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27 नवंबर 2015

Hindu Vrat Tyohar

वर्ष 2016 के व्रत एवं त्योहार : राजेश मिश्रा 

प्रत्येक वर्ष की तरह हम अपने पाठकों की सुविधा के लिए वर्ष 2016 के व्रत व त्यौहार की विषय सूची हर माह के रुप में दे रहे हैं। इसमें जनवरी 2016 से लेकर दिसंबर 2016 तक के सभी व्रत व त्यौहारो का वर्णन है। आइये जानें वर्ष 2016 के सम्पूर्ण व्रत एवं त्योहार –

जनवरी 2016

● 1 जनवरी (शुक्रवार) – नव वर्ष प्रारम्भ
● 5 जनवरी (मंगलवार) – सफलता एकादशी व्रत
● 7 जनवरी (गुरुवार) – प्रदोष व्रत
● 8 जनवरी (शुक्रवार) – मासिक शिवरात्रि
● 9 जनवरी (शनिवार) – देवकार्ये अमावस्या
● 12 जनवरी (मंगलवार) – स्वामी विवेकानन्द जयंती
● 13 जनवरी (बुधवार) – लोहड़ी पर्व
● 14 जनवरी (गुरुवार) – मकर संक्रान्ति
● 16 जनवरी (शनिवार) – गुरु गोविन्द सिंह जयन्ती
● 20 जनवरी (बुधवार) – पुत्रदा एकादशी व्रत
● 21 जनवरी (गुरुवार) – प्रदोष व्रत
● 23 जनवरी (शनिवार) – नेताजी सुभाष जयन्ती
● 26 जनवरी (मंगलवार) – गणतंत्र दिवस
● 27 जनवरी (बुधवार) – तिलकुटा (सकट) चौथ

फरवरी 2016

● 1 फरवरी (सोमवार) – कालाष्टमी
● 4 फरवरी (गुरुवार) – षट्तिला एकादशी व्रत
● 6 फरवरी (शनिवार) – प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि व्रत
● 8 फरवरी (सोमवार) – सोमवती अमावस्या, देव पितृ अमावस्या
● 11 फरवरी (गुरुवार) – तिल चौथ
● 13 फरवरी (शनिवार) – बसन्त पंचमी, कुंभ संक्रान्ति
● 14 फरवरी (रविवार) – रथ सप्तमी
● 15 फरवरी (सोमवार) – भीष्माष्टमी
● 18 फरवरी (गुरुवार) – जया एकादशी व्रत
● 19 फरवरी (शुक्रवार) – भीष्म द्वादशी
● 20 फरवरी (शनिवार) – प्रदोष ब्रत
● 22 फरवरी (सोमवार) – माघी पूर्णिमा, रविदास जयन्ती
● 26 फरवरी (शुक्रवार) – चतुर्थी व्रत

मार्च 2016

● 2 मार्च (बुधवार) – जानकी जयंती
● 3 मार्च (गुरुवार) – समर्थ गुरु रामदास जयन्ती
● 4 मार्च (शुक्रवार) – महर्षि दयानंद सरस्वती जयन्ती
● 5 मार्च (शनिवार) – विजया एकादशी व्रत
● 6 मार्च (रविवार) – प्रदोष व्रत
● 7 मार्च (सोमवार) – महाशिवरात्रि व्रत
● 8 मार्च (मंगलवार) – पितृ कार्ये अमावस्या
● 9 मार्च (बुधवार) – देव कार्ये अमावस्या
● 10 मार्च (गुरुवार) – फुलैरा दूज, रामकृष्ण परमहंस जयंती
● 12 मार्च (शनिवार) – गणेश चतुर्थी
● 13 मार्च (रविवार) – याज्ञवल्क्य जयन्ती
● 14 मार्च (सोमवार) – मीन संक्रान्ति
● 16 मार्च (बुधवार) – होलाष्टकारंभ
● 19 मार्च (शनिवार) – आमलकी एकादशी
● 20 मार्च (रविवार) – प्रदोष व्रत
● 23 मार्च (बुधवार) – होलिका दहन
● 24 मार्च (गुरुवार) – धूलैंडी
● 28 मार्च (सोमवार) – रंग पंचमी
● 29 मार्च (मंगलवार) – एकनाथ षष्ठी व्रत
● 31 मार्च (गुरुवार) – शीतला अष्टमी

