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22 मई 2017

Amarnath Baba ki kahani Raj ki jubani Amarnath Dhaam Sampurn Yatra

अमरनाथ धाम यात्रा
 Amarnath Dhaam Yatra

  • अमरनाथ धाम श्रद्धालुओं के लिए यह अत्यंत पूजनीय है. जिसने भी इस यात्रा के बारे में जाना या सुना है, वह कम से कम एक बार जाने की इच्छा जरूर रखता है.
  • ऐसी मान्‍यता है कि यहां पहुंचता वही है, जिसे बाबा अमरनाथ अपने दरबार में बुलाते हैं.
  • अमरनाथ की अवस्थिति: अमरनाथ धाम श्रीनगर से लगभग 135 किलोमीटर दूर है.
  • यह स्थान समुद्रतल से 13,600 फुट की ऊंचाई पर स्थित है. इस स्थान पर ऑक्सीजन की कमी हो जाती है.
  • जरूरी है पंजीकरण: प्रतिवर्ष अमरनाथ यात्रा के लिए लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं. यात्रा से पूर्व श्रद्धालुओं को पंजीकरण करवाना होता है.
  • पंजीकरण के लिए भक्तों से कुछ शुल्क जमा करना पड़ता है.
  • सरकार एवं कुछ निजी संस्थाओं द्वारा यात्रियों को यात्रा सुविधाएं दी जाती हैं.
  • कैसे पहुंचें: हवाई मार्गअमरनाथ दर्शन करने के लिए निकटतम हवाई अड्डा श्रीनगर में है.
  • पर्यटक श्रीनगर आकर प्रसिद्ध डल झील, मुगल गार्डन आदि देखना नहीं भूलते हैं.
  • श्रीनगर जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य की ग्रीष्‍मकालीन राजधानी भी है.
  • श्रीनगर भलीभांति हवाई मार्ग और सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है.
  • रेलमार्ग: निकटतम रेलवे स्‍टेशन जम्‍मू है. जम्‍मू प्रदेश की शीतकालीन राजधानी है.
  • जम्‍मू रेलवे स्‍टेशन देश के अन्‍य शहरों से पूरी तरह जुड़ा हुआ है.
  • सड़क मार्ग: जम्‍मू और श्रीनगर सड़क मार्ग से जुड़े हुए हैं. यहां बस और टैक्‍सी सेवा आसानी से उपलब्‍ध है.
  • अमरनाथ जाने के दो मार्ग: अमरनाथ यात्रा पर जाने के लिए दो रास्ते हैं, एक पहलगांव होकर तथा दूसरा बालटाल होकर.
  • इन स्थानों तक दर्शनार्थी बस से आते हैं, इसके बाद का सफर पैदल तय करना होता है.
  • पहलगांव से होकर जाने वाला रास्ता बालटाल की तुलना में सुगम है.
  • यही वजह है कि सुरक्षा की दृष्टि से तीर्थ यात्री इसी रास्ते से अमरनाथ जाना अधिक पसंद करते हैं.
  • हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक: भगवान अपने भक्तों में किसी प्रकार का अंतर नहीं करते हैं, इसका प्रमाण है अमरनाथ धाम.
  • हिन्दू जिस अमरनाथ धाम की यात्रा को अपना सौभाग्य मानते हैं, उस धाम के बारे में बताने वाला एक मुस्लिम गड़रिया था.
  • आज भी मंदिर में चढ़ावे का एक चौथाई भाग इस मुस्लिम गड़रिये परिवार को मिलता है.
  • अमरनाथ धाम का महात्म्य: कहते हैं कि जिस पर भोले बाबा की कृपा होती है, वही अमरनाथ धाम पहुंचता है.
  • अमरनाथ यात्रा पर पहुंचना ही सबसे बड़ा पुण्य है.
  • जो भक्त बाबा हिमानी का दर्शन करता है, उसे इस संसार में हर तरह के सुख की प्राप्ति होती है.
  • कहा जाता है कि इससे व्यक्ति के कई जन्मों के पाप कट जाते हैं और शरीर त्याग करने के बाद वह उत्तम लोक में जगह पाता है.
  • बालताल से श्रद्धालु पहलगाम पड़ाव तक जाएंगे.
  • पहलगाम के बाद चंदनवाड़ी दूसरा पड़ाव होगा.
  • चंदनवाड़ी के बाद शेषनाग तीसरा पड़ाव होगा.
  • चंदनवाड़ी के बाद श्रद्धालु पंचतरनी पहुंचेंगे.
  • और अंतिम में श्रद्धालु बाबा के गुफा तक पहुचेंगे.
  • अमरनाथ हिन्दुओ का एक प्रमुख तीर्थस्थल है. यह जम्मू कश्मीर राज्य में है.
  • मंगलवार से अमरनाथ यात्रा की शुरुआत हुई है.
  • अमरनाथ गुफा भगवान शिव के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है. इसे तीर्थों का तीर्थ कहा जाता है क्योंकि यहीं भगवान शिव ने मां पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था.
  • श्री अमरनाथ की विशेषता यह है कि यहां की पवित्र गुफा में बर्फ का स्वयंभू शिवलिंग निर्मित होता है.
  • हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन करने पहुंचते हैं.
  • अमरनाथ यात्रा जाने के लिए यात्रियों को पहले पंजीकरण कराना होता है.
  • सभी श्रद्धालु जम्मू में एकत्रित होते हैं.
  • जम्मू से यात्रियों को एक समूह में अमरनाथ यात्रा पर रवाना किया जाता है. रास्ते में इनकी सुविधाओं का विशेष ख्याल भी रखा जाता है.

