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08 दिसंबर 2016

जग दीवाना कृष्ण का और कृष्ण दीवाने राधा के


हालांकि कृष्ण और राधा ने बचपन के कुछ ही साल साथ-साथ गुजारे, फिर भी आज हजारों साल बाद भी हम उन दोनों को अलग-अलग करके नहीं देख पाते। ऐसा कौन सा जादू था उस रिश्ते में?

जब कृष्ण ने गोपियों के कपड़े चुराए तो यशोदा माँ ने उन्हें बहुत मारा और फिर ओखली से बांध दिया। कृष्ण भी कम न थे। मौका मिलते ही उन्होंने ओखली को खींचा और उखाड़ लिया और फौरन जंगल की ओर निकल पड़े, क्योंकि वहीं तो उनकी गायें और सभी सथी संगी थे।

अचानक जंगल में उन्हें दो महिलाओं की आवाजें सुनाईं दीं। कृष्ण ने देखा वे दो बालिकाएं थीं, जिनमें से छोटी वाली तो उनकी सखी ललिता थी और दूसरी जो उससे थोड़ी बड़ी थी, उसे वह नहीं जानते थे, लेकिन लगभग 12 साल की इस लड़की की ओर वह स्वयं ही खिंचते चले गए।

दोनों लड़कियों ने उनसे पूछा कि क्या हुआ? तुम्हें इस तरह किसने बांध दिया? यह तो बड़ी क्रूरता है! किसने किया यह सब? उन दोनों में जो 12 वर्षीय लड़की थी, उसका नाम राधे था। जिस पल राधे ने सात साल के कृष्ण को देखा, उसके बाद वे कभी उनकी आँखों से ओझल नहीं हुए। जीवन भर कृष्ण राधे की आँखों में रहे, चाहे वह शारीरिक तौर पर उनके साथ हों या न हों। हालांकि बचपन के कुछ ही साल उन दोनों ने साथ-साथ गुजारे थे, फिर भी आज हजारों साल बाद भी हम राधा और कृष्ण को अलग-अलग करके नहीं देख पाते।
राधा

16 साल की उम्र के बाद कृष्ण पूरे जीवन राधा से कभी नहीं मिले। लेकिन सात साल की उम्र से लेकर 16 साल तक के उन नौ सालों में, जो उन्होंने राधे के साथ गुजारे, राधे उनका एक हिस्सा बन गईं। वह जीवन में बहुत सारे लोगों से मिले, बहुत सारे काम किए। उन्होंने कई विवाह भी किए, लेकिन राधे उनके जीवन में हमेशा बनी रहीं। राधा के शब्दों में, “मैं उनमें रहती हूं और वह मुझमें। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि वह कहां हैं और किसके साथ रहते हैं। वह हमेशा मेरे साथ हैं। कहीं और वह रह ही नहीं सकते।“ यानी जिस पल उन दोनों ने एक दूसरे को देखा था, उसके बाद से उन्हें एक दूसरे से अलग करके नहीं देखा गया। आज करीब तीन हजार साल बाद भी आप उन्हें अलग करके नहीं देख सकते। कुछ आचारी धार्मिक लोगों ने इतिहास में कुछ जगहों पर इन दोनों को अलग करने की कोशिश की। उन्होंने राधे को अलग करने की कोशिश की, क्योंकि राधे महाभारत की बदचलन लड़की है। वह सामाजिक ताने-बाने में फिट नहीं बैठती। इसलिए वे राधे को कृष्ण से अलग करके कृष्ण को ज्यादा ईश्वरीय स्वरूप में प्रस्तुत करना चाहते थे। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वे राधा को कृष्ण के जीवन से बाहर नहीं कर सके।



खैर, राधे ने कृष्ण को लकड़ी की ओखली से खोलने की कोशिश की। मगर कृष्ण उन्हें रोक दिया और कहा, ‘इसे मत खोलो। मैं चाहता हूं कि इसे मां ही खोले, जिससे उनका गुस्सा निकल सके।’ इन लड़कियों ने पूछा, ‘क्या हम तुम्हारे लिए कुछ और कर सकते हैं?’ इस पर कृष्ण ने अपनी सखी ललिता से कहा, ‘मुझे पानी चाहिए। मेरे लिए पानी ले आओ।’ दरअसल, पानी के बहाने वह उसे वहां से हटाना चाहते थे। ललिता पानी लेने चली गई और सात साल के कृष्ण और 12 साल की राधा साथ-साथ बैठ गए। इस एक मुलाकात में ही ये दोनों एक दूसरे में विलीन होकर एक हो गए और फिर उसके बाद से उन्हें कोई अलग न कर सका।
कृष्ण जब 16 साल के हुए, जिंदगी ने उनके रास्ते बदल दिए। कृष्ण को अपनी बांसुरी पर बड़ा गर्व था। उनकी बांसुरी थी ही इतनी मंत्रमुग्ध कर देने वाली। लेकिन 16 साल की उम्र में जब वह शारीरिक तौर से राधे से अलग हुए, तो उन्होंने न सिर्फ अपनी बांसुरी राधे को दे दी, बल्कि उसके बाद जीवन में फिर कभी उन्होंने बांसुरी नहीं बजाई।