अप्रैल 2016

● 3 अप्रैल (रविवार) – पापमोचनी एकादशी व्रत
● 5 अप्रैल (मंगलवार) – प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि व्रत
● 7 अप्रैल (गुरुवार) – देवपितृ कार्ये अमावस्या
● 8 अप्रैल (शुक्रवार) – नवरात्रारंभ, झूलेलाल जयन्ती
● 9 अप्रैल (शनिवार) – मत्स्य जयन्ती, गणगोरी पूजा
● 12 अप्रैल (मंगलवार) – स्कंद षष्ठी
● 13 अप्रैल (बुधवार) – मेष संक्रान्ति 19/14
● 15 अप्रैल (शुक्रवार) – श्री राम नवमी
● 17 अप्रैल (रविवार) – कामदा एकादशी
● 19 अप्रैल (मंगलवार) – प्रदोष व्रत, महावीर जयन्ती
● 21 अप्रैल (गुरुवार) – पूर्णिमा व्रत
● 22 अप्रैल (शुक्रवार) – हनुमान जयंती
● 25 अप्रैल (सोमवार) – चतुर्थी व्रत
● 26 अप्रैल (मंगलवार) – अनुसूया जयन्ती

मई 2016

● 1 मई (रविवार) – मजदूर दिवस
● 3 मई (मंगलवार) – वरूथिनी एकादशी व्रत
● 4 मई (बुधवार) – प्रदोष व्रत
● 5 मई (गुरुवार) – मासिक शिवरात्रि व्रत
● 6 मई (शुक्रवार) – देवपितृ कार्ये अमावस्या
● 7 मई (शनिवार) – टैगोर जयन्ती
● 8 मई (रविवार) – शिवाजी जयंती, परशुराम जयंती
● 9 मई (सोमवार) – अक्षय तृतीया
● 11 मई (बुधवार) – आघ शंकराचार्य जयंती
● 12 मई (गुरुवार) – गंगोत्पत्ति, श्रीरामानुज जयंती
● 14 मई (शनिवार) – वृष संक्रान्ति
● 15 मई (रविवार) – सीमा नवमी
● 17 मई (मंगलवार) – मोहनी एकादशी व्रत
● 19 मई (गुरुवार) – प्रदोष व्रत
● 20 मई (शुक्रवार) – नृसिंह जयंती
● 21 मई (शनिवार) – कूर्म जयंती, बुद्ध पूर्णिमा
● 23 मई (सोमवार) – नारद जयन्ती
● 25 मई (बुधवार) – चतुर्थी व्रत चन्द्रोदय 22/16

जून 2016

● 1 जून (बुधवार) – अपरा एकादशी व्रत
● 2 जून (गुरुवार) – प्रदोष व्रत
● 3 जून (शुक्रवार) – मासिक शिव रात्रि व्रत
● 4 जून (शनिवार) – शनिश्चर जयन्ती, पितृ कार्ये अमावस्या, वट सावित्री व्रत
● 5 जून (रविवार) – देवकार्ये अमावस्या
● 7 जून (मंगलवार) – रमजान प्रारम्भ
● 12 जून (रविवार) – दुर्गाष्टमी, धूमावती जयन्ती
● 14 जून (मंगलवार) – मिथुन संक्रान्ति
● 15 जून (बुधवार) – गंगा दशहरा
● 16 जून (गुरुवार) – निर्जला एकादशी व्रत
● 17 जून (शुक्रवार) – प्रदोष व्रत
● 20 जून (सोमवार) – कबीर जयन्ती
● 23 जून (गुरुवार) – चतुर्थी व्रत
● 30 जून (गुरुवार) – योगिनी एकादशी व्रत

जुलाई 2016

● 2 जुलाई (शनिवार) – प्रदोष व्रत
● 4 जुलाई (सोमवार) – सोमवती अमावस्या
● 6 जुलाई (बुधवार) – श्री जगदीश रथ यात्रा
● 10 जुलाई (रविवार) – स्कंध षष्ठी
● 13 जुलाई (बुधवार) – भड्डली नवमी
● 15 जुलाई (शुक्रवार) – देवशयनी एकादशी व्रत
● 16 जुलाई (शनिवार) – कर्क संक्रान्ति
● 17 जुलाई (रविवार) – प्रदोष व्रत
● 19 जुलाई (मंगलवार) – गुरु पूर्णिमा
● 24 जुलाई (रविवार) – नाग पंचमी
● 30 जुलाई (शनिवार) – कामिका एकादशी व्रत
● 31 जुलाई (रविवार) – प्रदोष व्रत

अगस्त 2016

● 1 अगस्त (सोमवार) – मासिक शिवरात्रि व्रत
● 2 अगस्त (मंगलवार) – देवपितृ कार्ये अमावस्या
● 5 अगस्त (शुक्रवार) – हरियाली तीज
● 6 अगस्त (शनिवार) – वरदचतुर्थी व्रत
● 7 अगस्त (रविवार) – नाग पंचमी
● 8 अगस्त (सोमवार) – कल्कि जयन्ती
● 9 अगस्त (मंगलवार) – शीतला षष्ठी,
● 10 अगस्त (बुधवार) – गोस्वामी तुलसीदास जयंती
● 14 अगस्त (रविवार) – पवित्रा एकादशी व्रत
● 15 अगस्त (सोमवार) – प्रदोष व्रत
● 18 अगस्त (गुरुवार) – पूर्णिमा व्रत, रक्षाबन्धन
● 23 अगस्त (मंगलवार) – हल षष्ठी
● 25 अगस्त (गुरुवार) – जन्माष्टमी व्रत
● 26 अगस्त (शुक्रवार) – गोगा नवमी
● 27 अगस्त (शनिवार) – अजा एकादशी व्रत
● 29 अगस्त (सोमवार) – प्रदोष व्रत

