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24 मार्च 2015

माँ वैष्णो की अमर कहानी

सबसे अधिक तीर्थयात्री आते हैं वैष्णोदेवी
(देवी मंदिरों के मामले में)


कहते हैं पहाड़ों वाली माता वैष्णो देवी सबकी मुरादें पूरी करती हैं। उसके दरबार में जो कोई सच्चे दिल से जाता है, उसकी हर मुराद पूरी होती है। ऐसा ही सच्चा दरबार है- माता वैष्णो देवी का। वैष्णो देवी मंदिर  शक्ति को समर्पित एक पवित्रतम हिंदू मंदिर है, जो भारत के जम्मू और कश्मीर में वैष्णो देवी की पहाड़ी पर स्थित है। भारत में हिन्‍दूओं का पवित्र तीर्थस्‍थल वैष्णो देवी मंदिर है जो त्रिकुटा हिल्‍स में कटरा नामक जगह पर 1700 मी. की ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर के पिंड एक गुफा में स्‍थापित है, गुफा की लंबाई 30 मी. और ऊंचाई 1.5 मी. है। जगकल्याण टीम के साथ मुझे  भी अवसर मिला मातारानी के दर्शन और पूजन का| इसी दौरान मैंने अनेक पहलुओं पर खोजबीन की और जो जानकारी मुझे मिली उसी को यहाँ फिर से देने का प्रयास कर रहा हूँ : राजेश मिश्रा


वैष्णो देवी  उत्तरी भारत के सबसे पूजनीय और पवित्र स्थलों में से एक है। यह मंदिर पहाड़ पर स्थित होने के कारण अपनी भव्यता व सुंदरता के कारण भी प्रसिद्ध है। वैष्णो देवी भी ऐसे ही स्थानों में एक है जिसे माता का निवास स्थान माना जाता है। मंदिर, 5,200 फीट की ऊंचाई और कटरा से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हर साल लाखों तीर्थ यात्री मंदिर के दर्शन करते हैं।यह भारत में तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थस्थल है।

वैष्णों देवी की कहानी राजेश मिश्रा की जुबानी 

श्रीधर नाम का एक ब्राह्मण था। वह मां वैष्णो देवी का भक्त था।श्रीधर वर्तमान कटरा कस्बे से 2 कि.मी. की दूरी पर स्थित हंसली गांव में रहता था। एक बार उन्होंने अपने घर पर कन्या भोज का आयोजन किया। भोजन के बाद सारी कन्याएं अपने घर चली गई। एक कन्या नहीं गई। वह कन्या जिसका स्वरूप दिव्य था। उस कन्या ने विनम्रता से पंडित भंडारा (भिक्षुकों और भक्तों के लिए एक प्रीतिभोज) आयोजित करने के लिए कहा पंडित गांव और निकटस्थ जगहों से लोगों को आमंत्रित करने के लिए चल पड़े।

उन्होंने एक स्वार्थी राक्षस भैरव नाथ को भी आमंत्रित किया। भैरव नाथ ने श्रीधर से पूछा कि वे कैसे अपेक्षाओं को पूरा करने की योजना बना रहे हैं। उसने श्रीधर को विफलता की स्थिति में बुरे परिणामों का स्मरण कराया। पंडित जी चिंता में डूब गए, दिव्य बालिका प्रकट हुईं और कहा कि वे निराश ना हों, सब व्यवस्था हो चुकी है। बालिका के कहे अनुसार ही भंडारा निर्विघ्न संपन्न हुआ।

भैरव नाथ ने स्वीकार किया कि बालिका में अलौकिक शक्तियां थीं और आगे और परीक्षा लेने का निर्णय लिया। उसने त्रिकूटा पहाड़ियों तक उस दिव्य बालिका का पीछा किया। जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकड़ना चाहा, तब वह कन्या वहां से त्रिकूट पर्वत की ओर भागी और उस कन्या रूपी वैष्णो देवी ने हनुमान को बुलाकर कहा कि भैरवनाथ के साथ खेलों (युद्ध करो) मैं इस गुफा में नौ माह तक तपस्या करूंगी। इस गुफा के बाहर माता की रक्षा के लिए हनुमानजी ने भैरवनाथ के साथ नौ माह घमासान युद्ध करने लगे। जब हनुमान जी युद्ध करते करते थक गए तो माता गुफा से बाहर निकली।

भैरवनाथ से युद्ध करने लगी आज इस गुफा को पवित्र अर्ध कुंवारी के नाम से जाना जाता है। अर्ध कुंवारी के पास ही माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहां माता ने भागते - भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था। कहते हैं उस वक्त हनुमानजी मां की रक्षा के लिए मां वैष्णो देवी के साथ ही थे।

हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर एक बाण चलाकर जलधारा को निकाला और उस जल में अपने केश धोए। आज यह पवित्र जलधारा बाणगंगा के नाम से जानी जाती है, जिसके पवित्र जल का पान करने या इससे स्नान करने से भक्तों की सारी व्याधियां दूर हो जाती हैं।

त्रिकुट पर वैष्णो मां ने क्रोध में आकर अपने त्रिशूल से भैरवनाथ का सिर काट दिया जो उस स्थान पर गिरा जहां भैरवनाथ का मंदिर है। इस जगह को भैरोघाटी के नाम से भी जाना जाता है और भैरवनाथ का धड़ वो जगह है जहां पुरानी गुफा से होकर जाते हैं।

भैरवनाथ को अपनी गलती का अहसास हुआ और वह कटे हुए सिर से माता माता पुकारने लगा। जब माता प्रकट हुई तो विनती करने लगा कि माता संसार मुझे पापी मानकर मेरा अपमान करेगा। लोग मुझसे घृणा करेंगे आप मेरा उद्धार करो। यह सुनकर जगतजननी माता का मन पिघल गया और माता ने भैरो से कहा कि जो भी मेरे दर्शन को आएगा वो जब तक तुम्हारे दर्शन नहीं कर लेगा।

तब तक उसकी यात्रा पूरी नही होगी। इसलिए भक्त तीन किलोमीटर और चढ़कर भैरो मंदिर पर जाते हैं। माता के दर्शनों के बाद दूसरी तरफ श्रीधर पंडित इस बात से दुखी था कि माता उसके घर आई और वो पहचान ना सका तो माता ने श्रीधर को सपने में दर्शन दिए। अपनी गुफा का रास्ता बतलाया। उसी मार्ग पर चलकर श्रीधर वैष्णो माता के मंदिर पर पहुंचा जहां उसे माता के पिंडी रूप में दर्शन ह़ुए।

जिस स्थान पर मां वैष्णो देवी  ने हठी भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान आज पूरी दुनिया में भवन के नाम से प्रसिद्ध है। इस स्थान पर मां काली (दाएं) मां सरस्वती (मध्य) और मां लक्ष्मी पिंडी (बाएंं) के रूप में गुफा में विराजित है, जिनकी एक झलक पाने मात्र से ही भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। इन तीनों के सम्मिलित रूप को ही मां वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है।

भैरवनाथ का वध करने पर उसका शीश भवन से 3 किमी दूर जिस स्थान पर गिरा, आज उस स्थान को भैरवनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने मां से क्षमादान की भीख मांगी। माता वैष्णो देवी  ने भैरवनाथ को वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएंगे, जब तक कोई भक्त मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा।

कैसे पहुंचें मां के दरबार

मां वैष्णो देवी  की यात्रा का पहला पड़ाव जम्मू होता है। जम्मू तक आप बस, टैक्सी, ट्रेन या फिर हवाई जहाज से पहुंच सकते हैं। जम्मू ब्राड गेज लाइन द्वारा जुड़ा है। मां के भवन तक की यात्रा की शुरुआत कटरा से होती है, जो कि जम्मू जिले का एक कस्बा है। जम्मू से कटरा की दूरी लगभग 50 किमी है। आप जम्मू से बस या टैक्सी द्वारा कटरा पहुंच सकते हैं।

जम्मू रेलवे स्टेशन से कटरा के लिए आपको कई बसें मिल जाएंगी, जिनसे आप 2 घंटे में आसानी से कटरा पहुंच सकते हैं। यदि आप प्राइवेट टैक्सी से कटरा पहुंचना चाहते हैं तो आप 800 से 1000 रुपए खर्च कर टैक्सी से कटरा तक की यात्रा कर सकते हैं, जो कि लगभग 1 घंटे में आपको कटरा तक पहुंचा देगी। कम समय में मां के दर्शन के इच्छुक यात्री हेलिकॉप्टर सुविधा का लाभ भी उठा सकते हैं। र्शनार्थी रुपए खर्च कर कटरा से सांझीछत (भैरवनाथ मंदिर से कुछ किमी की दूरी पर) तक हेलिकॉप्टर से पहुंच सकते हैं। इसके बाद चढ़ाई की जाती है। यहीं से आपको घोड़े ,खच्चर , पालकी और सामान और बच्चों को ले जाने के लिए पोर्टर भी मिलते हैं।

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