्रोध में आकर मादा तोते ने सीता को श्राप दिया कि ‘’जैसे तू मेरी गर्भावस्था में मेरे पति से मुझे दूर कर रही है उसी प्रकार तुझे भी अपनी गर्भावस्था में अपने राम का वियोग सहना पड़ेगा.’’

इतना कहते ही मादा तोते ने प्राण त्याग दिया. कुछ समय बाद उसके वियोग में व्यथित नर तोते ने भी अपने प्राण त्याग दिए. सालो बाद इसी श्राप के कारण ही माता सीता को श्रीराम ने उनकी गर्भावस्था के दैरान ही वन में भेज दिया था.

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