सितम्बर 2016

● 1 सितम्बर (गुरुवार) – देवपितृ कार्ये अमावस्या
● 4 सितम्बर (रविवार) – वाराहजयन्ती, हरतालिका तीज
● 5 सितम्बर (सोमवार) – गणेश चतुर्थी व्रत
● 6 सितम्बर (मंगलवार) – ऋषि पंचमी
● 7 सितम्बर (बुधवार) – सूर्य षष्ठी व्रत
● 8 सितम्बर (गुरुवार) – सन्तान सप्तमी
● 9 सितम्बर (शुक्रवार) – श्रीराधा अष्टमी
● 13 सितम्बर (मंगलवार) – जलझूलनी एकादशी व्रत
● 14 सितम्बर (बुधवार) – प्रदोष व्रत
● 15 सितम्बर (गुरुवार) – अनंत चतुर्दशी व्रत
● 16 सितम्बर (शुक्रवार) – पूर्णिमा व्रत
● 17 सितम्बर (शनिवार) – विश्वकर्मा पूजा
● 19 सितम्बर (सोमवार) – चतुर्थी व्रत
● 23 सितम्बर (शुक्रवार) – महालक्ष्मी व्रत
● 26 सितम्बर (सोमवार) – इन्दिरा एकादशी व्रत
● 28 सितम्बर (बुधवार) – प्रदोष व्रत
● 30 सितम्बर (शुक्रवार) – सर्वपितृ अमावस्या

अक्टूबर 2016

● 1 अक्टूबर (शनिवार) – नवरात्रारंभ, अग्रेसन जयंती
● 2 अक्टूबर (रविवार) – गांधी, शास्त्री जयंती
● 9 अक्टूबर (रविवार) – महाष्टमी
● 11 अक्टूबर (मंगलवार) – विजय दशमी
● 12 अक्टूबर (बुधवार) – पापांकुशा एकादशी व्रत
● 14 अक्टूबर (शुक्रवार) – प्रदोष व्रत
● 15 अक्टूबर (शनिवार) – शरद् पूर्णिमा
● 19 अक्टूबर (बुधवार) – करवा चौथ
● 21 अक्टूबर (शुक्रवार) – स्कंद षष्ठी
● 23 अक्टूबर (रविवार) – अहोई आठें
● 26 अक्टूबर (बुधवार) – रमा एकादशी व्रत
● 28 अक्टूबर (शुक्रवार) – धनतेरस, प्रदोष व्रत
● 29 अक्टूबर (शनिवार) – नरक चतुर्दशी
● 30 अक्टूबर (रविवार) – महालक्ष्मी पूजा
● 31 अक्टूबर (सोमवार) – गोवर्धन पूजा (अन्नकूट)

नवम्बर 2016

● 1 नवम्बर (मंगलवार) – भैया दूज (यमद्वितीय)
● 5 नवम्बर (शनिवार) – सौभाग्य पंचमी
● 8 नवम्बर (मंगलवार) – गोपाष्टमी
● 9 नवम्बर (बुधवार) – अक्षय नवमी
● 11 नवम्बर (शुक्रवार) – प्रबोधिनी एकादशी व्रत
● 12 नवम्बर (शनिवार) – प्रदोष व्रत
● 14 नवम्बर (सोमवार) – पूर्णिमा व्रत, गुरु नानक जयंती
● 17 नवम्बर (गुरुवार) – चतुर्थी व्रत
● 21 नवम्बर (सोमवार) – काल भैरवाष्टमी
● 25 नवम्बर (शुक्रवार) – उत्पत्ति एकादशी व्रत
● 26 नवम्बर (शनिवार) – प्रदोष व्रत
● 29 नवम्बर (मंगलवार) – देवपितृ अमावस्या

दिसम्बर 2016

● 5 दिसम्बर (सोमवार) – स्कंद षष्ठी
● 10 दिसम्बर (शनिवार) – मोक्षदा एकादर्शी व्रत
● 11 दिसम्बर (रविवार) – प्रदोष व्रत
● 13 दिसम्बर (मंगलवार) – दत्रात्रेय जयंती, पूर्णिमा व्रत
● 15 दिसम्बर (गुरुवार) – धनु संक्रान्ति
● 17 दिसम्बर (शनिवार) – चतुर्थी व्रत
● 24 दिसम्बर (शनिवार) – सफलता एकादशी व्रत
● 25 दिसम्बर (रविवार) – क्रिसमस डे (बड़ा दिन)
● 26 दिसम्बर (सोमवार) – प्रदोष व्रत
● 28 दिसम्बर (बुधवार) – पितृकार्ये अमावस्या
● 29 दिसम्बर (गुरुवार) – देवकार्ये अमावस्या 