श्री अमरनाथ के कुछ ऐसे रहस्य जो नहीं जानते होंगे आप

असंख्य शिव भक्तों की आस्था के साथ जुड़ी पावन श्री अमरनाथ यात्रा आधिकारिक रूप से आज 2 जुलाई 2016 से प्रारंभ होने जा रही है।धरती का स्वर्ग कही जाने वाली कश्मीर घाटी में स्थित श्री अमरनाथ स्वामी की पवित्र गुफा में प्रतिवर्ष बर्फ से बनने वाले प्राकृतिक हिमशिवलिंग की पूजा की जाती है। श्री अमरनाथ धाम में देवाधिदेव महादेव को साक्षात विराजमान माना जाता है। महादेव प्रति वर्ष श्री अमरनाथ गुफा में अपने भक्तों को हिमशिवलिंग के रूप में दर्शन देते हैं। इस पवित्र गुफा में हिमशिवलिंग के साथ ही एक गणेश पीठ, एक पार्वती पीठ भी हिम से प्राकृतिक रूप में निर्मित होती है। पार्वती पीठ ही शक्तिपीठ स्थल है।
श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को बाबा बर्फानी अमरनाथ स्वामी के दर्शन के साथ-साथ माता पार्वती शक्तिपीठ का भी दर्शन होता है। यहां माता सती के अंग तथा अंगभूषण की पूजा होती है क्योंकि यहां उनके कंठ का निपात हुआ था।
श्री अमरनाथ की पवित्र गुफा में भगवान शंकर ने शिव धाम की प्राप्ति करवाने वाली परम पवित्र ‘अमर कथा’ भगवती पार्वती को सुनाई थी। जब भगवान शंकर यह कथा पार्वती जी को सुना रहे थे तो वहां एक तोते का बच्चा भी इसे सुन रहा था और इसे सुन कर फिर उस तोते के बच्चे ने श्री शुकदेव स्वरूप पाया था।
‘शुक’ संस्कृत में तोते को कहते हैं और इसी कारण बाद में फिर मुनि ‘शुकदेव’ के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुए। यह कथा भगवती पार्वती तथा भगवान शंकर का संवाद है। लोक व परलोक का सुख देने वाले शंकर भगवान और पार्वती जी के इस संवाद का वर्णन भृगु संहिता, नीलमत पुराण, तीर्थ संग्रह आदि ग्रंथों में पाया जाता है।