राधा कृष्ण की पहली मुलाकात और इनका प्रेम

भगवान श्री कृष्ण और देवी राधा की दूसरी मुलाकात लौकिक न होकर अलौकिक थी। इस संदर्भ में गर्ग संहिता में एक कथा मिलती है। यह उस समय की बात है जब भगवान श्री कृष्ण नन्हे बालक थे। उन दिनों एक बार एक बार नंदराय जी बालक श्री कृष्ण को लेकर भांडीर वन से गुजर रहे थे।

देवी राधा को पुराणों में श्री कृष्ण की शश्वत जीवनसंगिनी बताया गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में बताया गया है कि राधा और कृष्ण का प्रेम इस लोक का नहीं बल्कि पारलौक है। सृष्टि के आरंभ से और सृष्टि के अंत होने के बाद भी दोनों नित्य गोलोक में वास करते हैं।
लेकिन लौकिक जगत में श्रीकृष्ण और राधा का प्रेम मानवी रुप में था और इस रुप में इनके मिलन और प्रेम की शुरुआत की बड़ी ही रोचक कथा है। एक कथा के अनुसार देवी राधा और श्री कृष्ण की पहली मुलाकात उस समय हुई थी जब देवी राधा ग्यारह माह की थी और भगवान श्री कृष्ण सिर्फ एक दिन के थे। मौका था श्री कृष्ण का जन्मोत्सव।
मान्यता है कि देवी राधा भगवान श्री कृष्ण से ग्यारह माह बड़े थी और कृष्ण के जन्मोत्सव पर अपनी माता कीर्ति के साथ नंदगांव आई थी यहां श्री कृष्ण पालने में झूल रहे थे और राधा माता की गोद में थी।

इस तरह दूसरी बार मिले थे भगवान श्री कृष्ण और देवी राधा

radha krishna first meeting and love story2 
भगवान श्री कृष्ण और देवी राधा की दूसरी मुलाकात लौकिक न होकर अलौकिक थी। इस संदर्भ में गर्ग संहिता में एक कथा मिलती है। यह उस समय की बात है जब भगवान श्री कृष्ण नन्हे बालक थे। उन दिनों एक बार एक बार नंदराय जी बालक श्री कृष्ण को लेकर भांडीर वन से गुजर रहे थे।
उसे समय आचानक एक ज्योति प्रकट हुई जो देवी राधा के रुप में दृश्य हो गई। देवी राधा के दर्शन पाकर नंदराय जी आनंदित हो गए। राधा ने कहा कि श्री कृष्ण को उन्हें सौंप दें, नंदराय जी ने श्री कृष्ण को राधा जी की गोद में दे दिया।
श्री कृष्ण बाल रूप त्यागकर किशोर बन गए। तभी ब्रह्मा जी भी वहां उपस्थित हुए। ब्रह्मा जी ने कृष्ण का विवाह राधा से करवा दिया। कुछ समय तक कृष्ण राधा के संग इसी वन में रहे। फिर देवी राधा ने कृष्ण को उनके बाल रूप में नंदराय जी को सौंप दिया।

तीसरी मुलाकत में हुआ लौकिक प्रेम

radha krishna first meeting and love story3 
राधा कृष्ण की लौकिक मुलाकात और प्रेम की शुरुआत संकेत नामक स्थान से माना जाता है। नंद गांव से चार मील की दूरी पर बसा है बरसाना गांव। बरसाना को राधा जी की जन्मस्थली माना जाता है। नंदगांव और बरसाना के बीच में एक गांव है जो ‘संकेत’ कहलाता है।
इस स्थान के विषय में मान्यता है कि यहीं पर पहली पर भगवान श्री कृष्ण और राधा जी का लौकिक मिलन हुआ था। हर साल राधाष्टमी यानी भाद्र शुक्ल अष्टमी से चतुर्दशी तिथि तक यहां मेला लगता है और राधा कृष्ण के प्रेम को याद कर भक्तगण आनंदित होते हैं।
इस स्थान का नाम संकेत क्यों हुआ इस विषय में कथा है जब श्री कृष्ण और राधा के पृथ्वी पर प्रकट होने का समय आया तब एक स्थान निश्चित हुआ जहां दोनों का मिलना तय हुआ। मिलन का स्थान संकेतिक था इसलिए यह संकेत कहलाया।

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