नववर्ष में पड़ने वाला ये व्रत त्यौहार हमने भरसक शत-प्रतिशत सही देने का प्रयाश किया है... अगर कोई त्रुटि रह जाये तो राजेश मिश्रा को छोटा भाई समझ कर माफ़ कर दें... और सही जानकारी के लिए किसी और महापंडित से संपर्क करें... ये जरुरी नहीं की मेरा लिखा हुआ ही सही हो... इसलिए यहाँ पढ़ने के बाद भी दूसरे से बात करके सही जानकारी ले लें... राधे राधे.... जय माता दी, कुल देवी बन्नी माता की जय, ब्रह्म बाबा की जय... माता भगवती की कृपा आप सभी पर बानी रहे... 

19 नवंबर 2015

Ekadashi Vrat Niyam or Khaanpan

एकादशी व्रत का नियम और खानपान : राजेश मिश्रा 

भगवान श्री कृष्णा के चरणों में अरदास करते राजेश मिश्रा 


एकादशी का व्रत भगवान विष्णु जी या भगवान कृष्ण जी का व्रत होता है. एकादशी व्रत करने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को दशमी के दिन से कुछ अनिवार्य नियमों का पालन करना पड़ेगा।

दशमी के दिन

दशमी के दिन एक ही समय दिन में ही भोजन करना चाहिये रात्रि में नहीं. एक समय भोजन करके एकादशी व्रत का संकल्प लेना चाहिये-
1. इस दिन मांस, प्याज, मसूर की दाल आदि का निषेध वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए.
2. फलाहारी को गाजर, शलजम, गोभी, पालक, इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए। केला, आम, अंगूर, बादाम, पिस्ता इत्यादि अमृत फलों का सेवन करें। प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर ग्रहण करना चाहिए.
3. रात्रि को पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए तथा भोग-विलास से दूर रहना चाहिए। एकादशी को अन्न नहीं खाते.स्वयं किसी का दिया हुआ अन्न आदि कदापि ग्रहण न करें। और किसी अन्य के घर में नहीं खाना चाहिये.
4. एकादशी के दिन "चावल" न खाने के विषय में यह जानना आवश्यक है कि चावल और अन्य अन्नों की खेती में अंतर है। यह सर्वविदित है कि चावल की खेती के लिए सर्वाधिक जल की आवश्यकता होती है। एकादशी का व्रत इंद्रियों सहित मन के निग्रह के लिए किया जाता है। ऎसे में यह आवश्यक है कि उस वस्तु का कम से कम या बिलकुल नहीं उपभोग किया जाए जिसमें जलीय तत्व की मात्रा अधिक होती है। कारण-चंद्र का संबंध जल से है। वह जल को अपनी ओर आकर्षित करता है।

यदि व्रती चावल का भोजन करे तो चंद्रकिरणें उसके शरीर के संपूर्ण जलीय अंश को तरंगित करेंगी। परिणाम जिस एकाग्रता से उसे व्रत के अन्य कर्म-स्तुति पाठ, जप, श्रवण करने होगे. उन्हें सही प्रकार से नहीं कर पाएगा। ज्ञातव्य हो कि औषधि के साथ पथ्य का भी ध्यान रखना आवश्यक होता है।