श्री अमरनाथ गुफा की खोज से जुड़े रहस्य

इस पवित्र गुफा की खोज बहुत ही नेक और दयालु मुसलमान गडरिए बूटा मलिक ने की थी। वह एक दिन अपनी भेड़ों को चराते-चराते बहुत दूर निकल गया। एक जंगल में पहुंच कर उसकी एक साधु से भेंट हो गई। साधु ने उसे कोयले से भरी एक कांगड़ी दी। घर पहुंच कर बूटा मलिक ने कोयले की जगह सोना पाया तो वह बहुत हैरान हुआ। उसी समय वह साधु का धन्यवाद करने के लिए लौटा परंतु वहां साधु की बजाय एक विशाल गुफा देखी। उसी दिन से यह स्थान एक तीर्थ बन गया। आज भी यात्रा पर आने वाले शिव भक्तों द्वारा चढ़ाए गए चढ़ावे का एक निश्चित हिस्सा मलिक परिवार के वंशजों को जाता है।
एक अन्य कथा के अनुसार कश्यप ऋषि ने कश्मीर घाटी के पानी का निष्कासन किया। कश्मीर घाटी उस समय एक बहुत बड़ी झील मानी जाती थी। जब लोगों को इसका ज्ञान हुआ तो वे इस शिव स्थल की तीर्थ यात्रा पर आने लगे। कश्यप ऋषि द्वारा अस्तित्व में आने के कारण से ही इस घाटी का नाम कच्छप घाटी पड़ा जो बाद में कश्मीर घाटी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

गुफा से जुड़े रहस्य

एक बार देवर्षि नारद कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर के स्थान पर दर्शनार्थ पधारे। भगवान शंकर उस समय वन विहार के लिए गए हुए थे और भगवती पार्वती यहां विराजमान थीं। पार्वती जी ने देवर्षि को आसन देकर कहा, ‘‘देवर्षि! कृपा अपने आने का कारण कहिए।’’
देवर्षि बोले, ‘‘देवी! भगवान शंकर के गले में मुंड माला क्यों है?’’
भगवान शंकर के वहां आने पर यही प्रश्र पार्वती जी ने उनसे किया। उन्होंने कहा, ‘‘जितनी बार तुम्हारा जन्म हुआ है उतने ही मुंड मैंने धारण किए हैं।’’
पार्वती जी बोलीं, ‘‘मेरा शरीर नाशवान है, परंतु आप अमर हैं इसका कारण बताएं।’’
भगवान शंकर ने कहा यह सब अमरकथा के कारण है। यह उत्तर सुनकर माता पार्वती के हृदय में भी अमरत्व प्राप्त करने की भावना पैदा हो गई और वह भगवान शंकर से शिव कथा सुनाने का आग्रह करने लगीं। शिव शंकर ने बहुत वर्षों तक इसे टालने का प्रयत्न किया, परंतु पार्वती जी के हठ के कारण उन्हें अमरकथा सुनाने को बाध्य होना पड़ा। अमरकथा सुनाने के लिए समस्या यह थी कि कोई अन्य जीव उस कथा को न सुने। इसलिए भगवान शंकर पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्नि) का परित्याग करके इन पर्वतमालाओं में पहुंच गए और श्री अमरनाथ गुफा में पार्वती जी को अमरकथा सुनाई। गुफा की ओर जाते हुए वह सर्वप्रथम पहलगाम पहुंचे जहां उन्होंने अपने नंदी (बैल) का परित्याग किया। फिर चंदनबाड़ी में भगवान शिव ने अपनी जटाओं (केशों) से चंद्रमा को मुक्त किया। शेषनाग नामक झील पर पहुंच कर उन्होंने अपने गले से सर्पों को भी उतार दिया। श्री गणेश जी को भी उन्होंने महागुनस पर्वत पर छोड़ देने का निश्चय किया। फिर पंचतरणी पहुंच कर शिव जी ने पांचों तत्वों का परित्याग किया। सब कुछ छोड़-अंत में भगवान शिव ने इस गुफा में प्रवेश किया और पार्वती जी को अपने श्रीमुख से अमरकथा सुनाई।