एकादशी के दिन

  • एकादशी के दिन प्रात: लकड़ी का दातुन न करें, नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और उँगली से कंठ साफ कर लें, वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी ‍वर्जित है। अत: स्वयं गिरा हुआ पत्ता लेकर सेवन करें। यदि यह संभव न हो तो पानी से बारह बार कुल्ले कर लें। फिर स्नानादि कर मंदिर में जाकर गीता पाठ करें, प्रभु के सामने इस प्रकार संकल्प करना चाहिए- कि 'आज मै एकादशी का व्रत करूँगा आप मेरे संकल्प को पूरा करे ,मैं चोर, पाखंडी और दुराचारी मनुष्यों से बात नहीं करूँगा और न ही किसी का दिल दुखाऊँगा। रात्रि को जागरण कर कीर्तन करूँगा।'
  • 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस द्वादश मंत्र का जाप करें। राम, कृष्ण, नारायण आदि विष्णु के सहस्रनाम को कंठ का भूषण बनाएँ। भगवान विष्णु का स्मरण कर प्रार्थना करें कि- हे त्रिलोकीनाथ! मेरी लाज आपके हाथ है, अत: मुझे इस प्रण को पूरा करने की शक्ति प्रदान करना।
  • इस दिन बाल नहीं कटवाना चाहिए, हजामत नहीं करवानी चाहिये , नाख़ून नहीं कटना चाहिये, क्रोध नहीं करना चाहिये, अधिक नहीं बोलना चाहिए। अधिक बोलने से मुख से न बोलने वाले शब्द भी निकल जाते हैं।झूठ नहीं बोलना चाहिये, चोरी नहीं करनी चाहिये, किसी के साथ धोखा न करे, जुआ न खेले, दिन में नही सोना चाहिये.
  • यदि भूलवश किसी निंदक से बात कर भी ली तो भगवान सूर्यनारायण के दर्शन कर धूप-दीप से श्री‍हरि की पूजा कर क्षमा माँग लेना चाहिए। एकादशी के दिन घर में झाड़ू नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि चींटी आदि सूक्ष्म जीवों की मृत्यु का भय रहता है।
  • इस दिन यथा‍शक्ति दान करना चाहिए। दशमी के साथ मिली हुई एकादशी वृद्ध मानी जाती है। वैष्णवों को योग्य द्वादशी मिली हुई एकादशी का व्रत करना चाहिए। त्रयोदशी आने से पूर्व व्रत का पारण करें।

द्वादशी के दिन

द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को मिष्ठान्न, भोजन करना चाहिये, दक्षिणा देना चाहिए। फिर अपने व्रत का पारण करना चाहिये, क्रोध नहीं करते हुए मधुर वचन बोलना चाहिए। तुलसी से पूजा करे.

धर्ममार्ग परिवार की ओर से राजेश मिश्रा के साथ आप सभी बोलें- "जय जय श्री राधे"

07 नवंबर 2015

दीपावली से जुड़े कुछ रोचक तथ्य : Meaning of Diwali Festival

दीपावली से जुड़े कुछ रोचक तथ्य 
धार्मिक ग्रंथों में दिवाली का महत्व : राजेश मिश्रा


दीपोत्सव का वर्णन प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। दीपावली से जुड़े कुछ रोचक तथ्य हैं जो इतिहास के पन्नों में अपना विशेष स्थान बना चुके हैं। इस पर्व का अपना ऐतिहासिक महत्व भी है, जिस कारण यह त्योहार किसी खास समूह का न होकर संपूर्ण राष्ट्र का हो गया है। आइए राजेश मिश्रा के माध्यम से जानते है दीपावली से जुड़े धार्मिक तथ्य...। 


* विष्णु ने तीन पग में तीनों लोकों को नाप लिया। राजा बलि की दानशीलता से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राज्य दे दिया, साथ ही यह भी आश्वासन दिया कि उनकी याद में भू लोकवासी प्रत्येक वर्ष दीपावली मनाएंगे।

* महाप्रतापी तथा दानवीर राजा बलि ने अपने बाहुबल से तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली, तब बलि से भयभीत देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर प्रतापी राजा बलि से तीन पग पृथ्वी दान के रूप में मांगी। महाप्रतापी राजा बलि ने भगवान विष्णु की चालाकी को समझते हुए भी याचक को निराश नहीं किया और तीन पग पृथ्वी दान में दे दी। 

* त्रेतायुग में भगवान राम जब रावण को हराकर अयोध्या वापस लौटे तब उनके आगमन पर दीप जलाकर उनका स्वागत किया गया और खुशियां मनाई गईं।

* कार्तिक अमावस्या के दिन सिखों के छठे गुरु हरगोविन्दसिंहजी बादशाह जहांगीर की कैद से मुक्त होकर अमृतसर वापस लौटे थे।

* बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध के समर्थकों एवं अनुयायियों ने 2500 वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध के स्वागत में हजारों-लाखों दीप जलाकर दीपावली मनाई थी।

* कृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर का वध दीपावली के एक दिन पहले चतुर्दशी को किया था। इसी खुशी में अगले दिन अमावस्या को गोकुलवासियों ने दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं।

* 500 ईसा वर्ष पूर्व की मोहनजोदड़ो सभ्यता के प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी। उस मूर्ति में मातृ-देवी के दोनों ओर दीप जलते दिखाई देते हैं।

* अमृतसर के स्वर्ण मंदिर का निर्माण भी दीपावली के ही दिन शुरू हुआ था।

* जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर ने भी दीपावली के दिन ही बिहार के पावापुरी में अपना शरीर त्याग दिया। महावीर-निर्वाण संवत्‌ इसके दूसरे दिन से शुरू होता है। इसलिए अनेक प्रांतों में इसे वर्ष के आरंभ की शुरुआत मानते हैं। 

* यह भी कथा प्रचलित है कि जब श्रीकृष्ण ने आतताई नरकासुर जैसे दुष्ट का वध किया तब ब्रजवासियों ने अपनी प्रसन्नता दीपों को जलाकर प्रकट की।

* राक्षसों का वध करने के लिए मां देवी ने महाकाली का रूप धारण किया। राक्षसों का वध करने के बाद भी जब महाकाली का क्रोध कम नहीं हुआ तब भगवान शिव स्वयं उनके चरणों में लेट गए। भगवान शिव के शरीर स्पर्श मात्र से ही देवी महाकाली का क्रोध समाप्त हो गया। इसी की याद में उनके शांत रूप लक्ष्मी की पूजा की शुरुआत हुई। इसी रात इनके रौद्ररूप काली की पूजा का भी विधान है।

* मुगल वंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर दीपावली को त्योहार के रूप में मनाते थे और इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में भाग लेते थे।

* शाह आलम द्वितीय के समय में समूचे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था एवं लाल किले में आयोजित कार्यक्रमों में हिन्दू-मुसलमान दोनों भाग लेते थे।

* पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ। इन्होंने दीपावली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय 'ओम' कहते हुए समाधि ले ली।

* महर्षि दयानन्द ने भारतीय संस्कृति के महान जननायक बनकर दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया। इन्होंने आर्य समाज की स्थापना की।

* दीन-ए-इलाही के प्रवर्तक मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में दौलतखाने के सामने 40 गज ऊंचे बांस पर एक बड़ा आकाशदीप दीपावली के दिन लटकाया जाता था। बादशाह जहॉंगीर भी दीपावली धूमधाम से मनाते थे।

* सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक दीपावली के दिन हुआ था। इसलिए दीप जलाकर खुशियां मनाई गईं।

* ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में रचित कौटिल्य अर्थशास्त्र के अनुसार कार्तिक अमावस्या के अवसर पर मंदिरों और घाटों (नदी के किनारे) पर बड़े पैमाने पर दीप जलाए जाते थे।

05 नवंबर 2015

धनतेरस- दिपावली 2015 पूजन शुभ मुहूर्त

11, November 2015 Deepavali Puja Muhurt
धन तेरस, सोमवार, कार्तिक कृ्ष्ण पक्ष 9 नवम्बर, 2015


श्री महालक्ष्मी पूजन व दीपावली का महापर्व कार्तिक कृ्ष्ण पक्ष की अमावस्या में प्रदोष काल, स्थिर लग्न समय में मनाया जाता है. धन की देवी श्री महा लक्ष्मी जी का आशिर्वाद पाने के लिये इस दिन लक्ष्मी पूजन करना विशेष रुप से शुभ रहता है.
वर्ष 2015 में दिपावली, 11 नवंबर, बुधवार के दिन की रहेगी. इस दिन स्वाती-विशाखा नक्षत्र है, इस दिन सौभाग्य योग तथा चन्दमा तुला राशि में संचार करेगा. दीपावली में अमावस्या तिथि, प्रदोष काल, शुभ लग्न व चौघाडिया मुहूर्त विशेष महत्व रखते है. दिपावली व्यापारियों, क्रय-विक्रय करने वालों के लिये विशेष रुप से शुभ मानी जाती है.

1. प्रदोष काल मुहूर्त कब
11 नवंबर 2015, बुधवार के दिन सूर्यास्त 17:22 पर होगा. इसलिए 17:22 से 20:10 तक प्रदोष काल रहेगा. इसे प्रदोष काल का समय कहा जाता है. प्रदोष काल समय को दिपावली पूजन के लिये शुभ मुहूर्त के रुप में प्रयोग किया जाता है. प्रदोष काल में भी स्थिर लग्न समय सबसे उतम रहता है. इस दिन प्रदोष काल व स्थिर लग्न दोनों तथा इसके साथ शुभ चौघडिया भी रहने से मुहुर्त की शुभता में वृद्धि हो रही है.

प्रदोष काल का प्रयोग कैसे करें
प्रदोष काल में मंदिर में दीपदान, रंगोली और पूजा से जुडी अन्य तैयारी इस समय पर कर लेनी चाहिए तथा मिठाई वितरण का कार्य भी इसी समय पर संपन्न करना शुभ माना जाता है.
इसके अतिरिक्त द्वार पर स्वास्तिक और शुभ लाभ लिखने का कार्य इस मुहूर्त समय पर किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त इस समय पर अपने मित्रों व परिवार के बडे सदस्यों को उपहार देकर आशिर्वाद लेना व्यक्ति के जीवन की शुभता में वृ्द्धि करता है. मुहूर्त समय में धर्मस्थलो पर दानादि करना कल्याणकारी होगा.