हिम शिवलिंग

प्रतिकूल मौसम के बावजूद बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए प्रति वर्ष श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। एक दंत कथा के अनुसार रक्षाबंधन की पूर्णिमा के दिन भगवान शंकर स्वयं श्री अमरनाथ गुफा में पधारते हैं। ऐसी मान्यता है कि चातुर्मास की प्रतिपदा को हिम के लिंग का निर्माण स्वयं आरंभ होता है और धीरे-धीरे लिंग का आकार धारण कर लेता है तथा पूर्णिमा के दिन पूर्ण हो जाता है व अगले दिन से घटने लगता है। अमावस्या या शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को यह लिंग पूर्णत: अदृश्य हो जाता है और इस प्रकार यह क्रम निरंतर चलता रहता है। यह हिम शिवलिंग कभी भी पूर्णत: लुप्त नहीं होता, आकार अवश्य ही छोटा-बड़ा हो जाता है। भगवान शिव इस गुफा में पहले पहल श्रावण की पूर्णिमा को आए थे इसलिए उस दिन को श्री अमरनाथ की यात्रा को विशेष महत्व मिला। रक्षाबंधन की पूर्णिमा के दिन ही छड़ी मुबारक भी गुफा में बने ‘हिमशिवलिंग’ के पास स्थापित कर दी जाती है।

अमरेश महादेव

श्री अमरनाथ गुफा में बर्फ से बने शिवलिंग से जुड़ी इस कथा को सुनाने के लिए माता पार्वती जी भगवान सदाशिव से कहती हैं, ‘‘प्रभो! मैं अमरेश महादेव की कथा सुनना चाहती हूं। मैं यह भी जानना चाहती हूं कि महादेव गुफा में स्थित होकर अमरेश क्यों और कैसे कहलाए?’’
सदाशिव भोलेनाथ माता पार्वती का प्रश्र सुनकर कहने लगे आदिकाल में ब्रह्मा, प्रकृति, अहंकार, स्थावर (पर्वतादि) जंगल (मनुष्य) संसार की उत्पत्ति हुई। इस क्रमानुसार देवता, ऋषि, पितर, गंधर्व, राक्षस, सर्प, यक्ष, भूतगण, कूष्मांड, भैरव, गीदड़, दानव आदि की उत्पत्ति हुई। इस तरह नए प्रकार के भूतों की सृष्टि हुई परंतु इंद्र आदि देवता सहित सभी मृत्यु के वश में थे।
देवता, भगवान सदाशिव के पास आए क्योंकि उन्हें मृत्यु का भय था। भय से त्रस्त सभी देवताओं ने भगवान भोलेनाथ की स्तुति की और कहा हमें मृत्यु बाधा करती है। आप कोई ऐसा उपाय बतलाएं जिससे मृत्यु हम लोगों को बाधा न करे। देवताओं की बात सुनकर भोलेनाथ स्वामी बोले मैं आप लोगों की मृत्यु के भय से रक्षा करूंगा। यह कहते हुए सदाशिव ने अपने सिर पर से चंद्रमा की कला को उतार कर निचोड़ा और देवगणों से बोले, यह आप लोगों के मृत्यु रोग की औषधि है।
उस चंद्रकला के निचोडऩे से पवित्र अमृत की धारा बह निकली और वह धारा बाद में अमरावती नदी के नाम से विख्यात हुई। चंद्रकला को निचोड़ते समय भगवान सदाशिव के शरीर पर जो अमृत बिंदु गिरे वे सूख कर पृथ्वी पर गिर पड़े। पावन गुफा में जो भस्म है वह इसी अमृत बिंदु के कण हैं।
कहते हैं सदाशिव भगवान देवताओं पर प्रेम न्यौछावर करते समय स्वयं द्रवीभूत हो गए। देवगण सदाशिव को जल स्वरूप देख कर उनकी स्तुति में लीन हो गए और बारम्बार नमस्कार करने लगे। भोलेनाथ ने दयायुक्त वाणी से देवताओं से कहा, तुमने मेरा बर्फ का लिंग शरीर इस गुफा में देखा है। इस कारण मेरी कृपा से आप लोगों को मृत्यु का भय नहीं रहेगा। अब तुम यहीं पर अमर होकर शिव रूप को प्राप्त हो जाओ। आज से मेरा यह अनादिलिंग शरीर तीनों लोकों में अमरेश के नाम से विख्यात होगा।
भगवान सदाशिव देवताओं को ऐसा वर देकर उस दिन से लीन होकर गुफा में रहने लगे। भगवान सदाशिव महाराज ने अमृत रूप सोमकला को धारण करके देवताओं की मृत्यु का नाश किया इसलिए तभी से उनका नाम अमरेश्वर प्रसिद्ध हुआ है।


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