2. निशिथ काल
निशिथ काल में स्थानीय प्रदेश समय के अनुसार इस समय में कुछ मिनट का अन्तर हो सकता है. 11 नवम्बर को 20:10 से 22:52 तक निशिथ काल रहेगा. निशिथ काल में लाभ की चौघडिया भी रहेगी, ऎसे में व्यापारियों वर्ग के लिये लक्ष्मी पूजन के लिये इस समय की विशेष शुभता रहेगी.

दिपावली पूजन में निशिथ काल का प्रयोग कैसे करें
धन लक्ष्मी का आहवाहन एवं पूजन, गल्ले की पूजा तथा हवन इत्यादि कार्य सम्पूर्ण कर लेना चाहिए. इसके अतिरिक्त समय का प्रयोग श्री महालक्ष्मी पूजन, महाकाली पूजन, लेखनी, कुबेर पूजन, अन्य मंन्त्रों का जपानुष्ठान करना चाहिए.

3. महानिशीथ काल
धन लक्ष्मी का आहवाहन एवं पूजन, गल्ले की पूजा तथा हवन इत्यादि कार्य सम्पूर्ण कर लेना चाहिए. इसके अतिरिक्त समय का प्रयोग श्री महालक्ष्मी पूजन, महाकाली पूजन, लेखनी, कुबेर पूजन, अन्य मंन्त्रों का जपानुष्ठान करना चाहिए.

11 नवम्बर, बुधवार 2015 के रात्रि में 22:52 से 25:34 मिनट तक महानिशीथ काल रहेगा. महानिशीथ काल में पूजा समय स्थिर लग्न या चर लग्न में कर्क लग्न भी हों, तो विशेष शुभ माना जाता है. महानिशीथ काल में सिंह लग्न एक साथ होने के कारण यह समय अधिक शुभ हो गया है. जो जन शास्त्रों के अनुसार दिपावली पूजन करना चाहते हो, उन्हें इस समयावधि को पूजा के लिये प्रयोग करना चाहिए.

महानिशीथ काल का दिपावली पूजन में प्रयोग कैसे करें
महानिशीथकाल में मुख्यतः तांत्रिक कार्य, ज्योतिषविद, वेद् आरम्भ, कर्मकाण्ड, अघोरी,यंत्र-मंत्र-तंत्र कार्य व विभिन्न शक्तियों का पूजन करते हैं एवं शक्तियों का आवाहन करना शुभ रहता है. अवधि में दीपावली पूजन के पश्चात गृह में एक चौमुखा दीपक रात भर जलता रहना चाहिए. यह दीपक लक्ष्मी एवं सौभाग्य में वृद्धि का प्रतीक माना जाता है.

चौघडिया - 11 नवंबर, बुधवार, 2015

धनतेरस 9 नवम्बर, 2015 शुभ मुहूर्त
धन तेरस, सोमवार, कार्तिक कृ्ष्ण पक्ष 9 नवम्बर, 2015

उत्तरी भारत में कार्तिक कृ्ष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन धनतेरस का पर्व पूरी श्रद्धा व विश्वास से मनाया जाता है. देव धनवन्तरी के अलावा इस दिन, देवी लक्ष्मी जी और धन के देवता कुबेर के पूजन की परम्परा है. इस दिन कुबेर के अलावा यमदेव को भी दीपदान किया जाता है. इस दिन यमदेव की पूजा करने के विषय में एक मान्यता है कि इस दिन यमदेव की पूजा करने से घर में असमय मृ्त्यु का भय नहीं रहता है. धन त्रयोदशी के दिन यमदेव की पूजा करने के बाद घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख वाला दीपक पूरी रात्रि जलाना चाहिए. इस दीपक में कुछ पैसा व कौडी भी डाली जाती है.

धनतेरस का महत्व
साथ ही इस दिन नये उपहार, सिक्का, बर्तन व गहनों की खरीदारी करना शुभ रहता है. शुभ मुहूर्त समय में पूजन करने के साथ सात धान्यों की पूजा की जाती है. सात धान्य गेंहूं, उडद, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर है. सात धान्यों के साथ ही पूजन सामग्री में विशेष रुप से स्वर्णपुष्पा के पुष्प से भगवती का पूजन करना लाभकारी रहता है. इस दिन पूजा में भोग लगाने के लिये नैवेद्ध के रुप में श्वेत मिष्ठान्न का प्रयोग किया जाता है. साथ ही इस दिन स्थिर लक्ष्मी का पूजन करने का विशेष महत्व है.
धन त्रयोदशी के दिन देव धनवंतरी देव का जन्म हुआ था. धनवंतरी देव, देवताओं के चिकित्सकों के देव है. यही कारण है कि इस दिन चिकित्सा जगत में बडी-बडी योजनाएं प्रारम्भ की जाती है. धनतेरस के दिन चांदी खरीदना शुभ रहता है.

धन तेरस पूजा मुहूर्त

1. प्रदोष काल:-
सूर्यास्त के बाद के 2 घण्टे 24 की अवधि को प्रदोषकाल के नाम से जाना जाता है. प्रदोषकाल में दीपदान व लक्ष्मी पूजन करना शुभ रहता है.
9 नवम्बर 2015 सूर्यास्त समय सायं 17:28 तक रहेगा. इस समय अवधि में स्थिर लग्न 17:51 से लेकर 19.47 के मध्य वृषभ काल रहेगा. मुहुर्त समय में होने के कारण घर-परिवार में स्थायी लक्ष्मी की प्राप्ति होती है.
2. चौघाडिया मुहूर्त:-
9 नवंबर 2015, सोमवार
अमृ्त काल मुहूर्त 04:30 से 18:00 तक
चर काल 18:00 से लेकर 19:30 तक
लाभ काल 22:30 से 24:00 तक
उपरोक्त में लाभ समय में पूजन करना लाभों में वृ्द्धि करता है. शुभ काल मुहूर्त की शुभता से धन, स्वास्थय व आयु में शुभता आती है. सबसे अधिक शुभ अमृ्त काल में पूजा करने का होता है.

सांय काल में शुभ महूर्त
17:24 से 20:07 तक का समय धन तेरस की पूजा के लिये विशेष शुभ रहेगा.

धनतेरस में क्या खरीदें
लक्ष्मी जी व गणेश जी की चांदी की प्रतिमाओं को इस दिन घर लाना, घर- कार्यालय,. व्यापारिक संस्थाओं में धन, सफलता व उन्नति को बढाता है.
इस दिन भगवान धनवन्तरी समुद्र से कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिये इस दिन खास तौर से बर्तनों की खरीदारी की जाती है. इस दिन बर्तन, चांदी खरीदने से इनमें 13 गुणा वृ्द्धि होने की संभावना होती है. इसके साथ ही इस दिन सूखे धनिया के बीज खरीद कर घर में रखना भी परिवार की धन संपदा में वृ्द्धि करता है. दीपावली के दिन इन बीजों को बाग/ खेतों में लागाया जाता है ये बीज व्यक्ति की उन्नति व धन वृ्द्धि के प्रतीक होते है.

धन तेरस पूजन
धन तेरस की पूजा शुभ मुहुर्त में करनी चाहिए. सबसे पहले तेरह दीपक जला कर तिजोरी में कुबेर का पूजन करना चाहिए. देव कुबेर का ध्यान करते हुए, भगवान कुबेर को फूल चढाएं और ध्यान करें, और कहें, कि हे श्रेष्ठ विमान पर विराजमान रहने वाले, गरूडमणि के समान आभावाले, दोनों हाथों में गदा व वर धारण करने वाले, सिर पर श्रेष्ठ मुकुट से अलंकृ्त शरीर वाले, भगवान शिव के प्रिय मित्र देव कुबेर का मैं ध्यान करता हूँ.

इसके बाद धूप, दीप, नैवैद्ध से पूजन करें. और निम्न मंत्र का जाप करें.
'यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये
धन-धान्य समृद्धि मे देहि दापय स्वाहा ।'

धनतेरस की कथा
एक किवदन्ती के अनुसार एक राज्य में एक राजा था, कई वर्षों तक प्रतिक्षा करने के बाद, उसके यहां पुत्र संतान कि प्राप्ति हुई. राजा के पुत्र के बारे में किसी ज्योतिषी ने यह कहा कि, बालक का विवाह जिस दिन भी होगा, उसके चार दिन बाद ही इसकी मृ्त्यु हो जायेगी.
ज्योतिषी की यह बात सुनकर राजा को बेहद दु:ख हुआ, ओर ऎसी घटना से बचने के लिये उसने राजकुमार को ऎसी जगह पर भेज दिया, जहां आस-पास कोई स्त्री न रहती हो, एक दिन वहां से एक राजकुमारी गुजरी, राजकुमार और राजकुमारी दोनों ने एक दूसरे को देखा, दोनों एक दूसरे को देख कर मोहित हो गये, और उन्होने आपस में विवाह कर लिया.
ज्योतिषी की भविष्यवाणी के अनुसार ठीक चार दिन बाद यमदूत राजकुमार के प्राण लेने आ पहुंचें. यमदूत को देख कर राजकुमार की पत्नी विलाप करने लगी. यह देख यमदूत ने यमराज से विनती की और कहा की इसके प्राण बचाने का कोई उपाय बताईयें. इस पर यमराज ने कहा की जो प्राणी कार्तिक कृ्ष्ण पक्ष की त्रयोदशी की रात में जो प्राणी मेरा पूजन करके दीप माला से दक्षिण दिशा की ओर मुंह वाला दीपक जलायेगा, उसे कभी अकाल मृ्त्यु का भय नहीं रहेगा. तभी से इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाये जाते है.

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